चीन की रुदाली हैं हू सिंगलियान | लाइफस्टाइल | DW | 21.06.2011
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लाइफस्टाइल

चीन की रुदाली हैं हू सिंगलियान

भारत की तरह चीन में भी पेशेवर ढंग से शोक मनाने की रुदाली परंपरा है. चोंगचिंमग की हू सिंगलियान राजस्थान की रुदालियों की ही तरह दक्षिण पश्चिम चीन के देहाती इलाकों में बदहवास होकर शोक का इजहार करती हैं.

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चीन के कुछ हिस्सों में जहां शव को दफन किए जाने से पहले देहाती रीति रिवाजों का अभी भी चलन है, शोक मनाने वाले लोगों को किराए पर लिया जाता है ताकि अंतिम यात्रा को शोकपूर्ण बनाया जा सके. ऐसे पेशेवर शोक मनाने वालों को कुसांग्रेन कहा जाता है.

ऐसे ही पेशेवर शोक समारोह करने वालों का एक ग्रुप है चोंगचिंग का स्टार एंड रिवर ऑर्केस्ट्रा. इस ऑर्केस्ट्रा की 53 वर्षीया हू सिंगलियान अपने छह सदस्यों वाले बैंड के साथ पूरा साउंड सिस्टम और मल्टी कलर स्पॉटलाइट लेकर आती हैं.

चोंगचिंग प्रांत के आकार वाला शहर है, जिसके 82 हजार वर्गकिलोमीटर वाले नगरपालिका क्षेत्र में सवा 3 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं. यह इलाका पूरे चीन में तेज शहरीकरण की एक मिसाल है. लेकिन तेज शहरीकरण के बावजूद ग्रामीण परंपराएं अभी भी जीवित हैं.

चोंगचिंग के इलाके में अपने स्टेज नाम डिंग डिंग माओ के नाम से मशहूर हू कहती हैं, "देहाती इलाकों के लोग अभी भी अपने मृत पूर्वजों को बहुत सम्मान देते हैं."

हू को लियांग जिकाई के शोक समारोह में बुलाया गया है जिनकी 70 की उम्र में मौत हो गई है. शोक सभा पुराने मकानों के बाहर एक टेंट में होती है जहां एक लोहे के ताबूत में लियांग की लाश रखी है. ताबूत के चारों ओर अगरबत्तियां जला दी गई हैं.

मृतक को चढ़ावे के तौर पर पलों से भरा एक बास्केट रखा गया है. हू वहां आए लोगों से फटाफट लियांग के बारे में कुछ सवाल पूछती हैं ताकि अपने भाषण में वे ऐसा माहौल बना सकें जैसे वे लियांग को लंबे समय से जानती थीं.

फिर वह अपने बैंड और मृतक के परिजनों और संगी साथियों के साथ 'अल फ्रेस्को' भोज खाती हैं, शिचुआन बीयर पीती हैं और फिर शोक का सादा लिबास पहन लेती हैं. ताबूत पर हाथ रखकर वह गाना शुरू करती है, "हमें छोड़कर इतनी जल्दी क्यों चले गए? धरती तुम्हारे लिए काले लिबास में है. नदियां और सोते तुम्हारी कहानी कहते को बिलख रहे हैं, एक ईमानदार आदमी की कहानी." रोने धोने और शोक में नाचने का यह सिलसिला कई मिनटों तक चलता रहता है. हू घुटनों पर गिर पड़ती है, बदहवास लोटती पोटती है, फिर मृतक के शोक संतप्त परिजनों से हाथ मिलाती है और फिर अचानक शाम समारोही हो उठती है.

नाच गाने का माहौल शुरू हो जाता है, बेली डांसर का नाच और चीते की खाल के रंग का बस्टियर और लेदर की काली पैंट पहने लड़की का टेक्नो डांस, मृतक लियांग की भतीजी लिन शीचिंग कहती हैं कि इसे मृतक के लिए आदर का अभाव नहीं समझा जाना चाहिए. मृतक को विदा कहना बहुत महत्वपूर्ण क्षण होता है, इसलिए समारोह को जोश भरा और आकर्षक होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं होता है तो गांव में बच्चों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाएगा.

चीनी अंत्येष्ठि संस्कृति संघ का कहना है कि परंपरा के अनुसार बेटे बेटियों और पोते पोतियों को परिवार में किसी के मरने का गम लाश को दफनाए जाने से पहले शोर शराबे के साथ व्यक्त करना चाहिए. यदि वे पर्याप्त ढंग से नहीं रोते तो इसे पड़ोसी संतानच्युत धर्मनिष्ठता का अभाव मानेंगे. इसीलिए हू जैसी कुसांग्रेन को शोर शराबे वाली अंतिम यात्रा के लिए किराए पर लिया जाता है.

पेशेवर शोक की परंपरा भारत के राजस्थान प्रांत में भी है जिससे महाश्वेता देवी के उपन्यास और उस पर बनी फिल्म रुदाली ने परिचित कराया है. यह परंपरा राजस्थान के उस इलाके में प्रचलित थी जहां संभ्रांत महिलाओं को पर्दे में रखा जाता है. रुदाली को परिवार के पुरुष सदस्यों की मौत पर सार्वजनिक रूप से शोक का इजहार करने के लिए बुलाया जाता है, क्योंकि महिलाएं या तो खुलकर शोक व्यक्त नहीं कर सकती या कुछ मामलों में वे ऐसा करना नहीं चाहतीं. सर के बाल खोले और काला लिबास पहने रुदाली छाती पीटपीटकर मरने वाले की तारीफ करती और मरने पर शोक जताती हैं और बदहवास सी होकर नाचने लगती है. एक अच्छी रुदाली को किराए पर लेने को सामाजिक रुतबे का प्रतीक माना जाता है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: एस गौड़

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