जरूरी है दलित कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण | ब्लॉग | DW | 14.05.2019
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जरूरी है दलित कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में एससी एसटी कर्मचारियों को मिलने वाले आरक्षण से जुड़े कर्नाटक सरकार के कानून को बरकरार रखा है. इसे लेकर बहुत लंबे समय से कानूनी लड़ाई और राजनीतिक विवाद भी चल रहे थे.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की बेंच ने पिछले दिनों राज्य सरकार की आरक्षण की दलील को मानते हुए ये फैसला सुनाया है कि कैडर में प्रमोशन पर आधारित बढ़ोत्तरी को क्रीमी लेयर में पहुंच जाने की तरह नहीं देखा जा सकता. लिहाजा एससी एसटी को पदोन्नति में भी आरक्षण मिलना चाहिए.

कर्नाटक सरकार ने अपने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) कर्मचारियों के लिए 2002 में एक कानून लाकर प्रमोशन मे आरक्षण की व्यवस्था की थी. संवैधानिक वैधता को चुनौती मिलने के बाद 2006 में संविधान पीठ ने उसकी वैधता को तो माना लेकिन एक मात्रात्मक डाटा की उपलब्धता का मुद्दा उठाते हुए राज्य सरकार को एससीएसटी समुदायों में पिछड़ेपन के निर्धारण से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने को कहा था. 2011 और 2017 में राज्य सरकार के अधिनियम को फिर चुनौती दी गई. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य को इस बारे में आधिकारिक तौर पर स्पष्ट करना ही होगा कि इस तरह के आरक्षण को लागू करने की क्या अपरिहार्यताएं थीं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर कर्नाटक सरकार ने तत्कालीन मुख्य सचिव के रत्न प्रभा की अगुवाई में एससीएसटी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व में अपर्याप्तता और उनके सामाजिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने के लिए एक कमेटी का गठन किया. कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही राज्य सरकार ने आरक्षण बिल विधानसभा में रखा जो 2018 में अधिनियम के रूप में प्रभावी हो गया. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. दस मई को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कमेटी की सिफारिशों और अधिनियम के मकसद और पृष्ठभूमि का अध्ययन करते हुए पाया कि परिणामी वरिष्ठता, अतिरिक्त लाभ नहीं है बल्कि एससीएसटी कर्मचारियों को हासिल पदोन्नति के परिणामवश हासिल होती है.

ये तथ्य निर्विवाद है कि आजादी के 70 साल बाद दलितों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में बहुत मामूली सा सुधार ही आ पाया है. राजनीतिक रूप से ये वर्ग पहले की अपेक्षा अधिक मुखर है और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दायरा भी बढ़ रहा है लेकिन विडंबना ये है कि दलितों की जीवन दशाएं अब भी चिंताजनक बनी हुई है. आर्थिक उदारवाद ने उन्हें और अंधेरों की ओर धकेला है. आरक्षण से कुछ सशक्तीकरण आया लेकिन इसके समांतर दलितों पर बैकलैश की घटनाएं भी बढ़ी है. उनके प्रति सवर्णों के एक बड़े हिस्से में दुराव और नफरत देखी जाती है जिन्हें लगता है कि दलित उनके अवसरों को हथिया रहे हैं. सवर्णवादी जातीय श्रेष्ठता की ग्रंथि हावी है और वंचित समूहों को मुकम्मल भागीदारी से दूर रखा जा रहा है. दलितों के नाम पर वोटबैंक की राजनीति भी उन पर वार करती रही है.

नौकरियों की ही बात करें तो आईएस, आईपीएस और आईएफएस जैसी सर्वोच्च सिविल सेवाओं में एससी, एसटी अधिकारियों की संख्या निर्धारित कोटे से कम है. 2011 के एक आंकड़े के मुताबिक, 3251 प्रत्यक्ष भर्ती वाले आईएएस अधिकारियों में से एससी अधिकारी करीब 14 प्रतिशत, एसटी करीब सात प्रतिशत और ओबीसी करीब 13 प्रतिशत थे. बड़े पैमाने पर आरक्षित पद खाली हैं. आंकड़े बताते हैं पदानुक्रम में ऊपर जाते हुए एससी एसटी कर्मचारियों की संख्या घटती जाती है. ग्रुप ‘ए' में सिर्फ करीब 11 प्रतिशत एससी हैं और करीब साढ़े चार प्रतिशत एसटी. ग्रुप ‘डी' में एससी करीब 19 फीसदी और एसटी सात फीसदी हैं.

यहां पर आकर सारा सामाजिक तानाबाना और तमाम नारें ढीले पड़ने लगते हैं. अकादमिक क्षेत्र में भी एससी एसटी प्रतिनिधित्व नगण्य ही कहा जाएगा. सरकार के ही एक आंकड़े के मुताबिक देश की 23 आईआईटी के कुल 6043 फैकल्टी पदों में से 149 एससी और 21 एसटी फैकल्टी हैं. यानी करीब तीन प्रतिशत! देश के मैनेजमेंट संस्थानों, आईआईएम में भी कमोबेश यही हालात हैं. विश्वविद्यालयों, कॉलेजो और स्कूलों में कितने एससी एसटी होंगे- आप अंदाजा लगा सकते हैं. और बात सिर्फ टीचिंग ही नहीं नॉन टीचिंग स्टाफ की भी है.

सामाजिक हालात के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस साल में दलितों पर अपराध 66 फीसदी की दर से बढ़े हैं. दलित महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं, दलितों पर हर किस्म के हमले बढ़े हैं, दलितों की लिंचिंग के मामले भी अब सामने आ रहे हैं. समाज, राजनीति, आर्थिकी और संस्कृति से उन्हें खदेड़ देने के सवर्णवादी अभियान तो इस समय लगता है जोरों पर हैं. सच्चर कमेटी की सिफारिशों की समीक्षा और अमल के लिए गठित कुंडु समिति ने ग्रामीण इलाकों में दलितों की बदहाली को रेखांकित किया है. दलितों की साक्षरता दर सुधरी है. लेकिन सामान्य वर्ग की 74 फीसदी साक्षरता के मुकाबले उनकी दर 66 फीसदी ही है.

सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित छात्रों के नामांकन की दर पहले के मुकाबले कुछ सुधरी है लेकिन ये अपेक्षित दर नहीं है. एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट, 2011 के मुताबिक शिक्षा के निजीकरण का सबसे ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ है क्योंकि उनके बच्चे महंगी शिक्षा से वंचित हुए हैं. सोशियो इकोनमिक कास्ट सेंसस नाम की संस्था का सर्वे है कि अनुसूचित जाति के परिवारों में एक फीसदी से भी कम घरों में कोई सदस्य सरकारी नौकरी पर है. तो ऐसे हालात में कहां है वो दलितों की ‘क्रीमी लेयर' जिसे लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद उठाए जाते हैं और उन्हें बराबरी के हक से दूर करने की कोशिशें की जाती हैं.

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