क्यों बंद हो रहे हैं मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी स्कूल | भारत | DW | 28.08.2020
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

भारत

क्यों बंद हो रहे हैं मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी स्कूल

मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा विभाग ने ऐसा कदम उठाया है जिसकी वजह से हजारों सरकारी स्कूल बंद हो जाएंगे. प्रदेश के करीब 30 हजार स्कूल ऐसे थे जो एक ही कैम्पस में चल रहे थे, अब उन स्कूलों को मिलाकर 17 हजार कर दिया गया है.

आखिर क्या कारण था कि प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूलों को एक-दूसरे के साथ मिला दिया गया. मध्यप्रदेश में स्कूली शिक्षा की नीतियां बनाने के लिए जिम्मेदार, राज्य शिक्षा केंद्र के आयुक्त लोकेश जाटव बताते हैं कि "एक परिसर-एक शाला के सिद्धांत के तहत एक ही परिसर में मौजूद स्कूलों का विलय किया जा रहा है और उसे मजबूती प्रदान की जा रही है." इसका मतलब अगर कोई स्टैंड अलोन प्राइमरी स्कूल था और एक स्टैंड अलोन हाई सेकंडरी स्कूल था तो उसे मिलाकर अब एक ही स्कूल कक्षा 1 से लेकर 10 तक बना दिया गया है. स्कूलों को मिलाने के बाद उपलब्ध जगह को कंप्यूटर केंद्र, स्टाफ रूम या लाइब्रेरी के रुप में इस्तेमाल किया जाएगा.”

स्कूलों को एक-दूसरे में मिलाने की सबसे बड़ी वजह छात्रों की संख्या का कम होना है. मध्यप्रदेश में कुल 52 जिले हैं और सबसे कम छात्रों की संख्या वाला जिला है सतना. जहां करीब 600 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां 20 से भी कम छात्र हैं. सतना के जिला शिक्षा अधिकारी कमल सिंह कुशवाह इसका कारण बताते हुए कहते हैं "ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावकों का काम की तलाश में पलायन कर जाना और नि:शुल्क प्रवेश के तहत गैरसरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा के अधिकार के तहत प्रवेश मिलना छात्रों की संख्या कम होने की मुख्य वजह है." केवल सतना ही नहीं बल्कि छिंदवाड़ा, सिवनी और मंडला में 500 से ज्यादा स्कूल, रीवा में 400 से ज्यादा और इंदौर संभाग के दो जिले खरगोन और बड़वानी में 300 से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं जहां छात्र संख्या इतनी कम है कि उन्हें एक-दूसरे में मिलाए जाने पर विचार चल रहा है.

नीति आयोग द्वारा चुने गए देश के 110 आकांक्षी जिलों में इंदौर संभाग का बड़वानी जिला भी शामिल है जो कि अनुसूचित जनजाति बहुल इलाका है. इन इलाकों में लोग नगर या कस्बे में इकठ्ठा होकर नहीं रहते हैं बल्कि 10-15 घरों के समूह में रहते हैं जिन्हें फलिए भी कहा जाता है. स्कूलों को एक-दूसरे में मिलाए जाने से इन इलाकों के बच्चों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है. इस मुद्दे पर इंदौर संभाग के स्कूली शिक्षा के संयुक्त संचालक मनीष वर्मा कहते हैं, "नई शिक्षा नीति में 3 साल के बच्चे के भी पढ़ाने की बात चल रही है, केजी-1, केजी-2 और नर्सरी, तीन क्लास और जुड़ रहे हैं, बच्चे इतनी दूर कैसे आ पाएंगे और उनकी मांएं तीन साल के बच्चे को कहां से छोड़ने आ पाएगीं, तो अभी उसके ऊपर नीति तैयार हो रही है और इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कार्य योजना बनाएंगे."

मध्यप्रदेश में साल 2019-20 के बजट में शिक्षा के लिए कुल खर्च का 15.1 प्रतिशत रखा गया है जो कि अन्य राज्यों की तुलना में कम है. वहीं स्कूली शिक्षा विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए 24,499 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.

सरकारी स्कूलों की जमीन पर अटकलें

लेकिन मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों के विलय की एक और अहम वजह है. सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय मिश्र एक अहम मुद्दे पर अपनी चिंता जताते हुए कहते हैं, "ब्रिटिश टाइम में और उसके बाद भी शहरों की सबसे मुख्य जगहों पर स्कूल खुले हैं और अब उन स्कूल की जमीनों की कीमत बहुत हो गई है." चिन्मय मिश्र की मांग है कि सरकार पहले ये कह दे कि स्कूल बंद हों या न हों पर स्कूल की जमीनें स्कूल विभाग के पास रहेंगी और किसी को ट्रांसफर नहीं होंगी."

Indien Schüler bei einer Prüfung (Imago/Hindustan Times)

भारत में ऐसे भी स्कूल, लेकिन पढ़ाई महंगी

सरकारी स्कूलों की घटती लोकप्रियता का एक और प्रमुख कारण बड़ी संख्या में नए प्राइवेट स्कूलों का खुलना है. दिल्ली स्थित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के एलिमेंटरी एजुकेशन विभाग के प्रोफेसर अनूप कुमार राजपूत कहते हैं, "प्राइवेट स्कूलों की मशरूमिंग हो रही है उसकी क्वालिटी पर ध्यान देने की जरूरत है. जो राज्य इन स्कूलों को मान्यता देता है वो स्कूलों की मॉनिटरिंग भी करे. शिक्षा एक सेवा है जो कि नियम और दिशानिर्देशों के अनुसार ही होनी चाहिए." वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के पूर्व डीन प्रो. अनिल सद्गोपाल कई कारणों की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं, "सरकारी स्कूलों की बढ़ती हुई बदहाली, पर्याप्त शिक्षकों और कमरों की कमी, शिक्षकों को अक्सर गैर-शैक्षिक कामों में लगाना, 70 फीसदी प्राथमिक स्कूलों व 55 फीसदी मिडिल स्कूलों में छह साल से प्रधान शिक्षकों का न होना, तीन-चौथाई में बिजली न होना, पाठ्यपुस्तकें देरी से मिलना, इन जैसी वजहों से ही बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं."

कैसे लौटेगा सरकारी स्कूलों का नूर

तो आखिर शासकीय स्कूलों की रौनक वापस कैसे लाई जा सकती है? इसका एक उपाय हाल ही में सामने आई नई शिक्षा नीति-2020 में दिखाई पड़ता है, जिसमें पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाने पर जोर दिया गया है. अगर स्कूलों में बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाए तो संभावना है कि बच्चे स्कूलों की तरफ आकर्षित हों. इस संबंध में एनसीईआरटी की प्रोफेसर ऊषा शर्मा कहती हैं, "जब बच्चे अपनी मातृभाषा के माहौल में रहते हैं और वही मातृभाषा उनके पढ़ने का भी माध्यम बनती है तो उन्हें ज्यादा सहूलियत होती है. अन्यथा बच्चे दोतरफा संघर्ष करेंगे. जब टीचर क्लास में बच्चे की मातृभाषा को छोड़कर किसी और भाषा में समझने-समझाने की बात करती हैं तो बच्चों को काफी दिक्कतें आती हैं."

वहीं शिक्षाविद प्रोफेसर अनिल सद्गोपाल के मुताबिक, "दुनिया भर के शिक्षाविद् व भाषाविज्ञानी एकमत हैं कि आधुनिक ज्ञान हासिल करने और पराई भाषा (अंग्रेजी समेत) सीखने के लिए विश्वविद्यालय तक मातृभाषा माध्यम ही सबसे बेहतरीन जरिया है." इस बारे में एनसीईआरटी के प्रोफेसर अनूप कुमार का कहना है, "1968 के कोठारी कमीशन में और 1986 की नीति में तीन भाषाओं के फार्मूले के तहत ये लिखा गया था कि पहले पांच साल की शिक्षा बच्चों की मातृभाषा में दी जानी चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं हुआ क्योंकि क्रियान्वयन बड़ी समस्या रही." उनके मुताबिक बच्चों के प्राइवेट स्कूल में जाने का एक मुख्य कारण है अंग्रेजी भाषा. मां-बाप को लगता है कि मेरा बच्चा अंग्रेजी बोलेगा तो उसको नौकरी अच्छी मिल जाएगी, इसलिए मां-बाप उन्हें प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं. इसलिए सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेजी भाषा सिखाई जानी चाहिए. एक बच्चे में इतनी क्षमता होती है कि वो तीन-चार भाषाएं सीख सकता है.”

क्वालिटी पर जोर देने की मांग

मातृभाषा में पढ़ाई के अन्य फायदों पर प्रोफेसर ऊषा शर्मा कहती हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे बच्चों की स्कूल आने की इच्छा बढ़ेगी क्योंकि बच्चों को अपनी भाषा में गीत गाने का मौका मिलेगा या कहानी कहने का मौका मिलेगा. बच्चों की अपनी भाषा उनके स्कूल की भाषा भी होगी. उनके मुताबिक, "मातृभाषा के माध्यम से स्कूली शिक्षा देने पर बच्चों को चीजें जल्दी समझ आती है और मस्तिष्क पर कम भार पड़ता है. बच्चों को मजा आएगा, उन्हें जूझना नहीं पड़ेगा और उन्हें सेंस ऑफ एचीवमेंट भी महसूस होगा."

मध्यप्रदेश के कई पूर्व और वर्तमान सरकारी शिक्षक कुछ और उपाय अपनाने की सलाह देते हैं. उनके मुताबिक सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता और सुविधाएं मुहैया कराया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे दाखिला लें. साथ ही बच्चों के माता-पिता उन्हीं शासकीय स्कूलों की तरफ आकर्षित होते हैं जहां पढ़ाई अच्छी होती है. सरकारी स्कूलों को समय की मांग के हिसाब से चलाना बहुत जरूरी है. कोरोना महामारी की वजह से आम लोगों की कमाई पर गहरा असर पड़ा है, उस पर निजी स्कूलों की भारी फीस माता-पिता की जेब हल्की कर रही है. ऐसे में सरकारी स्कूल एक अच्छा विकल्प दिखाई देते हैं जहां बिना किसी शुल्क के शिक्षा मुहैया कराई जाती है.

__________________________

हमसे जुड़ें: Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन