गांव की धूल से कैमरों के चमचमाहट तक | खेल | DW | 06.08.2012
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खेल

गांव की धूल से कैमरों के चमचमाहट तक

केन्या के कुछ गांवों में लंबी दूरी तक दौड़ लगाने वाले इंसानों की खेती होती है. दौड़ बचपन में कच्ची सड़कों पर शुरू होती है. जवानी आते आते जब धूल छंटती है तो कई युवा गोल्ड मेडल हाथ में लिए दिखाई पड़ते हैं.

केन्या की रिफ्ट वैली, सुबह किसी चट्टान पर चढ़कर इस इलाके को देखेंगे तो लगेगा कि कुहासा धीरे धीरे ऊपर उठता बादलों में घुल रहा है. पंछियों की चहचहाहट बताएगी कि दिन चढ़ने लगा है. और फिर शुरू होती है मुश्किलों भरी जिंदगी. ऐसी जिंदगी जिसमें दौड़ना जरूरी है, वरना एक जगह से दूसरी जगह समय रहते पहुंचना मुश्किल हो जाएगा.
इन्हीं दुश्वारियों ने केन्या के गांवों के लोगों में दौड़ते रहने की बेजोड़ क्षमता भर दी. मैराथन और लंबी दूरी की दौड़ों में अक्सर केन्या के खिलाड़ी वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हैं. फिर कोई और केन्या का धावक उस रिकॉर्ड को तोड़ता है. बीते साल केन्या के मैराथन धावक ने दुनिया की पांच बड़ी मैराथन रेसें जीतीं.
रिफ्ट वैली के छोटे से कस्बे इटेन में जाने से पता चलता है कि इसके पीछे क्या वजहें हैं. समुद्र तल से 2,350 मीटर की ऊंचाई पर बसे इटेन में पेशेवर धावकों का मक्का मदीना है.
नैरोक गांव का 20 साल के जोहाना इटेन अकादमी तक बहुत मुश्किल से पहुंचा है. उसे खुद अपने परिवार और समाज से लड़ना पड़ा, "खेलों को लेकर लोग ज्यादा सोचते नहीं हैं. उनके लिए मवेशियों का ख्याल रखना ज्यादा बड़ी चिंता है. खेलों से ज्यादा उनके लिए गायें अहम हैं."
जोहान के मुताबिक अक्सर तेज दौड़ने वाले को लोग अब भी चोर या पागल समझते हैं. इसलिए वह रात में अभ्यास के बाहर निकलते रहे, नंगे पैर. वह अपने घर के आस पास खुले मैदान के चक्कर काटते रहते. 2008 में मेहनत रंग लाई और इटेन की अकादमी से जोहाना को बुलावा आया. जोहाना खुशी से झूम उठे, लेकिन इटेन जाकर पता चला कि अकादमी में उनके जैसे सैकड़ों जवान धावक हैं. इतनी भीड़ में खुद के लिए अलग जगह बनाना आसान नहीं.
कैसे हुई शुरूआत
केन्या ग्रेट ब्रिटेन का उपनिवेश रह चुका है. 1976 में आयरलैंड में पैदा हुए ब्रदर कोल्म ओकोनेल इटेन पहुंचे. चर्च के मिशन के तहत वहां पहुंचे ब्रदर ओकोनेल लोगों के दौड़ने की क्षमता देखकर हैरान हो गए. उन्होंने वहां के नौजवानों को पेशेवर धावक के रूप में तराशना शुरू किया. यह काम अब भी जारी है. 1976 से अब तक अकादमी 25 वर्ल्ड चैंपियन, चार ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट और 800 मीटर के मौजूदा रिकॉर्डधारी डेविड रुडिशा को पैदा कर चुकी है.
ब्रदर कोल्म ओकोनेल कहते हैं, "पुराने दिनों में मैंने लड़के, लड़कियों को सिर्फ मजे और स्थानीय प्रतिस्पर्द्धाओं के लिए प्रशिक्षण दिया. अब हमारे पास प्राथमिक और द्वितीयक एथलेटिक्स संघ जैसी बहुत अच्छे संगठन हैं. ये कम उम्र वाली प्रतिभाओं को पहचान ले रहे हैं."
किशोरों में जोश भरना ब्रदर ओकोनेल को आज भी पसंद है. उनकी मेहनत का नतीजा है कि आज इटेन की गली गली में धावक हैं. दुनिया भर में ख्याति कमाने वाले धावकों ने काफी पैसा दान किया है जिसकी वजह से पहाड़ियों पर नए स्पोटर्स सेंटर बनाए जा रहे हैं. वर्ल्ड चैंपियन बनने वाले चमचमाती कारों को कस्बे में दौड़ाते हैं. यह दिखावा नई पीढ़ी को उत्साहित करता है, उसमे ललक भरता है. ब्रदर ओकोनेल कहते हैं, "बच्चे अपने गांव में वर्ल्ड चैंपियनों को देखते हैं. वे देखते हैं कि इटेन की सड़कों पर वर्ल्ड चैंपियन दौड़ रहे हैं तो वे भी इसे आजमाना चाहते हैं. लेकिन इसमें धैर्य की जरूरत है, अति करने पर सारा जोश खत्म हो जाएगा."
बेड़ियों को तोड़ती दौड़
दौड़ ने केन्या की महिलाओं की किस्मत भी बदल दी है. 1990 के दशक तक ग्रामीण इलाकों में लोग लड़कों को बाहर भेजते थे और लड़कियों की शादी कर देते थे. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केन्याई महिलाओं की दौड़ ने इस परम्परा और सोच को तो़ड़ा है. ब्रदर ओकोनेल कहते हैं, "धीरे धीरे मां-बाप को ये लगने लगा कि एथलीट होना लड़की के लिए शादीशुदा होने से ज्यादा फायदेमंद है. या हो सकता है कि उन्हें ये लगने लगा है कि एथलीट बनने से वे ज्यादा पैसा कमा सकेंगी, दहेज की प्रथा से बाहर आ जाएंगी. इसीलिये अब वे कहते हैं कि उसकी शादी मत करो, उसे दौड़ने दो."
रिपोर्ट: विक्टोरिया अवेरिल, इटेन/ओ सिंह
संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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