जर्मनी में अब नहीं मारे जाएंगे नर चूजे | विज्ञान | DW | 21.01.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

विज्ञान

जर्मनी में अब नहीं मारे जाएंगे नर चूजे

मुर्गी अंडे देती है. इसलिए काम की होती है. और मुर्गा? वो खास किसी काम का नहीं होता, इसलिए पैदा होते ही ज्यादातर नर चूजों को मार दिया जाता है.

बहुत लोग इस बात से अनजान होते हैं कि दुनिया भर में हर दिन करोड़ों नर चूजों को मार दिया जाता है. मीट इंडस्ट्री में बाकायदा ऐसे लोगों को नौकरी पर रखा जाता है, जिनका काम ही होता है नर और मादा चूजों को अलग अलग करना. मादा चूजे बड़े हो कर मुर्गी के रूप में अंडे भी देते हैं और उसका मांस भी 'चिकन' के रूप में खाया जाता है.

वैसे, खाया तो मुर्गे को भी जा सकता है. लेकिन मुर्गी कम दाना चुग कर भी फल फूल जाती है जबकि मुर्गा खूब खाता है और फिर भी ना ज्यादा मासपेशियां बना पाता है और ना ही उसका 'चिकन' इतना स्वादिष्ट होता है. तो कुल मिला कर मुर्गा सिर्फ ब्रीडिंग के काम आता है. इसलिए इसे पालना मीट उद्योग के लिए घाटे का सौदा साबित होता है. यही वजह है कि पैदा होते ही नर चूजों को मार दिया जाता है.

नर चूजे पैदा ही ना हों

जर्मनी में अब इस पर रोक लगने जा रही है. ऐसा करने वाला जर्मनी दुनिया का पहला देश है. 2022 से नर चूजों को श्रेडर में डालने की प्रक्रिया पर प्रतिबंध लग जाएगा. चिकन फार्म मालिकों को सुनिश्चित करना होगा कि नर चूजे पैदा ही ना हों. इसके लिए उन्हें तकनीक का सहारा लेना होगा. ऐसी तकनीक जो अंडे को देख कर ही बता देगी कि उसके अंदर नर चूजा मौजूद है या फिर मादा.

जर्मनी की कृषि मंत्री यूलिया क्लोएकनेर ने संसद में यह विधेयक पेश करते हुए कहा, "बहुद दुखद है कि दुनिया भर में ऐसा किया जाता है. लेकिन मैं इसे नैतिक रूप से स्वीकार नहीं सकती. इसलिए हम कानूनी रूप से पहले ऐसे देश होंगे जो इस हत्या को बंद करने जा रहा है."

बुधवार से जर्मनी में "ग्रीन वीक" की शुरुआत हुई है. इसी दौरान संसद में यह बिल लाया गया है. अंडों में लिंग कैसे निर्धारित किया जाएगा, इस तकनीक पर चर्चा चल रही है. 2024 से सिर्फ ऐसी तकनीक के इस्तेमाल को मंजूरी होगी जिसमें भ्रूण को कोई नुकसान या दर्द ना हो.

वीडियो देखें 05:28

क्या मीट खाना मुसीबतों की जड़ है?

बढ़ जाएंगे दाम

अकेले जर्मनी में ही हर साल साढ़े चार करोड़ नर चूजे मार दिए जाते हैं. पशु कल्याण कार्यकर्ता इसे "चिक श्रेडिंग" कहते हैं. इसे लेकर ना केवल वे विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं, बल्कि अदालत भी पहुंचे हैं. 2019 में अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि श्रेडिंग रोकना मीट उद्योग के आर्थिक लाभ को नजरअंदाज करता है, इसलिए इसे जायज माना जाए.

रिपोर्टों के अनुसार इस नए कानून के अमल में आने के बाद से देश में चिकन और अंडों के दाम बढ़ जाएंगे जिसका फार्म मालिक विरोध कर रहे हैं. जर्मनी में मीट की काफी बड़ी वैरायटी होती है. मुर्गों को किस हाल में रखा गया, उन्हें क्या खिलाया गया, वे कितने खुशहाल थे, इस सब के अनुसार उनके दामों को चार अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. जहां पहली श्रेणी का चिकन मात्र तीन यूरो प्रति किलो में मिल जाता है, वहीं चौथी श्रेणी का पंद्रह से बीस यूरो यानी लगभग डेढ़ हजार रुपये प्रति किलो में मिलता है. ऐसा ही अंडों के साथ भी है.

ईशा भाटिया (डीपीए)

__________________________

हमसे जुड़ें: Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन