जबरन नसबंदी झेलने वाली औरतों को मिलेगा अब ′न्याय′ | दुनिया | DW | 10.02.2021
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दुनिया

जबरन नसबंदी झेलने वाली औरतों को मिलेगा अब 'न्याय'

यूरोपीय देश चेक रिपब्लिक में रोमा बंजारों की आबादी को काबू करने के लिए गुपचुप सैकड़ों महिलाओं की नसबंदी कर दी गई. वे सरकार से मुआवजा चाहती हैं और लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं. अब उनकी कोशिशें कामयाब हो रही हैं.

रोमा बंजारे

रोमा समुदाय यूरोप का सबसे गरीब समुदाय है

इन महिलाओं को मुआवजा देने के एक विधेयक पर चेक रिपब्लिक की संसद में बहस हो रही है. इसके तहत हर महिला को तीन लाख चेक कोरुना यानी लगभग 14,100 डॉलर देने की बात कही गई है. ये नसबंदियां 1970 और 1980 के दशक में हुई थी. उस वक्त चेक रिपब्लिक चेकोस्लोवाकिया का हिस्सा था और देश में कम्युनिस्ट शासन था. लेकिन कई मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि इस सदी में भी ऐसा हुआ है.

चेक सरकार ने 2009 में इन नसबंदियों पर "अफसोस" जताया था लेकिन मुआवजे की पेशकश नहीं की. एलेना गोरोवा 15 साल से मुआवजे के लिए चल रही मुहिम से जुड़ी हैं. वह 21 साल की थीं, जब उनकी नसबंदी की गई.  वह बताती हैं कि कुछ महिलाओं से कहा गया था कि नसबंदी कराने के लिए उन्हें पैसे मिलेंगे जबकि कुछ महिलाओं को धमकी भी दी गई कि अगर उनके और बच्चे हुए तो उनके मौजूदा बच्चे छीन लिए जाएंगे.

ये भी पढ़िए: भारत से निकल कर यूरोप तक पहुंचने वाले रोमा कौन हैं?

गरीबी और भेदभाव

यूरोप की मानवाधिकार संस्था ने चेक सांसदों से कहा है कि बिल को पास कर दिया जाए क्योंकि यह इंसाफ करने का आखिरी मौका है. कुछ पीड़ित महिलाओं की तो मौत भी हो चुकी है. बहुत सी महिलाओं की तरह गोरोलोवा की नसबंदी भी ऑपरेशन से बच्चे पैदा करने के दौरान की गई. कई महिलाओं से नसंबदी के समय कहा गया कि यह सिर्फ कुछ समय के लिए है. उसके बाद फिर से उनके बच्चे पैदा हो सकते हैं.

पिछले साल चेक संसद को लिखे गए यूरोपीय मानवाधिकार परिषद की आयुक्त दुनिया मिजातोविच के पत्र में कहा गया, "इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए. हालांकि पीड़ितों को शारीरिक और मानसिक तौर पर जो नुकसान हुआ है, उसे पलटा नहीं जा सकता... मुआवजे की व्यवस्था कर इन महिलाओं को कुछ न्याय दिया जा सकता है जो उन्हें बहुत समय से नहीं मिला."

रोमा यूरोप में रहने वाला सबसे गरीब समुदाय है. चेक रिपब्लिक में लगभग 2.4 लाख रोमा लोग रहते हैं. चेक सरकार के अनुसार देश की आबादी रोमा लोगों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत है. बहुत से रोमा लोग गरीबी में रहते हैं. वे अपने साथ शिक्षा, रोजगार और निवास संबंधी भेदभाव का आरोप लगाते हैं.

रोमा बंजारे

रोमा अपने साथ भेदभाव होने का आरोप लगाते हैं

मजबूत होंगी कोशिशें

यह कोई नहीं जानता है कि कितनी रोमा महिलाओं की नसबंदी की गई, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि सैकड़ों महिलाएं मुआवजे की हकदार हैं. ऐसा आखिरी मामला 2007 में प्रकाश में आया था. गोरोलोवा कहती हैं, "इसका हम सब पर बहुत ही बुरा असर पड़ा है." 1990 में उनके दूसरे बेटे की पैदाइश के समय उनकी नसबंदी की गई थी. उन्होंने बताया, "जब डॉक्टर ने मुझे बताया... तो मैं तो सदमे में आ गई. मैं रोने लगी. मैं चाहती थी कि मेरी एक छोटी सी बेटी भी हो, मेरे पति की भी यही इच्छा थी."

गोरोलोवा अपने जैसी लगभग 200 महिलाओं के संपर्क में हैं. वह बताती हैं कि नसबंदी के बाद कुछ महिलाओं की शादी टूट गई जबकि अन्य महिलाओं को जीवनभर के लिए बीमारियां मिल गईं.

यूरोपीय मानवाधिकार परिषद की आयुक्त मिजातोविच कहती हैं कि एक सरकारी जांच में पता चला कि चेकोस्लोवाकिया में रोमा महिलाओं की नसबंदी की नीति थी. 1993 में यह देश दो हिस्सों में बंट गया, चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया. मिजातोविच का कहना है कि अब चेक रिपब्लिक में मुआवजे के जिस बिल को तैयार किया गया है, उसे सभी पार्टियों का समर्थन प्राप्त है. इससे स्लोवाकिया में ऐसी कोशिशों को बल मिलेगा.

इसी तरह जबरन नसबंदी के मामले हंगरी, स्विटजरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे में भी सामने आए थे. मिजातोविच कहती हैं कि ऐसी नीतियों का मकसद समाज के सबसे निचले तबके के लोगों को प्रताड़ित करना था.

एके/आईबी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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