खुल्लम खुल्ला प्यार पर रोक | दुनिया | DW | 14.02.2014
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दुनिया

खुल्लम खुल्ला प्यार पर रोक

भारत में प्यार करने के लिए प्रेमी जोड़ों को अक्सर ऐसी जगहों की तलाश होती है जहां एकांत हो और परिवार की नजर न पड़े. सार्वजनिक रूप से प्यार का इजहार करना अब भी सपने जैसा है.

प्रेमी जोड़ों के लिए बांद्रा फोर्ट किसी स्वर्ग से कम नहीं. मुंबई भर से आए प्रेमी जोड़े यहां की पुरानी पड़ी दीवारों पर टेक लगाए आने वाले दिनों के सपने देखते हैं. किले की ऊंची दीवारों के नीचे बड़ी बड़ी चट्टानें हैं. वहां कुछ और जोड़े प्यार की बातें करते दिख जाएंगे. यहां उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं. कुछ किले के बागान में लगे ताड़ के पेड़ के नीचे बैठे नजर आ जाएंगे.

पिछले पांच साल से अपने परिवार की नजरों से छिपते हुए विकास और प्रिया यहां आ रहे हैं. 21 वर्षीय विकास कहते हैं, "यहां हमारे पास साथ समय गुजारने का मौका रहता है." विकास के मुताबिक परिवार को इस रिश्ते पर आपत्ति है. भारत में प्रेम संबंध धीरे धीरे सामाजिक रूप से स्वीकार्य किया जाने लगा है लेकिन अभी भी पूर्ण रूप ऐसा नहीं हुआ है.

कब खुलेगा समाज?

ज्यादातर शादियां अब भी परिवार तय करता है. वास्तव में लड़का या लड़की अपनी मर्जी कितना चला पाते हैं यह उनके परिवार पर निर्भर होता है. परिवार अगर खुले विचारों का होता है तो लड़का या लड़की अपनी मर्जी से चुनाव कर सकते हैं. शहरी आबादी में ज्यादातर अभिभावक अब स्वीकार करने लगे हैं कि नौजवान मिलें, लेकिन वह यह नहीं पसंद करते कि वे एक दूसरे के प्रति स्नेह दिखाएं. कई जोड़े शांति और कुछ पल अकेले बिताने के लिए बांद्रा फोर्ट आते हैं. बांद्रा फोर्ट में 25 साल के प्रेमी सचिन कहते हैं, "प्यार करने वालों के लिए बांद्रा एक घोंसले की तरह है. हमारे माता पिता यहां नहीं आते. हमें यहां शांति से समय बिताने को मिलता है." ऐसा नहीं है कि बांद्रा फोर्ट में प्रेमी जोड़ों के लिए सबकुछ हमेशा ठीक रहता है. कई बार पुलिस और मोरल पुलिस का कहर भी इन्हें झेलना पड़ता है. वैलेंटाइन्स डे के मौके पर भारत के कई शहरों में कट्टर दक्षिणपंथियों द्वारा प्रेमी जोड़ों की पिटाई आम बात है.

Bildergalerie zum Valentinstag 2012

कट्टरपंथी संगठन वैलेंटाइन्स डे का विरोध करते आए हैं.

मिलें तो मिलें कहां

"प्यार के धर्म" को बढ़ावा देने वाले संगठन के संस्थापक शशांक आनंद के मुताबिक, "पार्क में मिलने वाले युवा प्रेमी जोड़ों को कई बार वार्डन भगा देते हैं. यही नहीं उनकी डंडों से पिटाई भी की जाती है. हालांकि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है लेकिन फिर भी जोड़ों पर पार्क के वार्डन जुर्माना लगा देते हैं."

भारत में वैलेंटाइंस डे के मौके पर प्रेमी जोड़ों को कुछ ज्यादा सतर्क रहना पड़ता है. हर साल कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर निकल पड़ते हैं. निशाने पर होते हैं मॉल्स, पार्क और ऐसी जगहें जहां पर मोहब्बत करने वाले मौजूद हों. सजा के तौर मुंह पर काला रंग लगा देना, बाल काट देना और उठक बैठक कराना जैसे कुछ उदाहरण शामिल हैं, जो हाल के सालों में देखने को मिले हैं. हर बार कट्टरपंथी संगठनों का दावा होता है कि वे पारंपरिक भारतीय मूल्यों की रक्षा के लिए ऐसा कर रहे हैं. राजनयिक और लेखक पवन वर्मा इसे "असामान्य हालत" के तौर पर देखते हैं. वे इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि भारत कभी कामसूत्र की भूमि था.

सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक कथरीना पोगेंडॉर्फ काकर के मुताबिक निजी और सार्वजनिक स्थानों में सख्त विभाजन है. कथरीना कहती हैं, "समाज में सार्वजनिक रूप से यौन भावनाओं का प्रदर्शन वर्जना है. आम तौर पर सड़कों पर मर्दों को हाथ पकड़े देखा जा सकता है. लेकिन इसे आक्रामक या यौन संबंध के तौर पर नहीं लिया जाता, बल्कि दोस्ती की अभिव्यक्ति के तौर पर देखा जाता है."

एए/एमजे (डीपीए)

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