ग्रीस में सुधारों की राह नहीं आसान | दुनिया | DW | 23.07.2015
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दुनिया

ग्रीस में सुधारों की राह नहीं आसान

ग्रीस की संसद में आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने का जर्मन सरकार ने स्वागत किया है. वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीस के लिए इन प्रस्तावों को लागू कर पाना बहुत बड़ा संघर्ष होगा.

नई बेलआउट डील ग्रीक संसद ने आय बढ़ाने और बाजार में ढील देने के कदमों का अनुमोदन कर दिया है. कई जानकारों का कहना है कि पश्चिमी यूरोप के बड़े देशों के कुछ ही नेताओं ने ऐसे कदम उठाने की हिम्मत दिखाई है. 13 जुलाई के ऐतिहासिक ग्रीक समझौते पर टिप्पणी करते हुए फ्रांस के विपक्षी कंजर्वेटिव नेता खावियर बैर्ट्रांड ने फ्रांस के सोशलिस्ट राष्ट्रपति के बारे में टिप्पणी की, "फ्रांसोआ ओलांद दूसरों को सुधार का रास्ता बताने में बहुत अच्छे हैं."

यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था फ्रांस भी अपने निर्धारित आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने में संघर्ष कर रही है. पूर्व राष्ट्रपति निकोला सारकोजी की सरकार में श्रम मंत्री रह चुके बैर्ट्रांड ने पूछा, "फिर वह फ्रांस में आखिर किस बात का इंतजार कर रहे हैं?"

एक ओर यूरोजोन के कुछ नेता ग्रीस के मामले में दोहरे मापदंड अपनाने की बात कर रहे हैं तो कई ग्रीस को किसी भी हाल में आर्थिक संकट से बाहर निकालने के समर्थन में हैं. इतिहास गवाह है कि 1999 से अस्तित्व में आए यूरो मुद्रा वाले सभी 19 देशों में आर्थिक सुधार कितने उथल पुथल भरे रहे हैं. 1990 में एकीकरण के बाद से पहली बार चांसलर अंगेला मैर्केल ने जर्मनी का बजट संतुलित कर दिखाया है. खुद मैर्केल की आर्थिक नीति की आलोचना करने वाले भी कम नहीं हैं. ऐसे में ग्रीस को 86 अरब यूरो का नया बेलआउट पैकेज हासिल करने के लिए बहुत सारे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे. ग्रीक प्रधानमंत्री अलेक्सिस सिप्रास से जिस तरह के सामाजिक और राजनीतिक तौर पर क्रांतिकारी बदलाव लाने की उम्मीद की जा रही है, उसे लेकर यूरोप के कई देशों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है.

ईयू अधिकारी ग्रीस के साथ किसी भी तरह के दोहरे मापदंड अपनाने की बात से इंकार करते हैं. उनका कहना है कि पूरे ब्लॉक में धीरे धीरे आए सभी सुधारों से ग्रीस ने खुद को अछूता रखा था और इसीलिए अब उसे कड़ी मशक्कत करनी होगी. ग्रीस में अब जिन पेंशन सुधारों को लाने की बात चल रही है, स्पेन, इटली और बेल्जियम पहले से ही उन पर काम कर रहे हैं. पूर्व सोवियत संघ के देशों ने भी कठोर एवं क्रमबद्ध सुधार लाकर यूरोजोन में अपनी सदस्यता को बरकरार रखा है. अभी भी ब्लॉक के सभी देशों में पेंशन की व्यवस्था से जुड़े कई सुधार लाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है.

पूरे यूरोजोन में नीति निर्धारण को आसान बनाने के लिए साझा सरकार और साझा संसद बनाने की मांग करने वाले ओलांद को सैद्धांतिक रूप से बर्लिन का भी समर्थन है. लेकिन इस मुद्दे पर मतभेद की प्रचुर संभावना भी है. कट्टर यूरो-समर्थकों का मानना है सख्त यूरोजोन नियमों से शायद ग्रीक संकट को टाला जा सकता था, लेकिन अब सवाल यह है कि किसी अगले संकट से बचने के लिए क्या कुछ ठोस काम हो पाएगा.

आरआर/एमजे (रॉयटर्स)

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