चारों ओर पानी फिर भी बूंद बूंद का हिसाब | दुनिया | DW | 27.07.2018
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दुनिया

चारों ओर पानी फिर भी बूंद बूंद का हिसाब

पानी के बीच रह कर भी पानी की कमी क्या होती है इसका अहसास समुद्री द्वीपों पर रहने वाले ही जानते हैं. दक्षिण पश्चिम भारत में कई ऐसे द्वीप हैं जहां पीने का पानी राशन से मिलता है.

हर सुबह कमरुनिसा पूवुम्मदा चाय पीते हुए अरब सागर की लहरों को अपने घर के सामने बने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से टकराते हुए देखती हैं. उनका घर भारत के दक्षिण पश्चिमी सीमा से लगे कवराती द्वीप पर है. अच्छे से बनी अपनी चाय के नायाब जायके को वह पानी साफ करने के इस प्लांट से जोड़ती हैं. इसकी वजह यह है कि इस प्लांट ने उनके इलाके में पीने लायक पानी घर घर पहुंचा दिया है और उनकी जुबान से उस खारे चाय का स्वाद अब कोसों दूर जा चुका है जो एक दशक पहले तक उन्हें रोज पीनी पड़ती थी.

पूवु्म्मदा याद कर बताती हैं, "हमें पहला फर्क तब दिखाई पड़ा जब सुनहरे रंग की चाय हमारे कपों में उड़ेली गई और फिर हमने चाय का स्वाद लिया जो अद्भुत था. "कारावती द्वीप में रहने वाले लोग हर रोज इस चाय के स्वाद का लुत्फ लेते हैं. कारावती लक्षद्वीप के उन 10 द्वीपों में से एक है जिस पर इंसान बसते हैं.

पुराने बीचों, दलदल और मूंगे से घिरे इलाके में रहने वाले लोग कई दशकों तक पीने के साफ पानी की किल्लत का सामना करते रहे. गुजरते सालों के साथ समुद्र का साफ नीला पानी द्वीप के सीमित भूजल के साथ मिलता चला गया और उसके स्वाद में खारापन घुलता गया. जमीन की कमी के कारण भूजल के स्रोत सीवेज की हौदियों के जरूरत से ज्यादा नजदीक हो गए. नतीजतन पानी इतना गंदा हो गया कि ना पीने के काबिल रहा ना खाना बनाने और ना ही नहाने के.

पानी का खारापन खत्म करने वाले प्लांट में काम करने वाले हिदायतुल्ला चेक्किल्लाकम बताते हैं कि कुआं खोदने से लेकर बारिश का पानी जमा करने जैसे कई उपाय आजमाए गए. या तो इनका फायदा नहीं होता या फिर ये बेहद खर्चीले साबित हुए. हिदायतुल्ला बताते हैं, "अच्छा पीने का पानी तब बहुमूल्य सामान था."

पूर्णिमा जालिहाल के नेतृत्व में चेन्नई के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी की टीम पहली बार 2004 में कवराती द्वीप आई. उनके पास बोतल में बंद पानी के कार्टून थे और पानी का खारापन दूर करने वाले प्लांट का खाका. यहां पहुंचने के बाद उन्होंने खुद को एक दुर्बल इकोसिस्टम के बीच पाया जहां द्वीप प्रशासन का साफ निर्देश था कि वो किसी भी चीज को नष्ट ना करें. उन्हें उस चाय से बचने की भी चेतावनी दी गई जिसकी एक चुस्की भर से उल्टी आ जाती थी. जालिहाल बताती हैं, "पानी का खारापन बर्दाश्त के बाहर था और लोग जानते थे कि यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं था."

एक महिला के नेतृत्व में पानी की इस परियोजना ने स्थानीय लोगों में बड़ी उत्सुकता जगा दी. पूर्णिमा और उनकी टीम को अपने प्लांट का डिजाइन बदलना पड़ा ताकि इकोसिस्टम को नुकसान ना हो. टीम ने तैरने वाले ढांचे बनाए और उन्हें समंदर में ले कर गए, यहां तक कि पानी के नीचे रहने वाले पाइपलाइन भी. एक साल के भीतर प्लांट बन कर तैयार हो गया और हर रोज एक लाख लीटर पीने का पानी तैयार होने लगा. उसके बाद गलियों में पाइपलाइन डाली गई, हर 25 मीटर पर सामुदायिक नल लगाए गए और 2005 में पानी की सप्लाई भी चालू हो गई.

पूवुम्मदा बेगम और कारावती द्वीप के 11,200 लोगों के लिए यह किसी क्रांति से कम नहीं था. अब लोग बड़े आराम से हर रोज एक घंटे के लिए अपनी बाल्टियां नल के पास कतार में लगा देते हैं. अब्दुल लतीफ द्वीप पर रहने वाले लोगों, मेहमानों और बच्चों को प्लांट दिखाने ले जाते थे. वो बताते हैं कि यह सैलानियों के आकर्षण जैसी चीज बन गया था. वो सबको एक ग्लास पानी पीने का आग्रह करते और यहां के पोस्टर ब्वॉय बन गए थे. 

करीब पांच करोड़ रुपये के खर्च से बना यह प्लांट पर्यावरण के अनुकूल, मजबूत और चलाने में बेहद आसान है. यह समुद्र तल और उसकी गहराई में मौजूद समुद्री जल के तापमान के अंतर का इस्तेमाल करता है. यह गर्म पानी का इस्तेमाल पानी को भाप बनाने और ठंडे पानी का इस्तेमाल इस भाप को संघनित करने में करता है जिसके जरिए शुद्ध जल प्राप्त होता है. इसकी सफलता से उत्साहित एनआईओटी ने 2011 में दो और प्लांट आस पास के द्वीपों पर लगाए. छह और प्लांट बनाने का काम चल रहा है.

प्लांट से हर नागरिक को 9 लीटर पानी मिलता है. जिसमें तीन लीटर पीने के लिए और पांच लीटर खाना बनाने के लिए. कपड़े धोने या दूसरे कामों के लिए इस पानी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. पानी की हर बूंद कीमती है और इन लोगों से बेहतर भला इस बात को और कौन जानेगा.

एनआर/एमजे (रॉयटर्स)

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