चुनाव की प्रक्रिया में सुधार का वक्त आ गया है | ब्लॉग | DW | 03.05.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

ब्लॉग

चुनाव की प्रक्रिया में सुधार का वक्त आ गया है

भारत में पांच प्रांतों में चुनाव हुए थे. इन प्रांतों के चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों के अलावा क्षेत्रीय पार्टियां भी मैदान में थीं. सभी राज्यों के चुनाव नतीजे एक बात बहुत जोर से पुकार रहे हैं.

और ये बात है कि चुनाव की प्रक्रिया में सुधार का वक्त आ गया है. अभी तक सभी पार्टियां देश की चुनाव प्रक्रिया में सुधार को इस वजह से नजरअंदाज करती रही हैं कि भले ही अभी उनका नुकसान हो रहा हो, लेकिन कभी न कभी, किसी न किसी चुनाव क्षेत्र में इसका फायदा तो मिलेगा. जीतने वाली पार्टी अगली बार हारने तक इसके बारे में क्यों सोचे, उसे तो अभी अभी फायदा हुआ है.

अलग अलग राज्यों में अगर विभिन्न पार्टियों को मिले वोटों और उन्हें मिली सीटों को देखें तो चुनी हुई प्रतिनिधि सभा और मतदाताओं के प्रतिनिधित्व में बहुत बड़ा अंतर दिखता है. मसलन केरल में प्रधानमंत्री की बीजेपी को करीब 12 प्रतिशत वोट मिले हैं लेकिन सीटें एक भी नहीं मिली हैं. इसके मायने हैं कि केरल के उन बारह फीसदी लोगों का विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को चुना है. इसी तरह कांग्रेस और सीपीएम को बराबर 25 फीसदी वोट मिले हैं लेकिन सीटों में दो तिहाई का अंतर है.

दूसरा सवाल ध्रुवीकरण का है. पश्चिम बंगाल में 86 फीसदी वोट तृणमूल और बीजेपी को मिले हैं. बाकी 14 फीसदी वोट 14 पार्टियों को मिले हैं जिनमें कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल हैं जो दशकों तक प्रांत में सत्ता में रही हैं. यह ध्रुवीकरण राज्य में राजनीतिक संगठनों को कमजोर कर रहा है और इस प्रक्रिया में अंततः लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है. ये संगठन नहीं बचेंगे तो लोकतांत्रिक बहस को लोगों तक कौन ले जाएगा.

इन पांच राज्यों में जो पार्टियां सरकार बना रहीं हैं, उनमें से असम में सरकार बनाने वाले बीजेपी के अलावा कोई भी पार्टी किसी और राज्य में महत्वपूर्ण नहीं है. पार्टियों का ये विघटन भी लोकतंत्र को कमजोर करता है. भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. भविष्य में भी वह कुशल लोकतंत्र बना रहे, इसके लिए पार्टियों को मिलजुलकर ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिसमें वे प्रासंगिक बने रहें.

देश में बहुत सी पार्टियां अपनी प्रासंगिकता खोती जा रही हैं, इन पार्टियों के नेता अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए चुनाव के समय किसी भी पार्टी में शामिल हो जाते हैं. लोगों का भरोसा राजनीतिज्ञों पर से उठता जा रहा है. प्रतिस्पर्धी राजनीति लोकतंत्र की जान होती है. इसके लिए राजनीतिक दलों में लोगों का भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है. विधानसभाओं में पार्टियों को उन्हें मिलने वाले मतों के अनुरूप सीट देने से मतदाताओं को अपना प्रतिनिधित्व मिलेगा और अपने फायदे के लिए राजनीतिक दलों का इस्तेमाल करने वाले राजनीतिज्ञों के पर कटेंगे.

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन