क्यों पश्चिम का साथ देने को तैयार हुए पुतिन | ब्लॉग | DW | 28.09.2015
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ब्लॉग

क्यों पश्चिम का साथ देने को तैयार हुए पुतिन

पुतिन की छवि हमेशा यूरोप के सबसे अलोकप्रिय नेता की रही है. लेकिन अब वे शांति के दूत का रूप ले रहे हैं. क्या संयुक्त राष्ट्र के सामने भाषण दे कर वे अपनी छवि बदलने में कामयाब हो सकेंगे? सवाल पूछ रही हैं फिओना क्लार्क.

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए बीता हफ्ता अच्छा रहा. पूर्वी यूक्रेन में भी सब ठीक ही चल रहा है. हाल ही में उन्होंने मॉस्को में एक मस्जिद का उद्घाटन भी किया, जहां 10,000 लोगों के लिए जगह है. इसके अलावा मध्य पूर्व में शांति और सीरिया में रूस की भूमिका को ले कर भी उन्होंने इस्राएली और अरब नेताओं से बातचीत की है. अब वे न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के सामने भाषण देने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि अपने भाषण में वे एक बार फिर कुछ वैसी ही योजना बताएंगे जैसे 2012 में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को ले कर सुझाई थी. साथ ही वे इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए देशों को एकजुट होने का आग्रह भी करेंगे.

रूस पर इस्लामिक कट्टरपंथ का खतरा

रूस में करीब दो करोड़ मुसलमान रहते हैं. और पिछले सालों में वहां इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण आतंकवादी गतिविधियां होती रही हैं. कुल मिला कर 1994 से 2004 के बीच 105 हमलों में करीब 3,000 रूसियों की जान जा चुकी है. हाल के वक्त में गरीबी, भेदभाव और रूस और अन्य पूर्वी सोवियत देशों की बुरी आर्थिक स्थिति ने कट्टरपंथ के लिए जमीन तैयार की है. आईएस जैसे संगठनों के लिए हताश युवा आसान निशाना हैं.

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फिओना क्लार्क

ऐसी रिपोर्टें हैं कि कई पूर्वी सोवियत देशों में आईएस के ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं. सीरिया और इराक में कई बार कट्टरपंथी लड़ाकों के पास से रूसी और मध्य एशियाई देशों के पासपोर्ट बरामद हुए हैं. इस साल फरवरी में ही रूस की खुफिया एजेंसी एफएसबी ने आंकड़े जारी कर कहा था कि 1,700 रूसी आईएस से जुड़े हुए हैं. वहीं सीआईए का दावा है कि आईएस में 20,000 विदेशी मूल के लोग शामिल हैं. अगर ये आंकड़े सही हैं, तो 8.5 फीसदी विदेशी रूसी हुए. मध्य एशिया के देशों से कितने लोग आईएस से जुड़े हैं, इस बारे में पुख्ता आंकड़े मौजूद नहीं हैं. रूस 4,000 का दावा करता है, जबकि अन्य रिपोर्टें यह संख्या 400 से 1,500 के बीच बताती हैं.

क्या है पुतिन की असली चिंता?

इसमें हैरानी की बात नहीं है कि पुतिन चिंतित हैं. जाहिर है, रूस नहीं चाहता कि उसके पड़ोस में आईएस जैसा दुश्मन मौजूद हो. लेकिन वे केवल पड़ोसी देशों को ही ले कर चिंतित नहीं हैं, उनकी चिंता दरअसल रूस की सुरक्षा को ले कर है. मस्जिद के उद्घाटन के दौरान उन्होंने कहा कि आतंकवादी "राजनीतिक कारणों से लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खेलने की कोशिश कर रहे हैं." उन्होंने यह भी कहा कि वे "हमारे देश से लोगों को अपने संगठन में शामिल करना चाह रहे हैं."

इससे निपटने के लिए पुतिन लोगों को जागरूक करना चाहते हैं. वे समझाना चाहते हैं कि आईएस की "विचारधारा झूठ पर आधारित है." वे ना केवल लोगों को इस संगठन से जुड़ने के लिए विदेश जाने से रोकना चाहते हैं, बल्कि दरअसल उनकी कोशिश है कि देश में एक बार फिर अलगाववाद की लहर ना उठ पाए. रूस पहले ही दो बार इस कारण जंग लड़ चुका है और पुतिन नहीं चाहते कि एक बार फिर लोग दो विचारधाराओं में बंट जाएं.

इसलिए संयुक्त राष्ट्र के सामने जब वे अपनी शांति स्थापित करने की योजनाओं को पेश करें तो उसे केवल पश्चिमी देशों का साथ देने या यूक्रेन के साथ तनाव समाप्त करने का प्रयास समझना ठीक नहीं होगा. वे केवल पश्चिम के साथ ही संतुलन नहीं बना रहे हैं, बल्कि वे अपने ही विविधता से भरे देश को भी बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार फिओना क्लार्क रूस में रहती हैं. पिछले दस साल से वे द लैंसेट और ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर जैसी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं. मॉस्को से वे 90 के दशक से जुड़ी हुई हैं.

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