खो गए हिंदी आलोचना के सरताज नामवर सिंह | दुनिया | DW | 20.02.2019
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दुनिया

खो गए हिंदी आलोचना के सरताज नामवर सिंह

हिंदी के विख्यात आलोचक नामवर सिंह का 92 साल की उम्र में निधन हो गया. हिंदीप्रेमी उन्हें किन योगदानों के लिए खास तौर पर याद करेंगे.

समकालीन हिंदी साहित्य में नामवर सिंह अपनी विलक्षण आलोचक दृष्टि और असाधारण ऊर्जा के अलावा अपनी प्रस्थापनाओं, वाचिक तत्परताओं और वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक में अपनी लोकप्रियता बना लेने वाले एक प्रखर और चतुर साहित्यिक लीडर के तौर पर भी याद किए जाएंगे.

नामवर सिंह हिंदी साहित्य जगत की जगमगाहट के सरताज थे. एक से एक नायाब नगीनों वाले हिंदी जगत के बाहर भी एक दुनिया लिखने पढ़ने वालों की रही है, जो नामवर सिंह जैसे दिग्गजों की छाया से महरूम रहे. लेकिन ऐसा नहीं था कि ऐसे लेखक नामवर सिंह की प्रकांडता से वाकिफ न हों या उन्हें पढ़ते न हों या उनमें से बहुतों के मन में उनके दीदार की कामना न हो. उन्हें खूब पढ़ा गया, सुना गया और खूब समझा भी गया. संवाद-प्रिय तो वो थे ही, विवादास्पद भी रहे.

इन पंक्तियों के लेखक के पास भी उनसे मुलाकात और छिटपुट संवाद की कुछ स्मृतियां हैं. 90 के आखिरी दशकों में एक टीवी समाचार चैनल में आउटपुट प्रभारी के रूप में कार्य करने के दौरान नामवर सिंह से चैनल के दफ्तर में मुलाकात हुई थी, जहां उन्हें विशेष तौर पर बुलाया गया था. खासकर संपादकीय टीम को हिंदी की शब्द संपदा और भाषा की व्यवहारिक कलात्मकताओं के बारे में उनके विचारों से अवगत कराने के लिए. एक तरह की अघोषित ट्रेनिंग सेशन जैसा कह लीजिए. भूमंडलीकरण अपने निशान बिखेर चुका था और चारों ओर उसका बोलबाला बन चुका था. नामवर सिंह ने चमकती घूरती आंखों और अपनी सुपरिचित गहरी, स्पष्ट, खनक भरी आवाज और एक एक शब्द को जैसे तराजू पर रखते हुए पूछा कि आप लोग ग्लोबलाइजेशन को क्या लिखते हैं. कोई जवाब देता इससे पहले नामवर ही बोलेः भूमंडलीकरण बोलना चाहिए, यही उचित लगता है.

Namwar Singh (IANS)

नामवर सिंह सन् 1959 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़े थे.

नामवर जी से दिल्ली में सुदूर और टकटकी जैसी मुलाकातें होती रही थीं. एक औपचारिक प्रणाम या सलाम के बाद उनके लिए रास्ता छोड़ दिया जाता था. कमाल की स्मृति थी और बोलने की कला तो निराली ही थी. झक सफेद धोती कुर्ते में नामवर हिंदी की समकालीन मुख्यधारा के प्रधान जी या मुखिया ही लगते थे. ऊंचा कद, सीधी कमर, तन कर चलना, और ये आंतरिक अदृश्य आल्हाद कि हिंदी के कोने कोने में उनका परचम लहराता है. कितने नवोदित और कितने स्थापित कवि लेखक होंगे जो किसी न किसी रूप में नामवर सिंह की बुलंदी के मुग्ध या हैरान दर्शक न रहे होंगे. ऐसा रुतबा हिंदी में किसी का नहीं थी. शायद भारतीय भाषाओं में भी.

इस ऊंचाई और उड़ान के निर्माण में नामवर सिंह की अथक मेहनत, संघर्ष और हिंदी को एक नया प्रतिमान देने की अटूट जिद ही थी. उन्होंने अध्ययन और मीमांसा के नये प्रतिमान स्थापित कर दिए थे. वे आलोचना विधा के बॉस बने. उनके कुछ चाहने वालों ने उन्हें अपने किस्म का डॉन भी कहा. आलोचना और विमर्श का एक पुरबिया डॉन! जेएनयू और जोधपुर में प्रोफेसर के रूप में नामवर सिंह ने हिंदी अध्यापन जगत को भी कमोबेश एकछत्र रूप से अपने आगोश में लिए रखा. साहित्यिक राजनीति पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी.

जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट था. संस्कृति मंत्रालय के राजाराममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष के अलावा वो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे. वो एनसीईआरटी की हिंदी समेत कई विषयों की पुस्तक ऋंखलाओं के सामग्री चयन और संपादन बोर्ड के प्रमुख भी थे.

नामवर सिंह ने 1959 में सीपीआई के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ा था. हार गए थे. "कविता के नये प्रतिमान”, "छायावाद”, "इतिहास और आलोचना”, "कहानीः नयी कहानी”, "दूसरी परंपरा की खोज”, "वाद विवाद और संवाद” उनकी प्रमुख कृतियां हैं. उन्होंने दर्जनों किताबों का संपादन भी किया. साहित्यिक पत्रकारिता में भी नामवर सिंह अग्रणी थे. "जनयुग” और "आलोचना” पत्रिकाओं का संपादन किया. पहल, बहुवचन और पाखी आदि साहित्यिक पत्रिकाओं के उन पर विशेषांक निकाले गए, उन पर किताबें भी लिखी गईं. उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले.

कुछ लोग नामवर सिंह को याद करते हुए कोलंबियाई उपन्यासकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस के उपन्यासों का जिक्र भी कर देते हैं- "जनरल इन हिज लेबरिन्थ” हो या "ऑटम ऑफ द पेट्रियार्क.” नामवर जी के कुछ प्रशंसकों का मानना है कि हिंदी की सत्ता उन्हें सत्ता के दूसरे ठिकानों की ओर ले गई. वे सत्ताओं के अकेलेपन और व्यामोह को जानते तो थे लेकिन उनका आकर्षण शायद उन्हें सुहाता था. बहुसंख्यकवादी मान्यताओं और दक्षिणपंथी नेताओं से करीबी, इधर कुछ वर्षों में देश के राजनीतिक सांस्कृतिक संकटों पर उनकी चुप्पी और उनकी वाचिकता में जमा हो रहे एक ठहराव पर भी युवा पीढ़ी के कई लेखकों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों में गहरा क्षोभ, अफसोस और आपत्तियां थीं.

बेशक नामवर सिंह समकालीन हिंदी आलोचना के अग्रणी हैं और रामविलास शर्मा जैसे प्रखर आलोचक और साहित्य मर्मज्ञ के साथ मिलकर उन्होंने भाषा, कविता, कहानी और उपन्यास के प्रचलित मापदंडों को ध्वस्त किया, नये मूल्य और नयी दृष्टि निर्मित की, हिंदी के कई स्थापित लेखकों और नवांगुतकों को प्रश्रय दिया, समझ के नये उपकरण दिए और एक दिशा बनाई. ये सब उनके नाम उपलब्धियों का एक बड़ा जखीरा है. कृतियों का अंबार है, पुरस्कार कमेटियां, रिकॉर्ड स्तर पर गोष्ठियां, सेमिनार, भाषण, व्याख्यान, अध्यक्षता और विमोचन हैं लेकिन नामवर सिंह जैसी शख्सियत का वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी और समग्र मूल्यांकन तभी संभव हो सकता है जब हम उनके अखंड प्रताप के लौह पर्दे के अंदर झांकने का भी साहस कर सकें.

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