क्यों हारे रोमनी | दुनिया | DW | 07.11.2012
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दुनिया

क्यों हारे रोमनी

राष्ट्रपति बनने की मिट रोमनी की ख्वाहिश लगातार दूसरी बार धराशायी हुई. रिपब्लिकन नेता रोमनी को हराने में उनकी अपनी गलतियों का बड़ा हाथ है. कई नाजुक मुद्दों पर पूंजीवादी नेता अमेरिकी जनता की नब्ज ठीक से टटोल नहीं पाया.

मतदान से हफ्ते भर पहले अमेरिका में चक्रवाती तूफान सैंडी ने कहर मचाया. कई लोगों की जान गई और 20 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति का नुकसान हुआ. वैज्ञानिकों ने संकेत दिया कि जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसे तूफानों की ताकत बढ़ी है. उनकी संख्या में भी इजाफा हुआ है. प्यू रिसर्च के एक सर्वे में 67 फीसदी अमेरिकियों ने माना कि धरती जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है.

रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी और डेमोक्रैट राष्ट्रपति बराक ओबामा दोनों तूफान पीड़ितों तक पहुंचे. राहत कार्यों में मदद भी की. तूफान के बाद जब चुनाव प्रचार फिर शुरू हुआ तो जलवायु परिवर्तन एक अनकहा मुद्दा बन गया. उद्योगों के विकास की बात करने वाले मिट रोमनी की पहले से यह छवि बन गई थी कि वह जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं देंगे. जर्मनी समेत यूरोप के कुछ देशों में रोमनी को जलवायु के शत्रु के तौर पर देखा जाना लगा.

इसी दौरान पहली नवबंर को वर्जीनिया में एक रैली में एक नागरिक के खुलकर रोमनी से सवाल किया, "जलवायु के मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं." पहली बार रोमनी ने इसे अनसुना कर दिया. दूसरी बार ज्यादा ध्यान नहीं दिया. तीसरी बार जब यह पूछा गया कि 'जलवायु पर चुप्पी तोड़ो' तो 65 साल के रोमनी खिसिया गए और चुप्पी न तोड़ सके. वह व्यक्ति हाथ में बैनर लिए हुए था, बैनर पर भी यही लिखा हुआ था. रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों ने इसे शान में गुस्ताखी समझा. हल्का बल प्रयोग कर उस व्यक्ति को और उसकी आवाज को दबा दिया.

मीडिया ने जब इस मुद्दे को उछाला तो पूरे अमेरिका को पता चल गया कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर रोमनी से उम्मीद करना बेमानी है. उनकी पार्टी पहले से इस मुद्दे पर बदनाम रही, रही सही कसर चुनाव प्रचार के दौरान पूरी हो गई. रोमनी लगातार उद्योगों को बढ़ाने की रट लगाते रहे, लेकिन अब लोग जान चुके हैं कि अंधा औद्योगिकीकरण जलवायु संबंधी मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

USA Wahl Wahltag 2012 Anhänger der Republikaner Ergebnisse

नतीजों से मायूस रिपब्लिकन पार्टी

रुढ़िवादी: पार्टी और रोमनी

रुढ़िवादी होने का आरोप झेल रहे रोमनी पूरे चुनाव अभियान में इस छवि को तोड़ नहीं सके. समलैंगिक शादी और गर्भपात के बढ़ते प्रचलन पर रिपब्लिकन पार्टी का एक भी नेता साफ राय जाहिर नहीं कर सका. रोमनी की मुश्किल यह रही कि चुनाव प्रचार के साथ उन्होंने लचीला दिखने की कोशिश की, लेकिन यह रवैया सफल नहीं हुआ.

पार्टी से चुनाव की दावेदारी पाने की प्रक्रिया में भी रिपब्लिकन पार्टी के किसी उम्मीद्वार ने इन मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया. जो भी बातें सामने आईं, उनसे यही लगा कि पार्टी रुढ़िवादी रास्ते से बाहर नहीं निकल पा रही है.

USA Wahlen Mitt Romney

काम नहीं आया आखिरी पल का चुनाव प्रचार

वोटों का ध्रुवीकरण

एक सशक्त अमेरिका की बात करने वाले रोमनी और ओबामा मतदाताओं को बांट गए. राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी संख्या में युवाओं और दूसरे मूल के लोगों के वोट मिले. ओबामा को 60 फीसदी भारतीय मूल के अमेरिकियों के वोट मिले. दक्षिणी अमेरिकी और अफ्रीकी मूल के लोगों को वोट भी उन्हीं की झोली में गए. युवा जनता ने भी 51 साल के ओबामा पर भरोसा किया.

वहीं रोमनी के खाते में श्वेत लोगों के वोट गिरे. रिपब्लिकन उम्मीदवार को युवाओं के बहुत ज्यादा वोट नहीं मिले. उम्रदराज लोगों ने उन्हें अपनी पंसद बनाया, लेकिन यह संख्या काफी नहीं थी.

पूंजीवाद से ऊब

अर्थव्यवस्था को लेकर ओबामा और रोमनी के कई वादे एक जैसे थे. दोनों 1.2 करोड़ नौकरियां पैदा करने का स्वप्न दिखा रहे थे. बजट घाटे को कम करने की बात कर रहे थे. टैक्स कम करने का वादा भी दोनों की जुबान से निकला. लेकिन इन वादों की मंजिल तक पहुंचने की दोनों की राह अलग अलग थी. ओबामा जहां सरकारी नौकरियां बढ़ाने, बदलाव से पहले कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण और समाजिक सुरक्षा की बात कर रहे थे, तो रोमनी स्कूल और कॉलेजों पर ज्यादा जोर दे रहे थे. यह कोई नहीं बात नहीं थी. ओबामा बीते तीन साल में कम से कम 30 बार स्कूल और कॉलेजों का स्तर सुधारने की बात कर चुके थे.

रोमनी नौकरियां पैदा करने के लिए छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कर रहे थे. यह खालिस अमेरिकी तरीका है. रोमनी इसमें खासे एक्सपर्ट भी थे लेकिन 2007 के बाद से मंदी की मार झेल रही अमेरिकी जनता शायद इससे हिचकिचा गई. लोगों ने ओबामा के कम जोखिम वाले रास्ते को बेहतर माना.

शांति की तलाश

विदेश नीति को लेकर भी रोमनी पर बहुत ज्यादा आक्रमक होने के आरोप लगे. रूस, चीन और ईरान के खिलाफ वह बीच बीच में आग उगलते रहे. अफगानिस्तान और इराक जैसे युद्धों में अपने कई सैनिक खो चुकी अमेरिकी जनता को पिछली बार की तरह इस बार भी संयमित ओबामा ज्यादा बेहतर लगे. अमेरिका और ईरान के लोगों का भी मानना था कि अगर रिपब्लिकन सत्ता में आए, तो अमेरिका और ईरान की जंग होनी तय है.

रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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