गरीबों का सहारा स्वास्थ्य बीमा योजना | दुनिया | DW | 26.02.2014
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दुनिया

गरीबों का सहारा स्वास्थ्य बीमा योजना

भारत में गरीबों के लिए चलाई जा रही आरएसबीवाई एक विशाल कार्यक्रम है. पिछले छह साल में 3 करोड़ 60 लाख परिवारों को योजना के अंतर्गत स्मार्ट कार्ड मिले हैं. जिससे उन्हें इलाज कराने की सुविधा मिलती है.

पिछले आधे घंटे से वो कतार में इंतजार कर रही हैं. कतार में आगे लगे लोगों की उंगलियों के निशान लेकर उन्हें पंजीकृत किया जा रहा है. अपने दो साल के बच्चे को गोद में लिए रिंकू हंशी स्मार्ट कार्ड लेने आई है. एक दिन पहले, उनके छोटे शहर कोसी कलां में लाउडस्पीकर के जरिए स्मार्ट कार्ड के बारे में प्रचार किया गया. महिला की आवाज में रिकॉर्डेड संदेश में कहा गया, "फौरन पंजीकरण कराएं, मात्र 30 रुपये दें और अपने परिवार को अस्पताल में 30,000 रुपये तक के इलाज का हकदार बनवाएं. स्मार्ड कार्ड बनवाएं."

योजना के छह साल पहले शुरू होने के पहले तक हंशी जैसी दिहाड़ी मजदूरी का काम करने वालों को अस्पताल में इलाज कराने के लिए अपने जेब से पैसे चुकाने पड़ते थे. 6 सदस्यों वाले हंशी के परिवार के लिए अस्पताल में इलाज कराना आर्थिक तौर पर बोझ साबित हो सकता है.

हालांकि साल 2008 में सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की शुरुआत की. यह योजना गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले करोड़ों भारतीय के लिए है.

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योजना के तहत अस्पताल में मुफ्त इलाज

इलाज का स्मार्ट तरीका

पिछले कई सामाजिक कार्यक्रमों के लिए बाधा बनी कागजी कार्रवाई आरएसबीवाई योजना का हिस्सा नहीं है. पढ़ना लिखने नहीं जानने वाले के लिए कागजी कार्रवाई करना चुनौती भरा काम होता है. आरएसबीवाई में जानकारियां डिजिटल रूप से स्मार्ट कार्ड में रखी जाती हैं. योजना में शामिल निजी बीमा कंपनियों और अस्पतालों के लिए यह जटिल योजना है. बीमा कंपनियों का जिम्मा है कि वह लोगों तक इस कार्यक्रम की जानकारी पहुंचाए और उन्हें स्मार्ट कार्ड हासिल करने में मदद करें. स्मार्ट कार्ड के जरिए परिवार के पांच लोगों का बीमा होता है. राज्य सरकार बीमा योजना के लिए प्रीमियम भरती है. योजना के तहत हर साल एक परिवार अस्पताल में तीस हजार रुपये तक का इलाज करा सकता है. देश के सभी 28 राज्य इस योजना में स्वेच्छा से शामिल हुए हैं. आरएसबीवाई के जरिए करीब अब तक 13 करोड़ भारतीयों का बीमा हो चुका है.

स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत करीब 60 लाख लोग अस्पताल में भर्ती होकर इलाज करा चुके हैं. कुछ राज्य इस स्मार्ट कार्ड के जरिए अन्य सामाजिक सेवाएं भी देने का विचार कर रहे हैं. योजना के आलोचक भी हैं. उनका कहना है कि निजी कंपनियों को सब्सिडी देने की बजाय सरकारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में और ज्यादा पैसे लगाने चाहिए. पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की शक्तिवेल सेल्वाराज तर्क देती हैं कि योजना में ऐसे मरीज की देखभाल का बीमा नहीं किया जाता, जो अस्पताल में भर्ती नहीं हो. ऐसे अस्पतालों में जरूरत से ज्यादा ऑपरेशन किए जाने लगेंगे ताकि उन्हें लाभ हो सके. पिछले तीन साल से भारतीय श्रम मंत्रालय को सलाह और आईटी कर्मचारियों को ट्रेनिंग के काम में लगी जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी के हेलमुट हाउसश्लिड को लगता है कि अगर बाहरी रोगी को भी योजना के तहत लाया जाता तो यह काफी महंगा और संचालन का काम जटिल भरा होगा.

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ग्रामीण इलाकों में लोगों को जागरूक बनाना एक चुनौती

इलाज से महरूम

उनके मुताबिक इस योजना की कड़ी निगरानी की जाती है, ताकि इसका किसी प्रकार से गलत इस्तेमाल न हो. बीमा कंपनियां और राज्य सरकारों पर समय पर बिल नहीं देने पर जुर्माना भी लगाया जाता है. हालांकि वे मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में इस योजना को लेकर लोगों को जागरूक बनाना एक चुनौती भरा काम है. एक और बाधा यह है कि जो भी बीमा के लिए हकदार हैं, वे गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग हैं. कार्यक्रम की निगरानी करने वाले वाले राजेंद्र सिंह के मुताबिक, "समस्या ये है कि हमें जो जानकारी लेनी होती है वह 2002 की जनगणना से लेनी होती है. वास्तव में अभी और भी परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं लेकिन वे सूची में नहीं है. जब वे शिकायत करते हैं तो हम उनकी मदद नहीं कर पाते."

योजना ने कई गरीब परिवार की जिंदगी बदली है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक योजना की शुरुआत से अब तक 60 लाख लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. इस योजना का लाभ पाने वालों में से एक हैं लेले धर. धर पिछले डेढ़ साल से आंत की बीमारी से परेशान थे. लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि अपना इलाज करा पाएं. धर कहते हैं कि उन्हें इलाज कराने के लिए अपनी गाय बेचनी पड़ती. लेकिन योजना से उनके परिवार की जिंदगी बदल गई. योजना के बारे में जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपना ऑपरेशन कराया. दो दिन बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी. अस्पताल में मिले बेहतर इलाज के बारे में वह अपने पड़ोसियों को भी बताने की योजना बना रहे हैं.

रिपोर्टः काट्या केपनर/आमिर अंसारी

संपादनः आभा मोंढे

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