क्या है पैंक्रियाटिक कैंसर जिससे मनोहर पर्रिकर की मौत हुई? | दुनिया | DW | 18.03.2019
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दुनिया

क्या है पैंक्रियाटिक कैंसर जिससे मनोहर पर्रिकर की मौत हुई?

पैंक्रियाटिक कैंसर वही बीमारी है जो एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स को हुई थी. क्या है ये बीमारी जिसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है, आइए जानते हैं.

गोवा के मुख्यमंत्री और भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का 17 मार्च को पैंक्रियाटिक कैंसर की वजह से निधन हो गया. पर्रिकर 63 साल के थे. वो चार बार गोवा के सीएम रहे और मोदी सरकार में तीन साल रक्षा मंत्री रहे. 2018 में पर्रिकर को कैंसर होने का पता चला. एक साल से ज्यादा समय तक गोवा, मुंबई, दिल्ली और अमेरिका में इलाज करवाने के बावजूद उन्हें बचाया न जा सका.

क्या होता है पैंक्रियाज

पैंक्रियाज को हिंदी में नाम अग्नाशय ग्रंथि कहते हैं. यह हमारे पाचन तंत्र का एक अहम हिस्सा होती है. करीब छह इंच लंबी यह ग्रंथि बहुत सारी कोशिकाओं से मिलकर बनी होती है. यह पेट, छोटी आंत, यकृत, प्लीहा और पित्त की थैली के बीच में होती है. पेट और रीढ़ की हड्डी के बीच में यह एक दम जकड़ी हुई होती है.

पैंक्रियाज एक लंबी नाशपाती जैसे आकार की होती है जिसका एक सिरा चौड़ा और दूसरा संकरा होता है. चौड़े सिरे को हेड और संकरे सिरे को टेल कहते हैं. बीच के हिस्से को नेक और बॉडी कहते हैं. शरीर की दो बहुत महत्वपूर्ण मेसेंटेरिक धमनी और मेसेंटेरिक नस पैंक्रियाज के एक हिस्से से होकर निकलती हैं. पैंक्रियाज के दो काम होते हैं. पहला खाना पचाना और दूसरा ब्लड शुगर को नियंत्रित करना.

कैसे काम करती है पैंक्रियाज

जब खाना पेट में पहुंचता है तो पैंक्रियाज में एक एंजाइम उत्पन्न होता है. इसे पैंक्रियाटिक जूस कहते हैं. यह खाना पचाने में मदद करता है. इसके अलावा पैंक्रियाज दो हार्मोन इंसुलिन और ग्लुकागॉन भी पैदा करती है. यह खून में मिलकर शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचते हैं. इंसुलिन ब्लड शुगर लेवल को कम करता है वहीं ग्लुकागॉन ब्लड शुगर लेवल को बढ़ाता है. ये दोनों मिलकर शरीर में ब्लड शुगर लेवल का संतुलन बनाकर रखते हैं.

क्या होता है पैंक्रियाटिक कैंसर

कैंसर की सीधी सी परिभाषा है- जब किसी भी अंग में कोशिकाओं में अनियंत्रित बढ़ोत्तरी होने लगती है तो वहां एक गांठ (ट्यूमर) बनने लगती है. ऐसा ही पैंक्रियाटिक कैंसर में भी होता है, जब पैंक्रियाज में कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं. इसका कारण होता है कि या तो नई कोशिकाओं के बनने पर भी पुरानी कोशिकाएं मर नहीं रही हैं या फिर जरूरत न होने पर भी शरीर में नई कोशिकाएं बन रही हैं. ऐसा होने पर वहां एक ट्यूमर बन जाता है. जरूरी नहीं है कि हर ट्यूमर से कैंसर हो. कुछ बस सामान्य गांठें भी हो सकती हैं. कैंसर के ट्यूमर को मैलिगनेंट ट्यूमर कहा जाता है क्योंकि यह जानलेवा होता है. कैंसर शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में भी फैल सकता है.

Medizin Pathologie - Pankreaskarzinom (picture-alliance/OKAPIA KG)

ट्यूमर वाले पैंक्रियाज के भीतर की तस्वीर

यह कैंसर भी दो तरह का होता है. एक्सोक्राइन और एंडोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर. एक्सोक्राइन कैंसर पैंक्रियाटिक ग्लैंड (ग्रंथि) के अंदर होता है वहीं एंडोक्राइन ट्यूमर उस हिस्से में होता है जो हार्मोन पैदा करता है. अधिकांश लोगों को एक्सोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर होता है. करीब 93 प्रतिशत लोगों को एक्सोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर ही होता है. यह तेजी से फैलता है और जानलेवा होता है.

क्यों हो सकता है पैंक्रियाटिक कैंसर

डीएनए में बदलाव होना कैंसर का कारण बनता है. पैंक्रियाटिक कैंसर आनुवांशिक भी हो सकता है. मतलब यह परिवार से बच्चों में आ सकता है. धूम्रपान, शराब, ज्यादा लाल मांस और प्रोसेस्ड मांस खाना या मोटापा इसकी वजह हो सकते हैं. 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में पैंक्रियाटिक कैंसर का खतरा ज्यादा होता है. महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में इस बीमारी के होने की आशंका अधिक होती है.

कैसे होते हैं इसके लक्षण

पैंक्रियाटिक कैंसर के लक्षण बहुत ही सामान्य से होते हैं. ऐसे में इन पर ध्यान भी नहीं दिया जाता है. जैसे पेट या पीठ में दर्द रहना, वजन का कम होते जाना, पीलिया होना, भूख न लगना, जी मिचलाना, डायबिटीज और अग्नाश्य में सूजन आना. अगर लगातार ऐसे लक्षण दिखाई दें तो यह पैंक्रियाटिक कैंसर का संकेत हो सकता है. पैंक्रियाटिक कैंसर के बढ़ जाने पर शरीर के कई हिस्सों से खून आ सकता है. अक्सर लोगों में नाक से खून आना देखा गया है.

कैसे पता लगता है इस कैंसर का

सीटी स्कैन, एमआरआई और एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड से इस बीमारी की जांच की जा सकती है. दिक्कत ये है कि पैंक्रियाज पेट में बहुत अंदर होता है. ऐसे में सामान्य परीक्षणों से इसका पता नहीं लग सकता है. साथ ही, अब तक इसका कोई एक टेस्ट भी नहीं है. कई सारे टेस्ट करने के बाद इस बीमारी का पता लगाया जाता है.

क्या है इसका इलाज

पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में भी परेशानियां आती हैं क्योंकि पैंक्रियाटिक ट्यूमर के ऊपर एक बड़ी टिश्यू की परत बन जाती है. पैंक्रियाज शरीर में बहुत अंदर होता है और टिश्यू की परत से इस ट्यूमर को निकालना और मुश्किल हो जाता है. तीसरी स्टेज पर पहुंचने के बाद इसका इलाज लगभग नामुमकिन हो जाता है. और अक्सर पैंक्रियाटिक कैंसर तीसरी स्टेज पर पहुंचने के बाद ही पहचान में आता है. अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए तो सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन से इसका इलाज हो सकता है.

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