जर्मनी में अब शरण पाने के अधिकार पर बहस | ब्लॉग | DW | 23.11.2018
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ब्लॉग

जर्मनी में अब शरण पाने के अधिकार पर बहस

जर्मनी में शरणार्थी संकट ने चांसलर अंगेला मैर्केल की कुर्सी को हिला कर रखा हुआ है. पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद इस पद के दावेदार फ्रीडरिष मैर्त्स ने तो शरण के संवैधानिक अधिकार पर ही सवाल उठाया है.

अकसर देखा गया है कि किसी देश में होने वाले बड़े बदलावों की शुरुआत किसी एक छोटी मोटी टिप्पणी से होती है. इसलिए जर्मनी में फ्रीडरिष मैर्त्स के बयान को गंभीरता से लेना जरूरी है. फ्रीडरिष मैर्त्स वही शख्स हैं जिन्हें मौजूदा चांसलर अंगेला मैर्केल के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है. बहुत मुमकिन है कि वे जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टी सीडीयू के अध्यक्ष चुने जाएं. मैर्त्स ने बातों बातों में जर्मनी के संविधान में दिए गए शरणार्थी अधिकार पर ही सवाल खड़े कर दिए.

जर्मन संविधान हर व्यक्ति को शरण का अधिकार देता है. संविधान के अनुसार, "राजनीतिक तौर पर पीड़ित लोगों को शरण का अधिकार है." संविधान के ये वे शब्द हैं जो जिन्होंने कई तूफानों का सामना किया है. पहले 1993 में, जब पूर्वी यूरोप से आने वाले लोगों पर रोक लगाई गई थी. यह वही साल था जब जंग से बच कर पूर्वी यूरोप से लोग जर्मनी में शरण लेने आ रहे थे. इसी जंग ने पूर्व यूगोस्लाविया का अंत किया था.

उस वक्त भी आज ही की तरह विरोध हो रहे थे. कुछ लोगों में गुस्सा था, तो कई बार प्रदर्शन हिंसक रूप भी ले लेते थे. फिर 2015 में जब हजारों लाखों लोग जर्मनी आने लगे, तब एक बार फिर वैसी ही आवाजें उठने लगीं. इस बार सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और अफ्रीका से लोग आ रहे थे. लेकिन इस बार भी संविधान के शब्दों को कोई छू नहीं पाया. खास कर चांसलर अंगेला मैर्केल इसके बचाव में डट कर खड़ी रहीं.

यह सच है कि कई तरह की रोक लग जाने के बाद अब बहुत से लोगों से जर्मनी में शरण लेने का मौका छिन गया है. लेकिन यह भी सच है कि यूरोपीय संघ में केवल जर्मनी ही हर व्यक्ति को शरण का अधिकार देता है. और सही तो यह भी होता कि यूरोप भर में एक ही तरह के नियम होते. लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखता.

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येंस थुराऊ

इतिहास के अनुभव

मैर्त्स का सुझाव है कि जर्मनी के कानून में बदलाव लाने के लिए बहस शुरू की जाए. वही कानून, जिसकी जड़ें जर्मनी के इतिहास में दबी हुई हैं. हम जर्मनों ने 12 साल तक नाजी शासन के तहत दुनिया भर को काफी कष्ट पहुंचाया है. हमने लोगों को सताया है, हत्या की है. और ये सब सिर्फ इसलिए कि उनका धर्म, पृष्ठभूमि, उनकी राजनीतिक सोच हमसे अलग थी.

खास कर बड़ी संख्या में यहूदियों ने अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़ कर भागने की कोशिशें की लेकिन वे लोग कहीं जाने में इसलिए विफल रहे क्योंकि दूसरे देशों ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया था. नतीजतन यातना शिविरों में उनकी जान गई. इसलिए 1949 में जब जर्मनी ने अपना संविधान "बेसिक लॉ" बनाया, तो उसमें शरण के अधिकार को शामिल किया गया, ताकि दोबारा कभी ऐसा कुछ ना हो सके.

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मौलिक अधिकार

ऐसा नहीं है कि इसके बाद जर्मनी नैतिक रूप से बेहतर लोगों का देश बन गया. ना ही देश का पूर्वी हिस्सा और ना ही पश्चिमी हिस्सा शरणार्थियों को समाज में समेकित कर पाया. पश्चिमी जर्मनी में उन्हें "गेस्ट वर्कर" कहा जाता था, जिसका साफ मतलब था कि एक ना एक दिन वे लोग अपने देश लौट जाएंगे, जो कि कभी हुआ नहीं. लेकिन संविधान में शरण का अधिकार बना रहा. इस पर सभी राजनीतिक पार्टियां एकमत भी रहीं. जर्मन लोगों के अनुभव इसकी बड़ी वजह रहे. और ये अनुभव 1945 में नाजी शासन के खात्मे के बाद भी जारी रहे.

ऐतिहासिक तजुर्बे और उनसे निकलने वाले सिद्धांत वक्त के साथ धुंधले पड़ जाते हैं और बदल भी सकते हैं, ये सामान्य सी बात है. लेकिन जर्मन संविधान में बेवजह शब्द नहीं लिखे गए हैं, इसलिए उन्हें बदला नहीं जा सकता, उनकी हमेशा हमेशा की गारंटी है. संविधान की बाकी की धाराओं को भी तभी बदला जा सकता है, जब संसद उसे दो तिहाई के बहुमत से पारित करे.

हाल के सालों में बड़ी संख्या में देश में शरणार्थियों के आने से और समाज के ध्रुवीकरण होने से देश बदल गया है. लोगों का बर्ताव रूखा और ठंडा हो गया है. शरण के संवैधानिक अधिकार को दांव पर लगाने से जर्मनी का इतिहास के एक अहम अध्याय से नाता टूट जाएगा. बेहतर होगा कि ऐसा न हो.

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