गर्भवती महिलाओं और अजन्मे बच्चों के लिए गंभीर खतरा बढ़ती गर्मी | भारत | DW | 03.06.2022

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भारत

गर्भवती महिलाओं और अजन्मे बच्चों के लिए गंभीर खतरा बढ़ती गर्मी

बढ़ते तापमान की वजह से गर्भवती महिलाओं और उनके अजन्मे बच्चों के स्वास्थ्य पर काफी ज्यादा असर पड़ सकता है. कई मामलों में बच्चे समय से पहले पैदा हो सकते हैं. वहीं, कुछ मामलों में जन्म से पहले उनकी मौत हो सकती है.

गर्मी ने बढ़ायी गर्भवती महिलायों की मुश्किल

गर्मी ने बढ़ायी गर्भवती महिलायों की मुश्किल

इस साल अप्रैल महीने में ही मौसम काफी गर्म होने लगा. पूरे दक्षिण एशिया में गर्म हवाएं चलने लगीं. भारत की राजधानी दिल्ली की रहने वाली 32 वर्षीय बबीता बसवाल के लिए इससे बुरा समय नहीं हो सकता था. नौ महीने की गर्भवती बबीता उबकाई और थकान से जूझ रही थीं, क्योंकि दिल्ली में तापमान 49 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा था.

बबीता को जब काफी ज्यादा उल्टियां होने लगी, तो उन्होंने सफदरजंग अस्पताल में खुद की जांच कराई. यहां पता चला कि वह डिहाइड्रेशन की शिकार हो गई हैं. ज्यादा जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं पर विशेष रूप से ध्यान देने वाली प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ एना कहती हैं कि हाल के हफ्तों में, प्रसूति इकाई में कई गर्भवती महिलाओं को इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

वह कहती हैं, "उनमें से ज्यादातर के शरीर में पानी की कमी हो रही है. उन्हें काफी ज्यादा पसीना आ रहा है. उन्हें टैचीकार्डिएक हो रहा है. दूसरे शब्दों में कहें, तो उनका ह्रदय एक मिनट में 100 बार से अधिक धड़क रहा है, जो सामान्य से काफी ज्यादा है. हालांकि, वे शिकायत नहीं करती हैं, क्योंकि हमारे वातावरण में यह सामान्य सी बात हो गई है.”

भारत में लू का चलना वाकई में सामान्य घटना है, लेकिन इस साल चौंका देने वाली गर्मी समय से पहले आ गई. इस बार तापमान रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है. भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में इस साल का अप्रैल महीना, पिछले 122 वर्षों के अप्रैल महीने की तुलना में सबसे ज्यादा गर्म रहा.

प्रचंड गर्मी में सफदरजंग के मैटर्निटी वार्ड में भर्ती गर्भवती महिलाएं

प्रचंड गर्मी में सफदरजंग के मैटर्निटी वार्ड में भर्ती गर्भवती महिलाएं

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव पेटेरी टलास ने मई में एक बयान में कहा, "यह असामान्य मौसम हमारी बदलती जलवायु को लेकर उम्मीद के मुताबिक है.” दुनिया के कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी बढ़ रही है. इसे देखते हुए, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं.

डॉ करिश्मा थरियानी प्रसूति विशेषज्ञ हैं और वह मां बनने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था अरमान में सलाहकार हैं. वह कहती हैं, "गर्मियों के मौसम में हमारे सामने ओलिगोहाइड्रामनिओस के बहुत सारे मामले सामने आते हैं. इसमें गर्भ में पल रहे बच्चे के चारों ओर एमनियोटिक नाम का तरल पदार्थ कम हो जाता है. साथ ही, समय से पहले बच्चे के जन्म होने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.” वह आगे कहती हैं, "भारत में गर्मी के महीने हर साल बदतर होते जा रहे हैं.”

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लू से अजन्मे बच्चों को खतरा

गर्भवती महिलाओं पर गर्म हवाओं के प्रभाव को जानने के लिए 70 अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर समय से पहले बच्चे के जन्म होने और जन्म से पहले बच्चे की मौत का खतरा 5 फीसदी बढ़ गया. ऑस्ट्रेलिया के एक अध्ययन की समीक्षा में पाया गया कि अत्यधिक गर्म मौसम के दौरान मरे हुए बच्चे पैदा होने के मामलों में 46 फीसदी की वृद्धि हुई. वहीं, अधिकांश अध्ययनों ने गर्भावस्था के दौरान गर्मी से जुड़े खतरे और जन्म के समय बच्चे के कम वजन के बीच एक संबंध पाया.

दक्षिण अफ्रीका में विट्स रिप्रोडक्टिव हेल्थ एंड एचआईवी इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरएचआई) के नेतृत्व में भी अध्ययनों की समीक्षा की गई. इसमें पाया गया, "ग्लोबल वार्मिंग के साथ तापमान बढ़ने से बच्चों के स्वास्थ्य पर काफी ज्यादा प्रभाव पड़ सकता है.” इसमें कहा गया कि "आम जनता भी गर्भावस्था के दौरान गर्मी के खतरों से काफी हद तक अनजान दिखाई देती है.”

बढ़ती गर्मी में खुद को स्वस्थ और सेहतमंद रखना आसान नहीं है

बढ़ती गर्मी में खुद को स्वस्थ और सेहतमंद रखना आसान नहीं है

अधिकांश अध्ययन उच्च आय वाले देशों में किए गए थे, लेकिन समीक्षा में कहा गया है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को ज्यादा खतरा हो सकता है. इसकी वजह यह है कि गरीब महिलाओं के पास गर्मी से बचाव का ज्यादा साधन नहीं होता है. उन्हें गर्भावस्था के आखिरी दिनों में भी ‘गर्मी सहने की क्षमता की सीमा' ज्यादा होने के बाद भी काम करना पड़ सकता है.

डब्ल्यूआरएचआई की एक शोधकर्ता डॉ दर्शनिका पेमी लाखू का कहना है, "अलग-अलग आबादी के बीच तापमान के प्रभाव का असर वाकई में अलग-अलग होने जा रहा है. यह उनके रहने के इलाके पर निर्भर करता है. एक ही शहर में रहने वाले लोगों के लिए, तापमान में वृद्धि का अनुभव अलग-अलग होगा.”

डॉ थरियानी कहती हैं, "भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं के पास एयर-कंडीशनर या कूलर उपलब्ध नहीं होता है. कभी-कभी तो उनके पास पंखे भी नहीं होते हैं, क्योंकि नियमित तौर पर बिजली नहीं होती है.”

हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 32.3 करोड़ लोगों के पास कूलिंग की सुविधा नहीं है. बसवाल उन भाग्यशाली लोगों में से एक हैं जिनके घर में एयर-कंडीशनर है. अल्ट्रासाउंड के बाद बसवाल को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. उन्हें आराम करने और खुद को हाइड्रेटेड रखने की सलाह दी गई. हालांकि, हाल के हफ्तों में गर्मी बढ़ने और बिजली की बढ़ती मांग के कारण हर दिन दो से तीन घंटे बिजली की कटौती हुई है. वह कहती हैं, "बिजली कटने के बाद, तापमान बढ़ जाता है. उसी समय मुझे चक्कर आने लगते हैं और उल्टी होने लगती है.”

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नवजात बच्चों के लिए भी खतरनाक है ज्यादा गर्मी

तापमान बढ़ने से सिर्फ अजन्मे बच्चों को ही खतरा नहीं है, बल्कि नवजात बच्चों के लिए भी यह खतरनाक साबित हो सकता है. अहमदाबाद में 2010 की गर्मी के दौरान बिना एयर कंडीशनिंग वाले अस्पताल में नवजात शिशुओं की देखभाल करने वाली इकाई में एक अध्ययन किया गया था. इस अध्ययन में पाया गया कि 42 डिग्री से हर एक डिग्री तापमान ऊपर बढ़ने पर भर्ती होने वाले नवजात शिशुओं की संख्या 43 फीसदी बढ़ी.

भारी गर्मी के बीच मैटर्निटी वार्ड के बार प्रतीक्षा करते परिजन

भारी गर्मी के बीच मैटर्निटी वार्ड के बार प्रतीक्षा करते परिजन

डॉ एना का कहना है कि गर्मी की वजह से सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कई महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा पा रही थीं. वह कहती हैं, "अगर महिला के शरीर में पानी ही नहीं रहेगा, तो वह बच्चों को अपना दूध कैसे पिला पाएगी?”

भारत पहले से ही बाल कुपोषण के उच्च स्तर से जूझ रहा है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की करीब दो तिहाई मौतों के लिए कुपोषण जिम्मेदार है. स्वास्थ्य पर बढ़ते तापमान का प्रभाव लंबे समय से शोधकर्ताओं के लिए एक चिंता का विषय रहा है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बढ़ती गर्मी भोजन और पानी की कमी को बढ़ाएगी. इससे संक्रामक रोगों का प्रसार भी होगा. गर्भवती महिलाओं और बच्चों सहित समाज के निचले पायदान पर मौजूद लोगों को सबसे अधिक खतरा होगा. उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण नए क्षेत्रों में डेंगू तेजी से फैल रहा है. इससे सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है.

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खोज और नीति में बदलाव

डॉ लखू का मानना है कि गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर गर्मी के असर के प्रत्यक्ष प्रभाव को लेकर और अधिक शोध की जरूरत है. वह कहती हैं, "कई ऐसे अप्रत्यक्ष प्रभाव और दूसरी चीजें हैं जिनके बारे में पता नहीं लगाया गया है. अनुसंधान में निम्न और मध्यम आय वाले देशों का प्रतिनिधित्व कम है.”

डॉ थरियानी भी इस बात से सहमत हैं. डीडब्ल्यू को दिए अपने साक्षात्कार के बारे में वह कहती हैं, "यह पहली बार है जब कोई इस तरह के विषय पर मेरी राय पूछ रहा है." अरमान लू की लक्षण वाले रोगियों की पहचान और उनकी निगरानी के लिए स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्रशिक्षित करता है. उन्हें यह जानकारी दी जाती है कि हाइड्रेटेड रहना कितना जरूरी है. हालांकि, डॉ थरियानी का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान गर्मी के जोखिम के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए सरकार को और अधिक प्रयास करना चाहिए.

भारत में इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है

लखू कहती हैं कि हमारे पास जितने ज्यादा नतीजे होंगे, बेहतर नीतिगत उपायों के साथ-साथ मौजूदा स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने में उतनी ही मदद मिलेगी. वह कहती हैं, "जलवायु परिवर्तन हमारी सदी में स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा होने जा रहा है. इसलिए, इस क्षेत्र में वाकई में खोज करने की जरूरत है, ताकि जो नतीजे मिले उसके मुताबिक लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सके.”

डब्ल्यूआरएचआई ने जिस डेटा को इकट्ठा किया है उसका इस्तेमाल दक्षिण अफ्रीका में एक जिला स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली को संचालित करने के लिए किया जाएगा. यह प्रणाली तापमान बढ़ने के दौरान स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए चेतावनी देने के तंत्र के तौर पर काम करेगी. लखू बताती हैं, "मान लें कि अगर हमें पता है कि किसी खास स्तर पर तापमान पहुंचने के बाद, चार से पांच बच्चों का जन्म समय से पहले होगा, तो हम उन बच्चों की देखभाल के लिए पहले से ही तैयार रह सकते हैं. इससे हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ेगा.”

वह आगे कहती हैं, "इस क्षेत्र में काम करना, हर समय सिर्फ शोध करने के बारे में नहीं है. यह वास्तव में एक वकील होने जैसा है.”