चीन में सुस्त पड़ती कार कंपनियों को भारत कर पाएगा दुरुस्त? | दुनिया | DW | 22.02.2019
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दुनिया

चीन में सुस्त पड़ती कार कंपनियों को भारत कर पाएगा दुरुस्त?

दुनिया भर की कार कंपनियों को इन दिनों चीन का सुस्त पड़ता बाजार परेशान कर रहा है. कुछ विश्लेषक की मानें तो भारतीय बाजार कार कंपनियों के नुकसान को पाट सकते हैं. लेकिन कंपनियों के लिए यह रास्ता आसान नहीं होगा.

चीन पिछले एक दशक से दुनिया का सबसे बड़ा कार बाजार बना हुआ था, लेकिन अब तस्वीर कुछ बदल रही है. कारों की बिक्री से जुड़ी जानकारी देने वाली वेबसाइट यचीडॉटकॉम के डाटा के मुताबिक साल 2017 में तकरीबन 2.8 करोड़ गाड़ियां चीन की सड़कों पर उतरी थीं, लेकिन 2018 में इसमें गिरावट आई. चीन पैंसेजर कार एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में गाड़ियों की बिक्री महज 2.2 करोड़ ही रह गई जो पिछले 20 पिछले सालों में आई पहली वार्षिक गिरावट है.

ऐसा भी नहीं है कि बिक्री घटने का सिलसिला 2018 तक ही सीमित रहा है. एसोसिएशन ऑफ ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सीएएएम) के मुताबिक जनवरी 2019 में महज 23 लाख गाड़ियां बिकी हैं जो पिछले साल की तुलना में 15 फीसदी कम है.

क्या है कारण

चीन के बाजार में आई इस गिरावट के लिए विश्लेषक धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था, उपभोक्ताओं का बाजार पर लड़खड़ाता भरोसा, कारोबार में बढ़ता तनाव और ट्रेड वार जैसे कारणों को अहम मान रहे हैं.

विश्लेषक बताते हैं कि सरकार की ऑटोमोटिव बिक्री में पियर-टू-पियर लेंडिंग यानि एक तरह के कर्ज पर रोक लगाना भी इसका एक बड़ा कारण हो सकता है. अब तक ऑटो लोन बैंकों से दिए जाते रहे हैं लेकिन इस बीच बाजार में ऐसे स्टार्टअप्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आ गए हैं जहां निवेशक सीधे तौर पर खरीदार को पैसा दे सकता है. इस तरह के लेन देन को पियर-टू-पियर लेंडिंग कहा जाता है.

भारत में रिजर्व बैंक इसके लिए नियम-कायदे तय कर चुका है. विशेषज्ञ टैक्स में कटौती जैसी बातों को भी गिरती बिक्री का कारण मान रहे हैं. चीन के ऑटो बाजार में आ रही यह मंदी दुनिया भर के ऑटो जगत को परेशान करने लगी है. कहते हैं कि जब चीन का बाजार छींकता है तो दुनिया की ऑटो इंडस्ट्री को जुकाम हो जाता है.

सबसे अहम बाजार

जर्मन ऑटो कंपनी फोक्सवागन से लेकर अमेरिकी कंपनी जनरल मोटर्स तक सभी के लिए चीन का बाजार बड़ा अहम माना जाता है. फोक्सवागन अपनी 40 फीसदी गाड़ियां चीन में बेचता है. कंपनी के लिए यह एशिया का सबसे बड़ा बाजार है. गिरती मांग के बीच भी कुछ कंपनियां दूसरों की तुलना में बेहतर दिख रही है. कुछ की बिक्री छोटे शहरों में घट रही है तो कुछ की मांग अब भी तटीय इलाकों में बनी हुई है. वहीं चीन के पारंपरिक कार निर्माता, नई तकनीकी कंपनियों का भी बाजार में सामना कर रहे हैं जो लगातार इनकी बिक्री पर असर डाल रहे हैं. 

भारत से उम्मीदें

कुछ को उम्मीद है कि चीन के सिकुड़ते बाजार से जूझने के बाद दुनिया के बड़े ऑटो निर्माता भारत का रुख करेंगे. भारत का ऑटो बाजार दुनिया में तेजी से बढ़ता ऑटो बाजार है. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स के मुताबिक, भारत में साल 2017-18 के दौरान तकरीबन 40 लाख यात्री और कमर्शियल वाहनों की बिक्री हुई. डाटा के मुताबिक यह बिक्री पिछले साल की तुलना में 10 फीसदी अधिक है.

अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2020 तक भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार बन जाएगा. पहले और दूसरे स्थान पर चीन और अमेरिका का नंबर आता है. कई विश्लेषक भारत को अगले दशक में ऑटो बाजार के तौर पर बेहतरीन संभावनाओं वाला देश कहते हैं.

फिलहाल भारत में हर 1000 लोगों पर 50 गाड़ियां हैं. वहीं चीन में 1000 लोगों पर 200 गाड़ियां हैं. विशेषज्ञ कहते हैं यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय बाजार में आगे बढ़ने की बहुत संभावनाएं हैं. भारत में तेजी से बढ़ रहा शहरीकरण, लोगों की बढ़ती आय और कामकाजी बल में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी भविष्य में ऑटो इंडस्ट्री की मांग में इजाफा करेगी.

मतभेद भी हैं

ऑटोमोटिव विश्लेषक लुईस कहती हैं, "वृद्धि की तमाम संभावनाओं के बावजूद भारतीय बाजारों का आधार चीन की तुलना में काफी छोटा है. भारत में मोटरसाइकिल को लोग निजी ट्रांसपोर्ट के लिए बड़े स्तर पर इस्तेमाल करते हैं." उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि आप भारत को देख कर ये कह सकते हैं या वह वैश्विक ऑटो कंपनियों को राहत देगा." उन्होंने समझाते हुए कहा कि भारत में 50 फीसदी से भी अधिक बिक्री मारुति सुजुकी की है और सुजुकी को हाल में ही चीन से निकाला गया है. उन्होंने कहा कि नंबर दो पर हुंडई का नंबर आता है जो पहले से ही भारत में क्षमता का अभाव झेल रही है. इसलिए भारत में वृद्धि दर धीमी है.

उन्होंने कहा, "चीन में आ रही सुस्ती को पाटने के लिए भारत को बतौर बाजार देखने की बजाय उत्तरी अमेरिकी देशों के विकल्पों पर गौर करना चाहिए." लुईस कहती हैं कि दुनिया की किसी भी नामचीन ऑटो कंपनी का भारतीय बाजारों में 5 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी नहीं है. उन्होंने कहा कंपनियां लंबे समय से जरूर जमी हुई हैं लेकिन चीन के बाजार की मंदी को भारत में पाटने में अब तक सक्षम नहीं है.

इसके अलावा भारत का ऑटो बाजार भी लगातार बदल रहा है. भारत में भी गाड़ियों के इस्तेमाल और इसके मालिकाना हक को लेकर नए पैटर्न सामने आए हैं. देश में ऐप आधारित टैक्सी सेवाएं जोर पकड़ रही है. कैब कंपनियां ओला, उबर और महानगरों में मैट्रो जैसे विकल्प लोगों की गाड़ियां खरीदने की चाहत को भी प्रभावित कर रहे हैं. वहीं ट्रैफिक, प्रदूषण और लंबी दूरी की यात्राओं ने भी लोगों की गाड़ियों से जुड़ी पसंद पर असर डाला है.

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