क्या भारतीय नागरिकों को भी विदेशी करार दे रहे हैं असम के विदेशी न्यायाधिकरण? | भारत | DW | 07.10.2019
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भारत

क्या भारतीय नागरिकों को भी विदेशी करार दे रहे हैं असम के विदेशी न्यायाधिकरण?

कभी कारगिल में लड़ चुके फौजी को विदेशी घोषित कर दिया जाता है, तो कभी पूर्व पुलिसकर्मी को. क्या न्यायाधिकरण आनन फानन में फैसले ले रहे हैं?

असम में विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए गठित विदेशी न्यायाधिकरणों के काम-काज पर सवाल उठ रहे हैं. हाल में गौहाटी हाईकोर्ट ने मोरीगांव स्थित एक विदेशी न्यायाधिकरण के 57 फैसलों पर सवाल उठाए हैं. इनसे इन न्यायाधिकारणों की विश्वसनीयता व कामकाज का तरीका संदेह के घेरे में है.

इससे पहले भी समय-समय पर कारगिल की लड़ाई में हिस्सा ले चुके फौजी मोहम्मद सनाउल्ला समेत पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों में लंबे अरसे तक काम करने वालों को विदेशी घोषित किए जाने के बाद इन न्यायाधिकरणों पर सवाल उठते रहे हैं. अब हाईकोर्ट ने इनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए 57 फैसलों पर रोक लगा कर उन पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है.

इससे पहले ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आम्सू) ने इन न्यायाधिकरणों से संबंधित कानून में संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. असम में रहने वाला कौन व्यक्ति भारतीय नागरिक है और कौन विदेशी, इसका फैसला करने का अधिकार इन न्यायाधिकरणों को ही है. अब खासकर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) की कवायद के बाद इनकी भूमिका बेहद अहम हो गई है. सूची से बाहर रहने वाले 19.06 लाख लोगों का भविष्य भी इन न्यायाधिकरणों पर ही निर्भर है.

असम में पड़ोसी बांग्लादेश से घुसपैठ की समस्या बेहद पुरानी रही है. अस्सी के दशक में इस मुद्दे पर छह साल तक असम आंदोलन भी चला था. घुसपैठियों की पहचान के लिए पहले राज्य में अवैध प्रवासी निर्धारण न्यायाधिकरण (आईएमडीटी) की स्थापना की गई थी. तब ऐसे 11 न्यायाधिकरण थे. लेकिन 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने आईएमडीटी अधिनियम 1983 को रद्द कर दिया था. उसके बाद यहां विदेशी न्यायाधिकरण स्थापित किए गए. असम में तरुण गोगोई की नेतृत्व वाली पूर्व कांग्रेस सरकार ने राज्य में ऐसे सौ न्यायाधाकिरणों की स्थापना की थी.

इन न्यायाधाकिरणों के कामकाज को लेकर शुरू में किसी तरह का विवाद नहीं था. उस समय तादाद कम होने की वजह से सदस्यों के तौर पर सेवानिवृत्त जजों की ही नियुक्ति की जाती थी. लेकिन 2014 के बाद इन न्यायाधिकरणों में बड़े पैमाने पर वकीलों की भी नियुक्ति की गई. उसके बाद से ही इनके फैसलों पर सवाल खड़े होने लगे. अनुभव की कमी और हड़बड़ी में कई ऐसे फैसले भी सामने आए जिससे इन न्यायाधिकरणों की साख पर सवाल खड़े किए गए.

इनमें सबसे मशहूर मामला था कारगिल की लड़ाई में हिस्सा ले चुके फौजी मोहम्मद सनाउल्ला का. सेना में लंबे अरसे तक काम करने वाले सनाउल्ला को तमाम कागजातों के बावजूद विदेशी नागरिक घोषित कर दिया गया. पुलिस की एक 10 साल पुरानी जांच रिपोर्ट में सनाउल्ला को मजदूर बताया गया था. उस रिपोर्ट में जिन गवाहों के बयान थे वे लोग भी बाद में ऐसा कोई बयान देने की बात से मुकर गए. यानी महज जाली दस्तावेज के आधार पर न्यायाधिकरण ने आंख मूंद कर सनाउल्ला को विदेशी करार दिया था. एनआरसी की कवायद के दौरान ऐसे कई अन्य फैसले भी सामने आए थे. इन मामलों से साफ हुआ कि तमाम विदेशी न्यायाधिकरण अपने समक्ष आने वाले मामलों की गहराई से जांच किए बिना ही फैसला सुना देते हैं.

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात 

इस मुद्दे पर न्यायाधिकरण के ही एक कर्मचारी ने बीते साल असम सरकार और गौहाटी हाईकोर्ट को शिकायत की थी. अदालत ने तब राज्य सरकार को उन 288 मामलों से संबंधित कागजात जब्त कर एक विस्तृत रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया था. उन मामलों पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि 67 मामलों में बिना जांच-पड़ताल के ही लोगों को विदेशी करार दे कर डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया था.

इनमें से कई मामलों में न्यायाधिकरण के फैसलों की प्रतियां गायब मिलीं तो कुछ मामलों में पहले के फैसले को निरस्त किए बिना ही नया फैसला सुना दिया गया. इनमें से 11 मामलों में फैसले का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है. पांच मामलों में नोटशीट में तो आवेदक को भारतीय लिखा गया है, लेकिन फैसले में उनको विदेशी घोषित कर दिया गया है. पांच अन्य मामलों में भी दो-दो फैसले मिले हैं. इनमें से एक में आवेदक को भारतीय माना गया है तो दूसरे में विदेशी. एक मामले में आवेदक की मौत की वजह से न्यायाधिकरण ने कोई फैसला ही नहीं दिया. नतीजतन उसके उत्तारिधाकरियों का भविष्य अधर में लटक गया है.

राज्य में अब एनआरसी से बाहर रहे 19.06 लाख लोगों की अपील की सुनवाई के लिए इन न्यायाधिकरणों की तादाद बढ़ा कर तीन सौ की जा रही है. रिटार्यड जजों की कमी की वजह से सरकार ने ज्यादातर में वकीलों को नियुक्त कर दिया है. दरअसल, इन न्यायाधिकरणों में नियुक्ति व कामकाज की प्रक्रिया में भी कम पेंच नहीं हैं. हालांकि इसके सदस्यो का चयन गौहाटी हाईकोर्ट करता है. लेकिन नियुक्तियां असम सरकार के गृह (राजनीति) विभाग की ओर से की जाती हैं. इन सदस्यों पर ज्यादा से ज्यादा मामलो में लोगों को विदेशी घोषित करने का दबाव रहता है.

2017 में खराब कामकाज की दलील देकर सरकार ने 19 सदस्यो की सेवाएं खत्म कर दी थीं. उनमें से कुछ सदस्यों ने इस फैसले को गौहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उन मामलों की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई थी कि जिन लोगों ने सबसे कम मामलों में लोगों को विदेशी घोषित किया था उनको ही बर्खास्त करने की सिफारिश की गई थी.

न्यायाधिकरणों के फैसलों को सिर्फ गौहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष ही चुनौती दी जा सकती है. 1997 में सुप्रीम कोर्ट की सात-सदस्यीय खंडपीठ ने एल चंद्रा बनाम भारतीय संघ मामले में अपने फैसले में कहा था कि ऐसे न्याधाकिरणों के फैसलों को संविधान की धारा 226/227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष ही चुनौती दी जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जज मदन बी लोकुर ने बीते महीने में नई दिल्ली के इंडियन सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ की ओर से आयोजित पीपुल्स ट्राइब्यूनल शीर्षक कार्यक्रम में कहा था कि असम में विदेशी न्यायाधिकरण मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. उनका कहना था कि इन न्यायिकरणों के कामकाज में कोई समानता नहीं है. हजारों अनपढ़ लोग जटिल प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते. नामों की स्पेलिंग में मामूली गलतियों की वजह से लाखों लोग एनआरसी की अंतिम सूची में जगह नहीं बना सके हैं.

विदेशी न्यायाधाकिरणों और गौहाटी हाईकोर्ट में संदिग्ध विदेशी नागरिकों के दर्जनों मामले लड़ने वाले वरिष्ठ एडवोकेट अमन वदूद कहते हैं, "हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने विदेशी न्यायाधिकरणों के कामकाज और उनके सदस्यों की दक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं. लोगों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का फैसला करने से पहले इन लोगों को कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता.” वदूद का सवाल है कि जहां लाखों लोगों का भविष्य दांव पर हो वहां सरकार इन सदस्यों को समुचित प्रशिक्षण देने की व्यवस्था क्यों नही करती.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम में फिलहाल एनआरसी की सूची से बाहर रहे लाखों लोग दोबारा इन न्यायाधिकरणों के समक्ष अपील कर रहे हैं. यह कवायद 120 दिनों तक जारी रहेगी. लेकिन उसके बाद वैसे मामलों पर दोबारा विचार करते समय एक बार फिर इन न्यायाधिकरणों के कामकाज व विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठना तय है.

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