जर्मनी का कोविड-19 ऐप बाकियों से बेहतर कैसे | दुनिया | DW | 16.06.2020
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दुनिया

जर्मनी का कोविड-19 ऐप बाकियों से बेहतर कैसे

भारत समेत कई देशों में कोरोना संक्रमण पर नजर रखने के लिए मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल हो रहा है. जर्मनी में ऐसा ऐप अब जाकर आया है लेकिन इसे यूजर्स की प्राइवेसी को सुरक्षित रखने के लिहाज से उन सबसे कहीं बेहतर बताया जा रहा है.

सब्र का फल मीठा होता है - यह कहावत जर्मनी के कोरोना वायरस चेतावनी ऐप पर भी लागू होती है. कहां तो चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश मार्च से ही ऐसे ऐप का इस्तेमाल करने लगे थे, और कहां फ्रांस जैसे यूरोपीय देश में यह जून की शुरुआत में इस्तेमाल में लाया गया. जर्मनी का नया कोरोना वायरस एलर्ट ऐप इन सबके बाद आया है लेकिन इसने यूजर के निजी डाटा को सुरक्षित रखने के मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है. इस ऐप में ऐसा कर पाना कैसे संभव हुआ, जानिए ऐसे सभी सवालों के जवाब:

बाकी देशों के मुकाबले जर्मनी में डाटा सुरक्षा का मुद्दा बेहतर तरीके से कैसे सुलझाया गया?

भारत या चीन में इस्तेमाल होने वाले चेतावनी ऐप्स में यूजर की कहीं भी आने जाने के बारे में पूरी जानकारी दर्ज होती है और उसे सरकारी कंप्यूटरों को भेजा जाता है. जबकि जर्मन ऐप यूजर की लोकेशन लेता ही नहीं है. प्रशासन को इससे यह पता नहीं चल सकता कि कोई व्यक्ति कहां है और इस तरह किसी की जासूसी नहीं हो सकती. ऐप केवल यह बताता है कि किसी यूजर के आसपास कितने और ऐप यूजर्स हैं और इसकी जानकारी ब्लूटूथ तकनीक से मिलती है. ब्लूटूथ एक ऐसा वायरलेस तरीका है जिससे कोई डिवाइस अपने आसपास की दूसरी डिवाइसों से डाटा का आदान-प्रदान करती है.

जर्मन राजधानी बर्लिन में दो बड़ी बड़ी निगाहों वाली ग्रैफिटी के पास से गुजरती महिला.

जर्मनी में यूजर्स की निजता की रक्षा एक अहम मुद्दा रहा है. ऐप के विकास में इस पर खास ध्यान दिया गया.

होता ये है कि फोन एक दूसरे को थोड़ी ही देर तक सक्रिय रहने वाले पहचान क्रमांक भेजते हैं. इस तरह का जो भी डाटा इकट्ठा होता है वह भी केवल यूजर के फोन में आने वाले दो हफ्तों तक सुरक्षित रहता है. जानकारी इस तरह से इनक्रिप्टेड होती है कि खुद फोन का मालिक भी उसे नहीं देख सकता. केवल कुछ ही डाटा ऐप के सर्वर और वेरिफिकेशन सर्वर पर भी जमा होता है. इसमें भी किसी की व्यक्तिगत जानकारी नहीं होती और इसका इस्तेमाल केवल वेरिफिकेशन कोड और ट्रांजैक्शन नंबर भेजने के लिए होता है. नियमित रूप से ऐसे कोड भेजने से पता चलता रहता है कि सिस्टम ठीक से काम कर रहा है या नहीं. पारदर्शिता बरतने और आम लोगों का इस ऐप में भरोसा जीतने के लिए इसे विकसित करने वालों ने ऐप के सोर्स कोड को पहले ही सार्वजनिक रूप से प्रकाशित भी कर दिया.

अगर कोई संक्रमित हो जाए तो यह ऐप कैसे चेतावनी देता है?

अगर लैब टेस्ट में कोई व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है तो टेस्ट के नतीजों के साथ उसके पास एक खास क्यूआर कोड भेजा जाता है. उस व्यक्ति को इस कोड को अपने स्मार्टफोन से स्कैन करना होगा. इसके बाद ही उसके फोन से एक चेतावनी का संदेश निकलेगा और उस संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों की जानकारी केंद्रीय सर्वर को पहुंचेगी. फिर सर्वर से अपने आप ही उन लोगों को पुश मैसेज चले जाएंगे जो पिछले दो हफ्तों में कम से कम 15 मिनट के लिए इस व्यक्ति के संपर्क में आए थे. एलर्ट संदेश पाने वाले इन लोगों को फिर इस बारे में भी सलाह दी जाएगी कि वे डॉक्टर से टेस्ट करवाएं और खुद को अलग-थलग कर लें.

कब आएगा ऐप और किसे इस्तेमाल करना होगा?

जर्मनी के स्वास्थ्य मंत्री येन्स श्पान ने घोषणा की है कि ऐप को विकसित करने वाली दो कंपनियां डॉयचे टेलीकॉम और सैप 16 जून को इसे पेश करेंगी और तभी से यह डाउनलोड के लिए उपलब्ध होगा. एंड्रॉयड के वर्जन 6 और आईओएस के वर्जन 13.5 के ऊपर वाले स्मार्टफोन पर ही इसे चलाया जा सकता है. यह सॉफ्टवेयर हुआवे के स्मार्टफोनों पर नहीं चलेगा. शुरुआत में यह ऐप जर्मन और अंग्रेजी में उपलब्ध होगा और आगे चलकर तुर्की भाषा में भी मुहैया कराया जाएगा.

इसमें क्या कमियां हैं?

कोरोना का टेस्ट करने वाली सभी लैबों और डॉक्टरों के पास ऐसी डिजिटल सुविधाएं नहीं है कि वे टेस्ट के नतीजों के साथ खास क्यूआर कोड जेनरेट कर भेज पाएं. इसका मतलब हुआ कि ऐसी जगहों पर हुए टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए लोगों को अलग से इन ऐप डिवेलपर्स द्वारा चलाई जा रही कोरोना हॉटलाइन पर फोन करके इसकी जानकारी देनी होगी. इनके कॉल सेंटर रोजाना ऐसी  1,000 कॉल्स को संभालने के लिए तैयार किए गए हैं.

इन कॉल्स पर होने वाली बातचीत में भी इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि उससे कॉलर की पहचान से जुड़ी कोई जानकारी उजागर ना हो. इसमें हमेशा गुंजाइश बनी रहेगी कि कहीं गलती से कोई व्यक्ति खुद ही कोई ऐसी जानकारी ना बता दे जिससे उसकी पहचान जाहिर हो जाए. 

सारे यूरोपीय ऐप्स की कुछ कमियां

जर्मन ऐप समेत यूरोपीय देशों के सभी कोरोना एलर्ट ऐप में एक कमी है. वह ये कि ये सब केवल अपने नागरिकों के लिए ही कारगर हैं. इनमें से किसी को भी विश्वस्तरीय नहीं बनाया जा सकता, यहां तक कि पूरे यूरोप में काम आने लायक भी नहीं है. फिलहाल यूरोप में ऐसे कोई सात तरह के उपाय पेश किए गए हैं लेकिन इनमें से कोई भी किसी तरह से संबंधित या साथ काम करने के लायक नहीं है. नतीजा यह है कि एक देश से दूसरे में जाने वाले यात्रियों के लिए ऐसा कोई एलर्ट सिस्टम नहीं है जिससे वे अपनी और दूसरों की सुरक्षा कर सकें. इस समय ऐसे यात्रियों को एक साथ हर देश का ऐप अपने साथ लेकर घूमना पड़ेगा.

लगभग सभी यूरोपीय ऐप्स ब्लूटूथ के माध्यम से भेजे जाने वाले डाटा पर आधारित हैं इसलिए कुछ हद तक तो ये सब डाटा सुरक्षा के न्यूनतम मानकों को पूरा करते हैं. लेकिन अगर आप फ्रांस का उदाहरण लें तो वहां डाटा को एक सेंट्रल सर्वर में इकट्ठा किया जाता है. ऑस्ट्रिया को लें तो वहां का एलर्ट सिस्टम कोरोना पॉजिटिव होने की पुष्टि से जुड़ा नहीं है जिससे कारण कई बार फॉल्स एलर्ट भेजना भी संभव हैं. इसी तरह ब्रिटेन में भी फॉल्स एलार्म की घटनाओं को देखते हुए अलग से व्यवस्था करनी पड़ी है.

भविष्य में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड आपस में मिलकर कुछ कर सकते हैं क्योंकि केवल इन्हीं देशों का एलर्ट सिस्टम उन समान मानकों पर आधारित है जिसे ऐप्पल और गूगल ने विकसित किया है.

क्या ऐप फोन की बैटरी जल्दी खाली कर देगा?

डिवेलपर्स को भी इसकी चिंता थी इसीलिए उन्होंने ऐप को ऐसा बनाया जो हर समय अपने आसपास के दूसरे स्मार्टफोन ना तलाशता रहे. ऐसा कुछ समय के अंतराल पर होता है और वह भी केवल कुछ देर के लिए.  इस तरह यूजर के फोन की बैटरी पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ेगा. 

कोरोना वायरस से जंग में इस ऐप के फायदे कब सेदिखनेकी उम्मीद है?

विशेषज्ञों का लक्ष्य है कि करीब 60 फीसदी आबादी के फोन में यह ऐप इंस्टॉल करवाया जाए. जबकि जर्मन स्वास्थ्य मंत्री श्पान ने एक स्थानीय अखबार से बातचीत में कहा कि अगर कुछ लाख लोग भी इसे इस्तेमाल करने लगें तो उन्हें संतुष्टि होगी.

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