जर्मनी में आसानी से रच-बस जाते हैं पाकिस्तानी | दुनिया | DW | 06.06.2018
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दुनिया

जर्मनी में आसानी से रच-बस जाते हैं पाकिस्तानी

सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि किसी अन्य देश से आने वाले प्रवासियों की तुलना में पाकिस्तानी लोग जर्मनी में आसानी से रच-बस जाते हैं. साथ ही नौकरी तलाशने में भी इन लोगों को कोई खास समस्या नहीं होती.

अकबर अली न तो जर्मन बोलना जानता था और न ही वह जर्मन समझता था. लंबे समय तक उसे लगता रहा कि शायद उसके लिए जर्मन समाज के तौर-तरीके अपनाना और इसमें घुलना-मिलना आसान नहीं होगा. लेकिन उसने जल्द ही जर्मन और यूरोपीय लोगों को भाने वाला भारतीय-पाकिस्तानी स्टाइल का खाना बनाना सीख लिया. बस फिर क्या था, नौकरी मिली और जिंदगी सरपट दौड़ने लगी. आज अली को जर्मनी के शहर बॉन में भारत-पाक खाना परोसने वाले एक रेस्तरां का किचन संभालते हुए 10 महीने बीत गए. डीडब्ल्यू से बातचीत में अली ने कहा, "भाषा का ज्ञान न होना यहां एक बड़ी समस्या है. यहां मुश्किल से ही कोई मेरी बात समझता था. यहां कोई काम न होना और न कोई सोशल लाइफ मेरे लिए जर्मनी में सबसे मुश्किल वक्त था."शरणार्थियों के स्वदेश लौटने को जर्मनी का प्रोत्साहन

काम से मिलती संतुष्टि

अली पाकिस्तान के उन 30 हजार प्रवासियों में से एक था जो 2015 में जर्मनी आए. अली उन चंद खुशकिस्मत प्रवासियों में से एक है जो जर्मनी में अपने लिए काम खोज सका. जर्मनी की फेडरल एम्प्लाइमेंट एजेंसी के तहत आने वाले इंस्टीट्यूट फॉर एम्प्लाइमेंट रिसर्च (आईएबी) के अध्ययन की मानें तो पाकिस्तानी जर्मनी में सबसे अच्छे से रचने-बसने और नौकरी पाने वाले प्रवासियों में से एक हैं. अली के लिए काम पाना न सिर्फ पैसा कमाने का एक जरिया है. बल्कि काम में लग कर वह अपने भाई की मौत का गम भी भूल जाता है.

अलीम लतीफ से मिलने से पहले तक अली पैसा कमाने और काम पाने के लिए काफी हाथ-पैर मारता रहा. लेकिन बॉन में रेस्तरां चलाने वाले लतीफ ने अली को मौका दिया. लतीफ कहते हैं, "भाषा न जानने के चलते कई बार लोगों के असली गुर सामने नहीं आ पाते. पाकिस्तानियों के लिए यहां नौकरी पाना मुश्किल है. मैंने अली को इसलिए नौकरी दी क्योंकि मैं जानता था कि उसे ट्रेनिंग देकर होशियार बनाया जा सकता है." लतीफ बताते हैं कि उनके साथ काफी ऐसे पाकिस्तानी स्टूडेंट्स काम करते हैं, जिन्हें पार्ट-टाइम नौकरी की तलाश थी. हालांकि लतीफ यह भी मानते हैं प्रवासियों को नौकरी पर रखने में काफी कागजी कार्रवाई भी करनी होती है, लेकिन उनके साथ काफी सहानुभूति भी होती है. 

जर्मन-ईयू नागरिकों को तरजीह

कानूनों के मुताबिक, नौकरियों में सबसे पहले जर्मन और यूरोपीय संघ(ईयू) में शामिल देशों के नागरिकों को तरजीह दी जाती है. गैर-ईयू नागरिकों को केवल उन्हीं कामों में अनुमति मिलती है जिसके लिए जर्मन या ईयू के नागरिक न मिल रहे हों. लेकिन शरणार्थी मुद्दे के चलते 2016 में इन नियमों में थोड़ी ढील बरती गई. कुछ ऐसे ही कारणों के चलते अब पाकिस्तान से आए लोगों को भारतीय और पाकिस्तानी रेस्तरां में काम की अनुमति मिलने लगी है.

दनयाल अली रिजवान भी पाकिस्तान से आया एक ऐसा ही प्रवासी है, जो फिलहाल एक शरणार्थी केंद्र में रह रहा है. रिजवान पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा पर सटे परचिनार क्षेत्र से आता है. रिजवान ने डीडब्ल्यू को बताया कि उसने यहां एक भारतीय रेस्तरां में लगभग एक साल काम किया. इसके बाद उसे एक स्थानीय कंपनी में काम मिला. लेकिन फेडरल एम्प्लाइमेंट एजेंसी ने मुझे उसमें काम करने की अनुमति नहीं दी और उसके बाद से मेरे पास काम नहीं है. 

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यूरोपीय संघ के जनसांख्किीय विभाग, यूरोस्टेट के मुताबिक साल 2015 से 2017 के बीच जर्मनी में करीब 28 हजार पाकिस्तानी प्रवासी आए. इनमें से करीब 15 हजार लोगों ने तो सिर्फ 2016 में ही शरणार्थी दर्जे के लिए आवेदन दिया था. इसमें से 90 फीसदी पुरुष हैं तो वहीं 10 फीसदी महिलाएं. शरणार्थी का दर्जा चाहने वाले अधिकतर पुरुष जवान हैं. इनमें से तकरीबन 74 फीसदी लोगों की उम्र 18 से 34 साल के बीच है.

Infografik Asylbewerber aus Pakistan Entscheidungen EN

जर्मन फेडरल ऑफिस फॉर माइग्रेशन एंड रिफ्यूजी (बीएएमएफ) के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि अधिकतर पाकिस्तानी देश के पंजाब प्रांत से आते हैं. 2015-2017 के दौरान दिए गए कुल शरणार्थी आवेदनों में से महज 5.4 फीसदी को ही मंजूरी दी गई. इसके अलावा भाषा सिखाए जाने से लेकर अन्य मामलों में भी पाकिस्तानी लोगों को ऐसी रियायतें नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान से आए प्रवासी, अन्य देशों के शरणार्थियों की तुलना में जल्द काम हासिल कर पा रहे हैं.  

पैसे से ज्यादा इज्जत अहम

डीडब्ल्यू से बात करने वाले 10 पाकिस्तानी प्रवासियों में से पांच ने बताया कि उन्हें 2015 के आने के साथ ही नौकरी मिल गई थी. इनमें से अधिकतर ग्रामीण और छोटे शहरों से आते हैं. इनमें से एक है उस्मान. उस्मान की उम्र महज 20 साल है, जो इनमें सबसे छोटा है. उस्मान फर्राटेदार जर्मन बोलना जानता है. वह कहता है कि काम करके वह न सिर्फ पैसे कमाता है बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा और इज्जत भी मिलती है.

अली भी इज्जत को ज्यादा तरजीह देता है. अली कहता है, "मैं काम इसलिए भी करना चाहता हूं क्योंकि मुझे जर्मन सरकार से मिलने वाली मदद पर निर्भर नहीं रहना है. मैं खुद से पैसा कमा कर जिंदगी गुजारना चाहता हूं." 

शमशीर हैदर/एए

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