गरीबों से खेलते आंकड़े | ब्लॉग | DW | 07.07.2014
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ब्लॉग

गरीबों से खेलते आंकड़े

दो साल पहले की ही तो बात है जब कहा गया कि देश में गरीबी कम हो रही है. 21-22 प्रतिशत. लेकिन अब कहा जा रहा है कि देश के 30 फीसदी लोग गरीब हैं. आंकड़ों का ये चक्कर आखिर है क्या.

भारत जैसे महादेश में गरीबी भी अजीब चीज हो गई है. जैसा मर्जी झुलाओ, आंकड़ों की रस्सी पर झूल जाती है. पिछली सरकार के दौरान तेंदुलकर कमेटी ने बताया कि 2009-10 में गरीबों की आबादी 29.8 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में घट कर 21.9 फीसदी रह गई. लेकिन अब रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट इसे खारिज करती है. उसके मुताबिक 2009-10 में 38.2 फीसदी लोग गरीब थे. 2011-12 में घट कर 29.5 फीसदी लोग ही गरीब रह गए. यानि हर 10 में से तीन व्यक्ति गरीब है.

47 रुपये वाला गरीब नहीं!

रंगराजन कमेटी ने गरीबी रेखा निर्धारित करने का जो पैमाना रखा है वो अपनी पूर्ववर्ती तेंदुलकर समिति से कुछ ज्यादा दूर नहीं. उसकी सिफारिश है कि शहरों में हर रोज 47 रुपये तक खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब की श्रेणी में रखा जाए जबकि तेंदुलकर समिति ने यही पैमाना 33 रुपये का रखा था. गांवों के लिए पहले 27 था तो अब ये 32 रुपये है. इस तरह औसत माहवार प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर गरीबी रेखा को बढ़ा दिया गया है. ग्रामीण इलाकों में 972 रुपये से कम और शहरों में 1407 रुपये से कम प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को गरीब माना जाएगा. तेंदुलकर कमेटी में ये रेखा 816 और 1000 रुपये की थी.

Symbolbild Armut in Indien

भारत में गरीबी की अजीब व्याख्या

लीजिए, चंद रुपये और बढ़ा कर गरीबी की दर और आबादी भी बढ़ गई. फिर भी हर रोज जो 47 रुपये से ऊपर खर्च करता है, वो गरीब नहीं है. एक दिन का और दो वक्त का भोजन जुटाने और खाने के लिए कितने रुपये चाहिए, ये कोई पेचीदा गणित अब नहीं रह गया है. आटा, दाल, सब्जी, चावल, दूध, फल, तेल नमक, मसाला- ये सब एक अकेला आदमी मुट्ठी भर तो लायेगा ही. क्या कमेटियों के नतीजे ये बता रहे हैं कि उस इंसान का चुटकियों में ही काम चल जाता है. ऐसा सोचना भी कितना भयावह है. पिछले तीन दिन से काम पर नहीं आ रही बाई ने बताया कि बीमार थी और 500-600 रुपये दवा में लग गए. दोनों में से किसी भी रिपोर्ट के हिसाब से देखें तो जैसे तैसे अपने बच्चों को पाल रही ये कर्मठ स्त्री तो कहीं से गरीब नहीं. दिन भर हाड़तोड़ मेहनत के बाद एक मजदूर की औसत दिहाड़ी 300-400 रुपये के बीच है. इस तरह देश भर में बेशुमार निर्माण में लगे मजदूर मिस्त्री भी काहे के गरीब! इन अध्ययनों कि मेथोडोलॉजी और नतीजों से देखते ही देखते एक अलग सूरत निकलकर आ जाती है. इन्हीं विडंबनाओं को रेखांकित करते हुए रघुबीर सहाय ने लिखा कि “हर किस्म का भारतीय अमीर होकर एक किस्म का चेहरा बन जाता है.”

कैसे गिने जाएं गरीब

तेंदुलकर कमेटी की सिफारिशों और आंकड़े जुटाने के तरीकों पर पैदा विवाद के बाद ही 2012 में प्रधानमंत्री की आर्थिक मामलों की सलाहकार समिति के तत्कालीन चेयरमैन सी रंगराजन की अगुवाई में कमेटी गठित की गई थी. रंगराजन कमेटी के नतीजे सरकार अगर मान ले तो देश के गरीबों की संख्या में 10 करोड़ की बढ़ोतरी हो सकती है. आने वाले बजट में भी ये स्वीकार्यता रिफलेक्ट कर सकती है या संभावित विवादों को देखते हुए इसे खारिज किया जा सकता है. क्योंकि प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर गरीबी का पैमाना रंगराजन समिति की सिफारिश में भी विवादास्पद है. अमर्त्य सेन जैसे विद्वान इन पैमानों के निर्माण और इस तरह के नतीजे जुटाने वाली प्रक्रिया पर पहले ही सवाल उठाते रहे हैं. सेन के मुताबिक, “वास्तविक गरीबी इतनी गहन होती है कि उसका पता महज आय के आंकड़े से नहीं चल सकता.”

Symbolbild Armut in Indien

कई लोगों के रहने को छत नहीं

गरीबी मिटाने और सोशल सेक्टर में निवेश पर सरकार की योजनाओं और नीतियों के असमंजस को भी ये रिपोर्टें सामने लाती हैं. आखिर हम किसी सर्वमान्य और सर्वसाधारण को संबोधित किसी निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं. गरीबी रेखा का सही सही पता चलना भारत जैसे अत्यधिक आबादी और बिखरे हुए संसाधनों वाले देश के लिए बहुत जरूरी है. इसी के आधार पर सामाजिक सेक्टर के कार्यक्रम और नीतियां बनाई जाती हैं, जैसे मनरेगा. ऐसी योजनाएं शुरू तो गरीबी मिटाने के लिए की जाती हैं लेकिन वे आखिरकार भ्रष्टाचार में घिर जाती हैं क्योंकि उनमें सदिच्छा का अभाव रहता है. वे किसान को मजदूर बनाने पर तुल जाती हैं. ऐसे में टूटना तो दूर, गरीबी का नया दुष्चक्र शुरू हो जाता है. कितनी कमेटियां बना लीजिए, कहां दिखेगा. आंकड़े कभी गिरेंगे, कभी उठेंगे. लेकिन गरीब, वे फिर से और गरीब बन जाएंगे.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः अनवर जे अशरफ

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