चीन सेना की ओर से अरुणाचल प्रदेश से अपहृत पांच युवकों का कोई सुराग नहीं | भारत | DW | 07.09.2020
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भारत

चीन सेना की ओर से अरुणाचल प्रदेश से अपहृत पांच युवकों का कोई सुराग नहीं

अरुणाचल प्रदेश में चीनी सेना के हाथों पांच स्थानीय युवकों के कथित अपहरण की घटना पर विवाद तेज हो रहा है. अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ (आप्सू) समेत कई संगठन अपहृत युवकों की वापसी के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं.

राज्य के दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में चीनी सैनिकों के लगातार अतिक्रमण का मुद्दा गंभीर होते देख कर अब भारतीय सेना ने हॉटलाइन पर चीनी सेना के अधिकारियों से बात की है. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और अरुणाचल के सांसद किरण रिजिजू ने अपने ट्वीट में इसकी जानकारी दी है. बावजूद इसके उन युवकों का अपहरण के चार दिनों बाद भी अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. अपहृत युवकों के परिजनों ने यह दावा कर मामले की गंभीरता बढ़ा दी है कि वह भारतीय सेना के लिए पोर्टर यानी पीठ पर सामान ढोने का काम करते थे. इससे उनके पास सेना की तैनाती समेत कई खुफिया जानकारियां होने का शक है. हालांकि सेना या सरकार ने इसकी पुष्टि नहीं की है. वह इलाका इतना दुर्गम है कि वहां तक पहुंचने के लिए नजदीकी शहर डापोरिजो से कई दिन पैदल चलना पड़ता है. पुलिस की एक टीम मौके के लिए रवाना हो गई है. इससे पहले भी बीते मार्च में एक युवक को चीनी जवानों ने पकड़ लिया था जो दो सप्ताह बाद लौटा था.

कांग्रेस के एक विधायक निनांग ईरिंग ने शनिवार को दावा किया था कि चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के सीमावर्ती गांव से शुक्रवार को पांच युवकों को अगवा कर लिया है. इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी. ये सारे लोग टागिन समुदाय के हैं. उनका दावा था कि लद्दाख और डोकलाम की तरह ही चीन ने अरुणाचल में भी घुसपैठ शुरू कर दी है. उक्त युवक मछली पकड़ने गए थे और चीनी सेना ने उनको पकड़ लिया. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ईस्ट अरुणाचल से सांसद तापिर गाओ ने भी अपने एक ट्वीट में कहा था कि चीनी जवानों ने बीते तीन सितंबर को अपर सुबनसिरी जिले में भारतीय क्षेत्र में घुसकर नाचो इलाके से टागिन जनजाति के युवकों को बंधक बना लिया है. ऐसी ही एक घटना मार्च में भी हुई थी.

यह घटना उस समय सामने आई जब शनिवार को एक स्थानीय अखबार में खबर छपी कि नाचो शहर के करीब एक गांव में रहने वाले टागिन समुदाय के पांच युवकों का चीनी जवानों ने अपहरण कर लिया है. यह लोग मछली पकड़ने और शिकार करने जंगल में गए थे. उनके परिजनों का दावा है कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा के भीतर से उनको पकड़ा और साथ ले गए. दरअसल, उन युवकों के साथ गांव के ही दो और युवक भी थे. लेकिन वे किसी तरह बचकर भागने में कामयाब रहे. उन्होंने ही गांव लौट कर इस अपहरण के बारे में बताया था. अपहृत युवकों के नाम क्रमशः टोच सिंगकाम, प्रशांत रिंगलिंग, टानू बाकेर, गारू दिरी और डोंग्टू ईबिया बताए गए हैं. वह घटना जिस इलाके में हुई वह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू के लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. इससे पहले बीते मार्च में एक युवक टेंगले सिंकाम के जड़ी-बूटी की तलाश में मैकमोहन रेखा पार करने के बाद चीनी सैनिकों ने उसे पकड़ लिया था. उसे रिहा कराने में 20 दिन का समय लगा था.

दुर्गम भौगोलिक स्थिति

यह घटना अरुणाचल प्रदेश के जिस इलाके में हुई है उसकी भौगोलिक बसावट बेहद दुर्गम है. राज्य के अपर सुबनसिरी जिले के तहत आने वाला नाचो कस्बा जिला मुख्यालय डापोरिजो से करीब 120 किमी दूर है. यह सीमावर्ती इलाका है. डापोरिजो भी राजधानी इटानगर से 280 किमी की दूरी पर है. लेकिन इलाके में सड़कें और परिवहन का कोई साधन नहीं होने की वजह से वहां तक पहुंचने के लिए पैदल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इलाके में संचार के समुचित साधन भी नहीं हैं. नतीजतन खबरें बाहर आने में काफी समय लगता है. सामरिक रूप से बेहद अहम होने के बावजूद आजादी के इतने लंबे अरसे बाद भी सीमावर्ती इलाके में रहने वाले दर्जनों गांवों तक पहुंचने के लिए कोई ढंग की सड़क नहीं है. कई गांव तो साल के ज्यादातर समय देश के बाकी हिस्सों से कटे रहते हैं. सेना के लिए बार्डर रोड्स आर्गानाइजेशन (बीआरओ) ने जो सड़कें बनाई हैं वह भी बदहाल हैं. सुबनसिरी जिले में सीमावर्ती इलाका शायद देश के सबसे दुर्गम स्थानों में शामिल है.

Indien Arunachal Pradesh - Tawang Kloster (picture-alliance/dpa/dinodia)

तवांग मठ

सामरिक लिहाज से अरुणाचल प्रदेश की काफी अहमियत है. राज्य की 1,080 किमी लंबी सीमा चीन से लगी है. इसके अलावा 520 किमी लंबी सीमा म्यांमार और 217 किमी लंबी सीमा भूटान से भी लगी है. वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सेना इसी इलाके से भारत में घुस कर असम के तेजपुर शहर के करीब पहुंच गई थी. स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रधानमंत्री और सांसदों के सीमावर्ती इलाके में सड़कों का आधारभूत ढांचा विकसित करने के दावों के बावजूद यह इलाका देश के बाकी हिस्सों से अलग-थलग है. इस इलाके से जिला मुख्यालय जाने के लिए कई दिन पैदल चलना पड़ता है. करीबी थाने तक पहुंचने के लिए भी पूरे दिन पैदल चलना होता है. इसी वजह से लोग ऐसी घटनाओं की शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने नहीं पहुंचते. अपहरण के इस मामले की भी अब तक कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है.

नहीं हुआ इलाके का विकास

स्थानीय लोगों का कहना है कि दुर्गम भौगोलिक स्थिति की वजह से अगर चीनी सेना भारतीय सीमा के भीतर कई किमी तक आ जाए तब भी सेना और प्रशासन को इसकी सूचना जल्दी नहीं मिलेगी. इन इलाकों में तैनात डाक्टर और शिक्षक भी जिला मुख्यालय में ही रहते हैं. ऐसे में बीमारी की स्थिति में लोगों को स्थानीय ओझाओं और झोला छाप डाक्टरों का ही सहारा लेना पड़ता है. यहां के लोग शिकार और शराब के सहारे ही दिन गुजारते हैं. इलाके के गिबा और नलिंगि सर्कल के ग्यासू, मारगिंग और पिया जैसे दर्जनों गांवों में अब तक बिजली नहीं पहुंची है. इसके लिए लोगों ने कई बार स्थानीय सांसद किरण रिजिजू और केंद्र सरकार को ज्ञापन दिया था. लेकिन कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा है. ज्यादातर गांवों तक जाने के लिए सड़कें नहीं हैं.

युवकों के अपहरण की सूचना सामने आने के बाद पुलिस की एक टीम मौके पर भेजी गई है. लेकिन वह अब तक लौटी नहीं है. अपर सुबनसिरी जिले के पुलिस अधीक्षक तारू गुस्सार बताते हैं, “तथ्यों का पता लगाने के लिए नाचो थाने के ओसी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम मौके के लिए रवाना की गई है. यह टीम अपहृत युवकों के परिजनों और स्थानीय लोगों से बातचीत करेगी.  उनके वापस नहीं आने तक इसका ब्योरा नहीं मिलेगा. इलाके में पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं. हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं.”

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की घटनाएं अब आम हो रही हैं. लेकिन इलाके की कोई खबर जल्दी बाहर नहीं आती है. एक सुरक्षा विशेषज्ञ  सी. रेबिया कहते हैं, “सरकार को समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए. ऐसा नहीं होने की स्थिति में इलाके में भी लद्दाख जैसी हालत पैदा हो सकती है.”

Bildergalerie 50 Jahre indisch-chinesischer Krieg (DW)

युद्ध की यादें

घटना का हो रहा है विरोध 

अपहरण की इस घटना और इन युवकों का अब तक पता नहीं चलने की वजह से राज्य में आप्सू समेत कई संगठन सड़कों पर उतर आए हैं. यह लोग अपहृतों की शीघ्र रिहाई के साथ ही इस मुद्दे पर चीन को सबक सिखाने की मांग कर रहे हैं. आप्सू ने केंद्र पर सीमावर्ती इलाके में रहने वालों की रक्षा में नाकाम रहने का भी आरोप लगाया है. पासीघाट वेस्ट के कांग्रेस विधायक निनांग ईरिंग कहते हैं, “चीन को माकूल जवाब दिया जाना चाहिए. लद्दाख सीमा पर दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच चीन अब इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर सक्रियता बढ़ा रहा है.” प्रदेश कांग्रेस ने इस घटना पर राज्य सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उसे कठघरे में खड़ा कर दिया है. पार्टी ने इटानगर में जारी अपने बयान में कहा है कि चीन की ओर से सीमा के उल्लंघन की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं जो बेहद गंभीर मामला है. केंद्र और राज्य सरकारों को इलाके में जमीनी हकीकत का आकलन कर ठोस कदम उठाना चाहिए.

कांग्रेस पार्टी ने सवाल किया है कि आखिर उन युवकों को देर रात नियंत्रण रेखा के पास शिकार के लिए जाने की इजाजत कैसे दी गई और सेना ने रास्ते में उनको रोका क्यों नहीं? बयान में कहा गया है कि अंजाव, अपर सियांग, अपर सुबनसिरी, गिबांग घाटी और तवांग जिलों में चीनी सेना की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं और सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों से साफ है कि चीनी सेना भारतीय इलाके में घुस आई है. पार्टी ने वर्ष 2017 और 2019 की उन घटनाओं का भी जिक्र किया जब चीनी सेना ने भारतीय इलाके में सड़कों के साथ ही लकड़ी के पुल तक बनाए थे. दूसरी ओर, अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ (आप्सू) ने इलाके में चीनी सेना की ओर से अपहरण की बढ़ती घटनाओं को देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए केंद्र से इस मामले में ठोस कदम उठाने की मांग की है. संगठन ने रविवार को अपनी आपात बैठक में सरकार से इलाके में सड़कों और दूरसंचार नेटवर्क का आधारभूत ढांचा दुरुस्त करने और सुरक्षा बढ़ाने की मांग की है. आप्सू का कहना है कि आधारभूत ढांचे की कमी की वजह से स्थानीय लोगों के साथ ही नियंत्रण रेखा पर तैनात भारतीय जवानों को भी भारी मुश्किलों से जूझना पड़ता है.

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