जयललिता की रिहाई और तमिलनाडु की राजनीति | ब्लॉग | DW | 11.05.2015
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ब्लॉग

जयललिता की रिहाई और तमिलनाडु की राजनीति

पिछले साल जयललिता ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर ओ पन्नीरसेल्वम को अपनी जगह बिठाया. अब पन्नीरसेल्वम उनके लिए कुर्सी खाली कर देंगे. यह जयललिता पर निर्भर करता है कि वह आज मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं या कुछेक दिन बाद.

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एआईएडीएमके सुप्रीमो जे जयललिता को भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से बरी कर दिया है. अभियोजन पक्ष के वकील का कहना है कि अदालत ने उन्हें मौखिक रूप से अपनी दलीलें पेश करने का मौका नहीं दिया. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जाएगी या नहीं, लेकिन यह बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि इस फैसले का तमिलनाडु की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा. सबसे पहला असर तो यही होगा कि जयललिता फिर से राज्य की मुख्यमंत्री बन जाएंगी. पिछले साल उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपने विश्वासपात्र ओ पन्नीरसेल्वम को अपनी जगह बिठाना पड़ा था. अब पन्नीरसेल्वम इस्तीफा देकर उनके लिए कुर्सी खाली कर देंगे. यह जयललिता पर निर्भर करता है कि वह आज मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं या कुछेक दिन बाद.

एआईएडीएमके में जयललिता का एकछत्र वर्चस्व है. उनकी इच्छा के बिना पार्टी या सरकार में कुछ भी नहीं हो सकता. जब से उन्होंने मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ी थी, राज्य में प्रशासन लगभग ठप्प हो गया था. सिर्फ पननीरसेल्वम को उनकी इच्छा का कुछ-कुछ पता होता था और वह उसके अनुसार काम करते थे. अन्य मंत्री अपनी राय से कोई भी निर्णय करते हुए घबराते थे इसलिए अफसरों के सहारे काम चल रहा था. अब जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशासन की रफ्तार सामान्य हो जाएगी.

समर्थन में जबर्दस्त लहर

तमिलनाडु में अगले नौ-दस माह बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. एक संभावना यह भी है कि जयललिता मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्यपाल से विधानसभा भंग करने की सिफारिश करें ताकि इस समय मिले राजनीतिक लाभ को समय पर ठीक ढंग से भुनाया जा सके. मुख्यमंत्री बनने के छह माह के भीतर उन्हें विधानसभा का सदस्य बनना होगा. इसके लिए कोई भी पार्टी विधायक अपनी सदस्यता छोड़ सकता है. लेकिन इस बात का कोई भरोसा नहीं कि निर्वाचन आयोग ठीक छह माह के भीतर ही उपचुनाव करा देगा. दूसरे, इस समय जयललिता के पक्ष में फैसला आने से राज्य भर में उनके समर्थन में जबर्दस्त लहर पैदा हो गई है. उधर विपक्षी डीएमके एक ओर भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसी है (पार्टी सुप्रीमो एम करुणानिधि की पुत्री कणीमोझी और प्रमुख नेता ए राजा काफी समय जेल में भी रह चुके हैं) और दूसरr ओर भीषण अंतर्कलह का सामना कर रही है. करुणानिधि बूढ़े शेर की तरह निरुपाय हैं. पिछले चुनाव में उनकी पार्टी की जबर्दस्त हार हुई थी. ऐसे में जयललिता के लिए यह बेहतरीन मौका है कि समय से पहले चुनाव कराकर वह एक बार फिर डीएमके को धूल चटा दें.

चुनाव में बाजी उन्हीं के हाथ

जयललिता के समर्थन में उठी जनलहर यह भी सुनिश्चित कर देगी कि तमिलनाडु में अपनी जड़ें जमाने की भारतीय जनता पार्टी की कोशिशें आने वाले कुछ समय तक नाकाम ही रहेंगी और कांग्रेस भी अपने खोये हुए गौरव को पुनः प्राप्त करने में असफल रहेगी. भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी डीएमके के बरक्स जयललिता अपनी बेदाग छवि लेकर जनता के सामने जाएंगी. स्पष्ट है कि चुनाव में बाजी उन्हीं के हाथ रहेगी.

लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय कुछ भी फैसला दे, देश की जनता इतनी भोली नहीं कि वह यह न जानती हो कि जयललिता के पास अपार धन कहां से और कैसे आया है. जिस राजसी शानो-शौकत और ठाट-बाट के साथ उन्होंने अपने दत्तक पुत्र की शादी की थी, लोग इतने वर्षों बाद भी उसे भूले नहीं हैं. तमिलनाडु में भले ही जयललिता के समर्थक भावविभोर हो रहे हों लेकिन शेष देश में लोग इस फैसले पर उसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं जिस तरह की प्रतिक्रिया पिछले शुक्रवार से अभिनेता सलमान खान को मिली जमानत पर कर रहे थे. इस तरह के फैसलों से जनता का यह विश्वास कमजोर पड़ता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार


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