गाय के नाम पर किसे हो रहा है फायदा? | दुनिया | DW | 18.12.2018
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दुनिया

गाय के नाम पर किसे हो रहा है फायदा?

हिंदू धर्म में गाय को पवित्र जीव माना जाता है. यही वजह है कि अब गाय संरक्षण के नाम पर कई समूह सामने आ गए हैं. वहीं आवारा गायों की बढ़ती संख्या ने लोगों की नाक में दम कर दिया है लेकिन अब भी इस ओर नहीं सोचा जा रहा है.

पिछले कुछ सालों में भारतीय मीडिया समेत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गाय ही सबसे अधिक सुर्खियां बटोरने वाला पशु बनकर उभरी है. भारत की कुल जनसंख्या में 80 फीसदी हिंदू हैं. हिंदू धार्मिक परंपराओं और कथाओं में गाय को पवित्र माना गया है. गाय का संबंध हिंदुओं के भगवान शिव से जोड़ा जाता है तो कहीं इसे भगवान कृष्ण का करीबी माना जाता है.

कुछ प्राचीन ग्रंथों में गाय को सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली "कामधेनु" कहा गया है. कहा तो ये भी जाता है कि इसके सींग भगवान के प्रतीक हैं तो चार पैर, हिंदू वेद ग्रंथों के मुताबिक जीवन के चार उद्देश्यों के प्रतीक हैं. ये उद्देश्य हैं धन, इच्छाएं, पवित्रता और मोक्ष.

वहीं आज कई मॉर्डन समूह गाय को बचाने का दावा करते हुए स्वयं के "गौ रक्षक" भी कह रहे हैं. वे ये मानते हैं कि गाय पवित्र है और इसकी रक्षा करनी चाहिए. एक ऐसा ही समूह, "गौ रक्षक दल हरियाणा" प्राचीन ग्रंथों और विद्वानों का हवाला देते हुए कहता है कि गाय मां की तरह है और इसका कत्ल नहीं होना चाहिए.

Flash-Galerie Weiße Tiere Weiße Kuh (AP)

ऐसा ही दावा मुंबई का एक समूह "सर्व काउ" भी करता है. यह संगठन अपनी बेवसाइट पर लिखता है कि गाय से इंसान को कई सारे पदार्थ मिलते हैं मसलन दूध, घी, गोबर और गोमूत्र. इसी बेवसाइट पर दावा किया गया है कि इन सभी पदार्थों में फंफूद नहीं लगती और इनमें कैंसर से बचाने वाले गुण भी हैं. हालांकि वैज्ञानिकों ने अब तक ऐसा कोई भी दावा नहीं किया है. कुछ ऐसी ही धार्मिक मान्यताओं के चलते कई पशु संरक्षण समूह समेत कुछ कानून भी बन गए हैं, जिन्हें कहीं न कहीं बीजेपी के नेता हवा दे रहे हैं. खासकर जानवरों पर क्रूरता की रोकथाम 2017 (पशुधन बाजारों का नियमन) के लागू होने के बाद, मांस या चमड़े के लिए मवेशियों की खरीद-फरोख्त बहुत मुश्किल हो गई है. इतना ही नहीं इस कानून ने कई कारोबारी समुदायों को भी प्रभावित किया है. प्रभावित समूहों में हिंदुओं समेत कई अन्य धर्म और जातियों के लोग भी शामिल हैं, जिनके लिए गोमांस मतलब बीफ भोजन का महत्वपूर्ण और सस्ता स्रोत है.

दुर्घटनाओं का कारण

साल 2012 की पशुधन गणना के मुताबिक देश की सड़कों पर तकरीबन 60 लाख गायें आवरा फिरती रहती हैं. कयास है कि अगली पशुधन गणना तक यह आंकड़ा और भी बढ़ जाएगा. गायों की बढ़ती संख्या के चलते सड़क दुर्घटनाओं में भी वृद्धि हुई है लेकिन अब तक इस मामले से जुड़े आंकड़ें गायब हैं.

चंडीगढ़ स्थित पीपुल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख और वकील अर्जुन शेओरन कहते हैं कि गाय से जुड़े कानूनों में बदलाव और उनको खराब ढंग से लागू किए जाने के चलते दुर्घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है. उन्होंने बताया कि जो लोग गाय के बूढ़े होने के बाद उसका भरण-पोषण करने में असमर्थ होते हैं, खासकर तब जब वह दूध देना बंद कर देती हैं तो वे उन्हें सड़क पर छोड़ देते हैं. शेओरन कहते हैं, "ये छोड़ी गईं गाय शहरी इलाकों में यातायात को बाधित करती हैं, स्वास्थ्य संबंधी खतरों के साथ-साथ साफ-सफाई से जुड़ी समस्याएं भी पैदा करती हैं."

उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में अधिकारियों ने साल 2018 की शुरुआत में मवेशी जब्त अभियान को तेज कर दिया था, क्योंकि इसके पहले की एक घटना में एक गाड़ी चालक गाय को बचाने के चलते अपना नियंत्रण खो बैठा था. राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में भी एक 22 साल के व्यक्ति की मोटरसाइकिल गाय को बचाने के चलते टकरा गई, जिसके चलते बाइक सवार की मौत हो गई थी. उत्तर मध्य रेलवे के आंकड़ों मुताबिक, अप्रैल 2018 से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश में लगभग 7,000 जानवरों ने रेल पटरियों पर जान गंवाई है.

गायों की रक्षा

हाल में ही बीजेपी से जुड़े नेताओं ने आवारा गायों के संरक्षण के लिए कदम उठाने की घोषणा की है. इसी के तहत हिमाचल प्रदेश सरकार ने कहा कि वह गाय को "राष्ट्रीय मां" घोषित करने का एक प्रस्ताव पारित कर रही है. इस प्रस्ताव को पेश करने वाले नेता अनिरुद्ध सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, "गाय किसी भी तरह की जाति, धर्म, संप्रदाय से जुड़ी नहीं है बल्कि इसका मानवता में बड़ा योगदान है. जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो लोग उसे दर-दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं इसलिए ऐसे कदमों की जरूरत है." सिंह उम्मीद जताते हैं कि ये तरीका पशु आश्रय केंद्रों को बनाने में मदद करेगा, साथ ही कानूनों से गाय की स्थिति बेहतर होगी. हालांकि ये तरीके अन्य क्षेत्रों में प्रभावी साबित नहीं हुए हैं.

वहीं दिल्ली, राजस्थान, पंजाब जैसे राज्यों ने कई गाय आश्रय केंद्र बनाए हैं लेकिन स्थानीय प्रशासन के मुताबिक इन केंद्रों में क्षमता से ज्यादा गायें हैं. वहीं उत्तर प्रदेश ने अब आवारा गायों के गले में रेडियम के पट्टे लगाने का भी फैसला किया है ताकि गुजरने वालों को गाय नजर आ जाएं.

वहीं शेओरन इन सब तरीकों पर संदेह व्यक्त करते हैं. उन्होंने कहा, "गायों की बढ़ती संख्या को मैनेज करने के लिए हमारे पास पर्याप्त गौशालाएं नहीं हैं. वहीं सरकार भी बुनियादी ढांचा बनाने की बजाय अधिकांश खर्च तो गायों के चलते मुस्लिमों और दलितों पर आपराधिक मामलों को चलाने के लिए कर रही है. उन्होंने कहा पिछले कुछ मामलों में तो हिंदुओं की उग्र भीड़ ने लोगों को कथित रूप से बीफ खाने और गाय के कत्ल के आरोप में मार दिया.

शेओरन कहते हैं कि गाय, प्रशासन पर इंसानों से अधिक दबाव डाल रही है. हाल में उत्तर प्रदेश में गौहत्या की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी की हत्या हो गई. हरियाणा का भी ऐसा ही हाल है. शेओरन कहते हैं कि हरियाणा के "गौ सेवा आयोग" में 16 सदस्य हैं इतने तो राज्य के मानवाधिकार आयोग में भी नहीं हैं.

रिपोर्ट-मानसी गोपालाकृष्णन

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