जब चाहेंगे आएंगे प्यारे सपने | विज्ञान | DW | 17.05.2014
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विज्ञान

जब चाहेंगे आएंगे प्यारे सपने

सपने क्यों आते हैं, इस बारे में कई मिथक हैं. कोई कहता है कि सपनों का हकीकत से कोई लेना देना नहीं है, तो किसी का मानना है सपने हमारे अनुभवों की झलक हैं और इन पर हमारा कोई बस नहीं. लेकिन अब सपनों को बदलना भी मुमकिन है.

लियोनार्डो डी केप्रियो की फिल्म 'इनसेप्शन' का एक दृश्य, लियो सपनों की दुनिया में विलेन से लड़ रहे हैं. वे जानते हैं कि यह सपना है और उन्हें सपने में ही अपना काम पूरा कर के जग जाना है. उनके सपने पर नियंत्रण करने में कुछ अन्य लोग भी मदद करते हैं. फिल्म को देख कर लोग उलझन में पड़ गए थे. कई बार तो यह समझना ही मुश्किल हो जाता था कि सपना कौन सा है और हकीकत कौन सी. शायद फिल्म के ये दृश्य जल्द ही असली जिंदगी में भी अनुभव किए जा सकें. फ्रांस में वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग के तहत लोगों के सपनों पर नियंत्रण कर के दिखाया. इसके लिए बिजली का झटका दिया गया.

वैज्ञानिकों का मानना है कि नींद के कई चरण होते हैं. इन्हीं को कच्ची नींद और पक्की नींद कहा जाता है. पक्की नींद में दिमाग इतना शांत हो चुका होता है कि सपने नहीं देखता. कच्ची नींद में बहुत हलचल होती है. इस दौरान आंखों की पुतलियां भी हिलती रहती हैं. इसे रैपिड आई मूवमेंट या आरईएम कहा जाता है. यह अचेतन मन की स्थिति है. वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि जगे होने और आरईएम के बीच एक चरण होता है, जब अच्छे सपने आते हैं. इसे चेतना और अवचेतना के बीच की स्थिति बताया गया है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को पता होता है कि वह सपना देख रहा है और अगर वह कोशिश करे तो अपने सपनों पर नियंत्रण भी कर सकता है.

चेतना और अवचेतना के बीच

सपनों को समझने के लिए फ्रैंकफर्ट की गोएथे यूनिवर्सिटी में टीऐसीइस नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया गया. 18 से 26 वर्ष की 15 महिलाओं और 12 पुरुषों को इस प्रयोग का हिस्सा बनाया गया. इन सबको चार रातें एक 'स्लीप लैब' में बितानी पड़ी. वैज्ञानिकों ने सबों की नींद के पैटर्न पर नजर रखी. जैसे ही ये लोग दो से तीन मिनट तक आरईएम फेज में बिता लेते थे, उनके सर के पास मशीन लाई जाती और हल्का सा बिजली का झटका दिया जाता. यह झटका इतना हल्का था कि उनकी नींद ना टूट सके. तीस सेकंड तक ऐसा किया जाता. बाद में जब वे नींद से जगते, तो उनसे पूछा जाता कि उन्होंने क्या सपना देखा.

सभी ने कहा कि उन्हें ऐसा लगा जैसे वे "बाहर से खुद को देख रहे हों", जैसे स्क्रीन पर फिल्म चल रही हो. इन सभी का कहना था कि इस दौरान वे जानते थे कि वे सपना देख रहे हैं. वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे जैसे झटका बढ़ाया गया, लोग अपने सपने को और भी ज्यादा नियंत्रण में लेने लगे. एक व्यक्ति ने कहा, "मैं कार चला रहा था, बहुत देर तक. फिर मैं एक ऐसी जगह पहुंचा जहां मैं पहले कभी नहीं आया था और वहां बहुत सारे लोग थे. मेरे ख्याल से मैं उनमें से कुछ लोगों को जानता हूं. लेकिन वे सब बुरे मूड में हैं. इसलिए मैं एक अलग कमरे में चला जाता हूं, खुद, अपनी मर्जी से."

उम्मीद की जा रही है कि इस इस रिसर्च का मानसिक बीमारियों के इलाज में फायदा मिल सकेगा. साथ ही जो लोग किसी सदमे से गुजर रहे हैं, या बुरे सपनों से परेशान हैं, उन्हें भी मदद मिल सकेगी. रिसर्च करने वाली उर्सुला फॉस का कहना है कि वह दिन दूर नहीं जब टीऐसीइस तकनीक वाली मशीन बाजार में मिला करेगी और लोग लुभावने सपनों के लिए इसका इस्तेमाल किया करेंगे. हालांकि उनकी सलाह है कि ऐसा मनोरोग विशेषज्ञ की मौजूदगी में ही किया जाना चाहिए.

आईबी/एमजे (एएफपी)

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