क्या मानवाधिकार संस्था का हिस्सा बनने योग्य है पाकिस्तान? | दुनिया | DW | 20.10.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

क्या मानवाधिकार संस्था का हिस्सा बनने योग्य है पाकिस्तान?

अफगानिस्तान, कॉन्गो और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सुरक्षा परिषद के नये सदस्य हैं. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इन देशों में मानवाधिकारों का रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है और उनका परिषद में शामिल होना निंदनीय है.

अमेरिकी सरकार ने अफगानिस्तान, कॉन्गो गणराज्य और पाकिस्तान जैसे देशों को चुनने के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की आलोचना की है. उन्होंने कहा है कि यह कदम साबित करता है कि कैसे इस परिषद की विश्वसनीयता घट गयी है. संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली ने कहा कि मानवाधिकार परिषद में सुधारों की जरूरत है.

निक्की हेली ने कहा कि इस्लामी देश पाकिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन उठाते रहे हैं. हालांकि, पाकिस्तान ने इस फैसले का स्वागत किया. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मालीहा लोधी ने इसे "मानवाधिकारों के लिए पाकिस्तान की मजबूत प्रतिबद्धता का समर्थन" बताया था. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के नेता, संसद और न्यायपालिका पूरी सक्रियता से मानवाधिकारों के मुद्दे पर जोर दे रहे हैं. लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता इससे बिल्कुल भी सहमत नहीं है.

इस मसले पर ब्रसल्स स्थित दक्षिण एशिया लोकतांत्रिक फोरम के कार्यकारी निदेशक पाउल कास्का ने डी डब्ल्यू से कहा, "यह स्पष्ट तौर पर यूएन और इसकी प्रणाली पर एक संकट है. परेशानी यह है कि दुनिया के ज्यादातर देश ऐसा दावा करते हैं कि वे मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं लेकिन असल में वे उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं." उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले लोग इस स्थिति से खुश नहीं हो सकते. उन्हें लगता है कि सभी को इस तरह की एक नई प्रणाली के बारे में सोचना होगा, जो कुछ तय किये गये सिद्धांतों पर काम करे.

मानवाधिकार परिषद के विभागों में सऊदी अरब जैसे देशों को कई महत्वपूर्ण स्थान दिये गये हैं, जबकि यह देश बड़े स्तर पर मानवाधिकारों का बहुत बड़े स्तर पर उल्लंघन करता है.

प्रयासों को झटका 

पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना ​​है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में उनके देश का समावेश, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश में अल्पसंख्यक के अधिकारों के लिये किये जा रहे प्रयासों के लिए एक झटका है.

पाकिस्तान में ईसाई, हिंदू और अहमदी जैसे अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदायों के साथ बड़े स्तर पर भेदभाव हो रहा है. पिछले कुछ सालों में ईशनिंदा कानून के चलते ही अल्पसंख्यक समुदाय के कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. पाकिस्तान में सरकार ईशनिंदा के इस विवादास्पद कानून का समर्थन करती है और इसका संरक्षण करती है. विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि अब जबकि पाकिस्तान मानवाधिकार परिषद का सदस्य है, क्या वह अपने इस विवादास्पद कानून में बदलाव करेगा.

मानवाधिकार समूह आतंकवाद के मुद्दे पर भी चेताते हैं. पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान के सहयोग की कमी की आलोचना की थी. ट्रम्प ने अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर सक्रिय चरमपंथी संगठनों को सुरक्षित आवास प्रदान करने के लिए इस्लामाबाद की आलोचना की थी.

पाकिस्तानी उदारवादियों के बीच सरकार के आलोचकों का अपहरण और हत्या एक और गंभीर चुनौती है. धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगर्स और कार्यकर्ताओं के साथ हो रही इस तरह की घटनाओं को लेकर दावा किया जाता रहा है कि सुरक्षा एजेंसियां और सरकार इस सबमें शामिल हैं. लेकिन, इस सब के बावजूद पाकिस्तान अब संयुक्त राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में बैठेगा. कार्यकर्ता कहते हैं कि यह अल्पसंख्यकों पर दमन जारी रखने के लिए देश के अधिकारियों को प्रोत्साहित करेगा.

बलोचिस्तान के एक पूर्व मुख्यमंत्री आताउल्लाह मेंगल ने डीडब्ल्यू से कहा, "पाकिस्तान का मानव अधिकार परिषद में चुना जाना उन सब का अपमान है, जो पाकिस्तान के दमन के पीड़ित हैं." उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के अधिकारी बलोचिस्तान में भी अत्याचार कर रहे हैं. इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय समूह पाकिस्तान में होने वाले मानवअधिकारों के उल्लंघन पर बिल्कुल आंख मूंद चुके हैं.

शामिल शम्स/एसएस

 

 

DW.COM

संबंधित सामग्री