जर्मनी का भूतिया अस्पताल | मंथन | DW | 23.09.2015
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मंथन

जर्मनी का भूतिया अस्पताल

बर्लिन के करीब एक शहर है बेलित्स, जहां भूतिया इमारतें हैं. जानिए क्यों पहुंच रहे हैं लोग बीते दिनों की भयावह याद दिलाने वाली इस जगह पर.

यह तस्वीर बेलित्स के सैनेटोरियम की है. 1902 में इसे फेफड़े के क्लीनिक के रूप में खोला गया था. दोनों विश्व युद्धों के दौरान यह सैनिक अस्पताल रहा. आज यह जगह खंडहर में तब्दील हो चुकी है. इसे देखने के लिए आने वाले लोगों को यह बीते दिनों की भयावह याद दिलाता है. टूरिस्ट के साथ ही फोटोग्राफी के शौकीनों में भी यह जगह लोकप्रिय हो रही है. ये उन जगहों में से एक है जहां अर्बन एक्स्प्लोरर पहुंच रहे हैं. खुद को "अरबेक्स" कहने वाले ये फोटोग्राफर दरअसल शहरों में पुरानी पड़ रही इमारतों की ओर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. इस बार मंथन में होगी ऐसी ही भूतिया इमारतों की सैर.

जब दिल का दौरा पड़ता है..

..तब डीफिब्रिलेटर का इस्तेमाल किया जाता है. यह मशीन दिल की धड़कन को सामान्य करने में मदद करती है. इमरजेंसी में यह काफी काम आती है. यही वजह है कि हवाई अड्डे, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक जगहों पर इसे रखा जाता है. मंथन की खास रिपोर्ट में जानिए कि जीवन बचाने वाली यह मशीन आखिर काम कैसे करती है.

साथ की सेहत की बातों में इस बार हम ध्यान देंगे प्रदूषण से धान को होने वाले नुकसान पर. कारों, ट्रकों और फैक्टरियों से निकलने वाला धुंआ कार्बन डाय ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और नाइट्रोजन जैसी जहरीली गैसों से भरा होता है. तेज धूप में ये गैसें ओजोन में तब्दील हो जाती हैं. वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि अब तक जितना सोचा जाता था, ओजोन के कारण चावल के खेतों को उससे काफी ज्यादा नुकसान होता है. इसलिए वैज्ञानिक अब चावल की ऐसी किस्म बनाने पर काम कर रहे हैं जिन्हें ओजोन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

ट्रक ड्राइवरों के लिए जुगाड़

केवल अनाज की गुणवत्ता ही नहीं, उसके यातायात के बारे में भी मंथन में चर्चा होगी. दरअसल यातायात का तरीका सभी देशों में लगभग एक ही जैसा है. अनाज या बड़े बड़े समान को जब एक जगह से दूसरी जगह ले जाना होता है तो ट्रक में लाद कर उसे ले जाया जाता है. और अधिकतर वही ट्रक खाली वापस आता है. ट्रक ड्राइवर भी रास्ते में सोने के लिए मजबूर होता है. इसे बदलने की कोशिश हो रही है. मंथन में जानिए कि ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए रिसर्चरों ने क्या जुगाड़ निकाला है.

साथ ही कार्यक्रम में बात लैटिन अमेरिकी देश पेरू की भी. दुनिया भर में आबादी बढ़ रही है और जंगलों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. देहातों में रहने वाले लोग फसल उगाने के लिए जंगल काट रहे हैं. नतीजा यह है कि जीने के लिए जरूरी धरती का फेफड़ा कमजोर होता जा रहा है. पेरू में भी यही हालत है जहां किसान जंगल काटकर कॉफी उगा रहे हैं. इसे बदलने के लिए क्या किया जा रहा है, जानने के लिए देखना ना भूलें मंथन शनिवार सूबह 11 बजे डीडी नेशनल पर.

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