क्लाउस मान: मेफिस्टो | लाइफस्टाइल | DW | 21.12.2018
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लाइफस्टाइल

क्लाउस मान: मेफिस्टो

एक आदमी नाजियों को अपनी आत्मा बेच देता है और उनके शासन काल में एक मशहूर थियेटर स्टार बन जाता है. इस व्यक्ति पर रचित साहित्यिक मनोवैज्ञानिक वृत्तांत को लंबे समय तक जर्मनी में प्रकाशित नहीं होने दिया गया था.

"मैं पूरी तरह अपरिहार्य हूं!' अंधेरे बगीचे में निदेशक चिल्लाता है. ‘इस थियेटर को मेरी जरूरत है. थियेटर की जरूरत हर हुकूमत को होती है! कोई भी हुकूमत मेरे बिना नहीं चल सकती!" कितना भारी गुमान! यकीन करना मुश्किल है कि चंद साल पहले तक ये शख्स हेन्ड्रिक होएफगेन एक छोटा मोटा एक्टर था. लेकिन वो भीषण चाहत का मारा हुआ था, एक अदम्य लालसा कि एक दिन वो बतौर आर्टिस्ट शीर्ष पर होगा. 

दिन में 16 घंटे काम करता था. सप्ताह में एक बार उसे नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता था. और अब वो खुद को अपने सहकर्मियों से बड़ा समझता है. आखिर कैसे ये होनहार कलाकार नाजी दौर का सबसे अधिक प्रभावशाली सितारा बन बैठा? इसी सवाल की छानबीन करता है क्लाउस मान का ये उपन्यास.

शैतान से समझौता

हेन्ड्रिक होएफगेन, अपना शिष्टाचार और नैतिक संकोच नाजियों के हवाले कर देता है. सिस्टम उसे प्रायोजित करता है, गिरगिट की तरह रंग बदलकर वो एक शानदार करियर का सुख भोगता है. वो मेफिस्टो (जर्मन लोककथाओं का एक दैत्य) का किरदार भी निभाता है और यही वो किरदार है जिसकी वो सबसे ज्यादा डींगे हांका करता है.

क्लाउस मान उसे एक महत्त्वाकांक्षी दबंग के तौर पर ही नहीं दिखाते बल्कि बहुत ज्यादा असमंजस में घिरी शख्सियत के तौर पर भी दिखाते हैं. होएफगेन सत्ता में अपने संपर्कों का तो लाभ उठाता ही है, लेकिन नाजियों की कला के बारे में भौंडी समझ पर भी खूब बिफरता है.

गुस्ताफ ग्र्युंडगेंस का असली चेहरा मेफिस्टो के सफेद मास्क के पीछे से साफ साफ झांकता है. ग्र्युंडगेंस एक समय मान के दोस्त थे और थोड़े समय के लिए उनकी बहन एरिका के पति भी. ग्र्युंडगेंस जिस भीषण तेजी के साथ नाजियों के सबसे चहेते स्टार बने, उसकी वजह से ये रिश्ता टूट गया था.

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क्लाउस मान

अहंकारी और महत्त्वाकांक्षी

जहां क्लाउस मान को निर्वासन में जाना पड़ा, वहीं उनके पूर्व मित्र गुस्ताफ बर्लिन में प्रशियन स्टेट थियेटर के निदेशक पद तक पहुंच गए.

राइषमार्शल हरमन गोएरिंग उनकी कला का मुरीद था. प्रचार मंत्री योसेफ गोएबेल्स भी नाटकों के प्रीमियर पर आकर्षक एक्टरों की सोहबत में इठलाता दिखता था. कहा जाता है कि उसी दौरान ग्र्युंडगेंस ने यहूदियों को भागने में मदद की थी और गेस्टापो (जर्मन पुलिस) के फांसी के तख्तों से कम्युनिस्टों की रिहाई में मदद की थी. उन्होंने नाजी प्रचार फिल्म "युड ज्युस" (प्यारे यहूदी) में काम करने से मना कर दिया था क्योंकि कथित रूप से ये उनकी "गरिमा के खिलाफ" था.

यही वे विसंगतियां हैं जो इस शख्सियत को बहुत दमदार और सम्मोहक बनाती है, किताब में भी और वास्तविक जिंदगी में भी.

1936 में एम्सटर्डम के एक प्रकाशन ने "मेफिस्टो" का प्रकाशन किया था. पूर्वी जर्मन संस्करण 1956 में निकला. हालांकि पश्चिम जर्मनी में 1980 तक इसके प्रकाशन की मनाही थी.

गुस्ताफ ग्र्युंडगेंस के उत्तराधिकारियों का आरोप था कि उनके प्रसिद्ध पूर्वज के निजी अधिकारों का हनन किया गया है. लेकिन क्लाउस मान ने बार बार इस बात पर जोर दिया कि वो किरदार किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित नहीं है बल्कि इस किरदार का आविष्कार, नाजियों में शामिल होने वाले एक खास किस्म के व्यक्ति को दिखाने के लिए किया गया था. ये एक मौकापरस्त व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक चित्रण है, जो अपनी लालसाओं और अपने अहंकार का शिकार था और इसीलिए शैतान से एक समझौता कर बैठा.

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गुस्ताफ ग्र्युंडगेंस, एरिका मान, पामेला वेडेकिंड और क्लाउस मान

क्लाउस मान: मेफिस्टो, पेंग्विन बुक्स, 1936

1906 में म्यूनिख में जन्मे क्लाउस मान, विख्यात उपन्यासकार थॉमस मान के बेटे थे. कवि फ्रांक वेडेकिंड की बेटी पामेला वेडेकिंड से 18 साल में उनकी सगाई हो गई थी. दोनों बर्लिन आ गए जहां मान ने नाट्य आलोचक के रूप में काम करना शुरू किया. वहीं पर उन्होंने "द पायस डांस" लिखा जिसे जर्मन साहित्य में, समलैंगिक पुरुषों पर लिखा, पहला उपन्यास माना जाता है.

क्लाउस मान अभिनेता गुस्ताफ ग्र्युंडगेंस से भलीभांति परिचित थे जिनकी विशेषताओं की झलकियां मेफिस्टो के प्रमुख किरदार में दिखती हैं. क्योंकि वो उनकी बहन एरिका का प्रेमी था. क्लाउस और एरिका मान, पामेला वेडेकिंड और गुस्ताफ ग्र्युंडगेंस, सभी ने एक साथ 1925 में हैम्बुर्ग में एक नाटक में अभिनय किया था. "कवियों की संतान" होने की प्रसिद्धि उनके साथ जुड़ी जो थी.

1933 में नाजियों के सत्ता पर कब्जे के बाद, क्लाउस मान निर्वासन में सबसे महत्त्वपूर्ण एक्टिविस्ट के रूप में जाने गए. 1943 में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली और अमेरिकी सेना में "मनोवैज्ञानिक युद्ध पद्धति" के बारे में उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई. युद्ध के बाद अपनी साहित्यिक विफलता और वित्तीय संकटों से त्रस्त होकर क्लाउस रोम, एम्सटरडम, न्यू यार्क और कैलिफोर्निया के बीच आना जाना करते रहे. नींद की गोलियों के अत्यधिक सेवन से 1949 में कान में उनका निधन हो गया.

 

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