चुनावों में कहां है स्वच्छ हवा और पानी का मुद्दा | भारत | DW | 25.03.2019
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भारत

चुनावों में कहां है स्वच्छ हवा और पानी का मुद्दा

जाति और धर्म के आधार पर भारत में चुनाव जीते और हारे जाते हैं. लेकिन इन मुद्दों से कहीं बड़ा पर्यावरण का मसला है. दूषित हवा हर धर्म और हर जाति के लोगों को जान लेती है.

17वीं लोकसभा के लिए 90 करोड़ भारतीय वोट डालेंगे. ये चुनाव ना केवल राजनीतिक और आर्थिक महत्व का है बल्कि इस बार के चुनाव में कुछ नया होने वाला है. भारतीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस लोकसभा चुनाव में लगभग 4.5 करोड़ युवा, जो अभी 18 वर्ष के हुए हैं, पहली बार मतदान करने वाले हैं. यह एक ऐसी संख्या है जिसे कोई भी राजनीतिक दल नजरअंदाज नहीं कर सकता.

नौकरियों और आर्थिक विकास जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों के बीच, यह युवा वर्ग अच्छा बुनियादी ढांचा और बेहतर जीवन भी चाहता है. मुंबई में अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई कर रही 21 वर्षीय निष्ठा मदान चाहती है कि राजनेता पर्यावरण के मुद्दों को महत्व दें. निष्ठा का मानना है कि "विशेष रूप से युवा और आने वाली पीढ़ियां, पर्यावरणीय मुद्दों को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में देखना चाहते हैं. इसलिए यदि राजनीतिक दल विकास के बारे में बात कर रहे हैं, तो वे पर्यावरण को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं.”

राष्ट्रीय राजधानी, नई दिल्ली में रहने वाली स्तुति मिश्रा को भी उम्मीद है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को हल करेंगे. 24 वर्षीय स्तुति का कहना है कि "जलवायु परिवर्तन ने कभी भी भारतीय राजनेताओं का ध्यान आकर्षित नहीं किया है. यहां तक कि वायु प्रदूषण जो हर साल सर्दियों में राष्ट्रीय राजधानी के निवासियों को परेशान करता है, एक क्षेत्र विशेष का मुद्दा बना हुआ है. आज हमारे अधिकांश प्रमुख शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर रूप से निचले स्तर पर हैं. मुझे नहीं लगता कि भारतीय मतदाता अपने दिमाग में पर्यावरण से संबंधी मुद्दों के साथ मतदान करते हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि भविष्य में वे ऐसा करेंगें.”

Indien Moderator verteilt Atemmasken gegen Smog (Getty Images/AFP/P. Singh)

शहरों में सांस संबंधी बीमारियों के बढ़ते मामले

सरकार ने अभी तक क्या किया है?

पिछले कुछ बरसों में भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार सौर, पवन और हाइड्रो ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को खासी तवज्जो दी है. इसकी वजह से भारत अब दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा अक्षय ऊर्जा उत्पादक देश है. इसके अलावा देश दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा क्षमता और पांचवा सबसे बड़ा सौर क्षमता वाला देश बना चुका है. 2015 के पेरिस जलवायु समझौते में भारत ने 2022 तक 175 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का वादा किया है. इसलिए 2014-15 और 2017-18 के बीच अक्षय ऊर्जा के बजटीय आवंटन में 38.9% की वृद्धि भी की गई. इसके लिए 2010-11 में राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण निधि (NCEEF) का गठन किया गया था.

दिसंबर 2017 की अपनी ऑडिट रिपोर्ट में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने कहा कि 53,967 करोड़ रुपये, छह साल में 2016-17 तक, स्वच्छ ऊर्जा उपकर के रूप में इकट्ठा किए गए. इसमें से केवल 28% यानी 15,483 करोड़ रुपये NCEEF को दिए गए.

अक्षय ऊर्जा में बदलाव न केवल स्थिरता के लिए है, बल्कि यह प्रदूषण के मुद्दे से भी निपटता है. अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है. वायु प्रदूषण के मामले में भारत का रिकॉर्ड लगातार गिरता जा रहा है. एयर विजुअल की रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के मामले में दुनिया के 30 सबसे दूषित शहरों में भारत के 22 शहर शामिल हैं. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण 6.2 लाख लोग समय से पहले मारे जाते हैं.

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सरकार द्वारा उठाए गए कदम सही दिशा में हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं. टीईआरआई स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज की वाइस चांसलर लीना श्रीवास्तव ने कहा कि "सरकार ने देश में अक्षय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए एक बहुत ही महत्वाकांक्षी कार्यक्रम स्थापित किया है और यह ऊर्जा दक्षता में सुधार पर भी केंद्रित है. हम इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ रुख करने पर एक जोर दे रहे हैं, हालांकि इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे में कई साल और बड़े निवेश करने की जरूरत है. मुझे लगता है कि सरकार को जलवायु एजेंडे पर भागीदार बनने के लिए समुदायों और आम लोगों को जुटाने की आवश्यकता है."

एजेंडा पर नहीं

श्रीवास्तव कहती हैं, "हालांकि अवसर बहुत से हैं और स्थानीय मुद्दों जैसे वायु प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल संरक्षण आदि के साथ जलवायु के बीच एक मजबूत संबंध मौजूद है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल 2019 के आम चुनावों में इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहा है. दुर्भाग्य से ध्यान अभी भी जाति, समुदाय और सुरक्षा जैसे अधिक परंपरागत मुद्दों पर बना हुआ है."

लेखक और पर्यावरणविद अन्नदा बनर्जी का कहना है कि "सरकार के मोर्चे पर हमने सभी सही कदम लिए हैं लेकिन जब आप राजनीतिक दल के अंदर देखते हैं तो व्यावहारिक रूप से कुछ भी नहीं है. पर्यावरण एक राजनीतिक एजेंडे के रूप में ज्यादा नहीं है.” विशेषज्ञों का तर्क है कि सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों में विशेषज्ञों और वैज्ञानिक रिसर्च का अभाव है. उनका सुझाव है कि सांसदों और विधायकों अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जलवायु और पर्यावरण को एजेंडा बनाना चाहिए.

आगे क्या होना चाहिए ?

बीजेपी और कांग्रेस के 2014 के चुनावी घोषणापत्रों में जलवायु और पर्यावरण पर कोई जोर नहीं दिया गया था. इस बार पार्टियों ने आम लोगों से उन मुद्दों पर अपने सुझाव देने के लिए कहा है जिन्हें वे पार्टी के 2019 के आम चुनाव घोषणापत्र में शामिल करना चाहते हैं. पर्यावरणविद अवलोकिता शाह, जो आरे संरक्षण समूह के साथ काम करती है, बताती हैं, "हमें विशेषज्ञों, पेशेवरों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, इकोलॉजिस्ट और अकादमिक समूह की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है जो प्रकृति में वैज्ञानिक रूप से डाटा-संचालित रिसर्च कर सकते हैं. स्कूलों, कॉलेजों और संस्थानों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के मुद्दों पर सक्रिय रूप से बात करने की आवश्यकता है.”

बेहतर भविष्य के लिए

भारत ही नहीं बल्कि दुनिया को उम्मीद है कि राजनेता अपने उन वादों को पूरा करें जो उन्होंने जलवायु को सुधारने के लिए किए हैं. भारत के लिए यह अच्छा होगा कि अब तक की गई प्रगति पटरी से न उतरे और नई सरकार इस जरूरी मुद्दे को अपनी प्राथमिकता सूची से न हटाए.

(सौर ऊर्जा के चैंपियन देश)

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