क्या बिना कार्बन पैदा किए किसी शहर का चल पाना संभव है | NRS-Import | DW | 06.12.2019
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NRS-Import

क्या बिना कार्बन पैदा किए किसी शहर का चल पाना संभव है

क्या ऐसा मुमकिन है कि किसी शहर में कार्बन बिल्कुल पैदा ना हो. केरल का मीनंगाडी कुछ ऐसा कर रहा है जिससे कि यहां कार्बन का उत्सर्जन शून्य हो जाएगा. आखिर इस नगर को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ गई.

नारंगी रंग की कमीज और सफेद रंग की धोती पहने जोस चकालिकली को शाम में अपने कॉफी के बागान में टहलना पसंद है. वो ऑर्गेनिक तरीके से एक खास किस्म की रोबुस्टा कॉफी पैदा करते हैं. छाया में उगने वाली ये कॉफी दक्षिण भारतीय राज्य केरल की खासियत है. जोस चकालिकली अपनी कॉफी के बारे में बताते हैं,"यह वायनाड की रोबुस्टा कॉफी है. हम हर शाखा पर गुच्छों की संख्या गिनते हैं."

बढ़िया फसल का मतलब है कि हर शाखा में 13 गुच्छे होने चाहिए. केरल के पुराने शहर मीनंगडी में चकालिकली का बाग खास है. यह भारत में पहला पूरी तरह कॉर्बन न्यूट्रल सर्टिफाइड कॉफी बागान बनने के करीब है. लेकिन इसके लिए कृषि के इतर बहुत कुछ और करने की जरूरत है. शहर ने खुद भी अपने सामने 21वीं सदी का लक्ष्य रखा है.

2016 से मीनंगाडी जलवायु विज्ञान की प्रयोगशाला सा बन गया है. स्थानीय प्रशासन शहर के कॉर्बन फुटप्रिंट को शून्य तक लाना चाहता है, इसके लिए कई क्षेत्रों से जुड़े समूहों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है. मीनंगाडी नगरपालिका की अध्यक्ष बीना विजयन कहती हैं, "दुनिया ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है, इसी वजह से हमने कॉर्बन मुक्त कार्यक्रम शुरू किया है. जब विकास की बात आती है तो लोगों को लगता है कि विकास का अर्थ सड़कें, पुल और एयरपोर्ट बनाना है, लेकिन हम इसमें पर्यावरण को भी शामिल करेंगे." भारत के लिए यह प्रयोग बहुत अहम है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में भारत दुनिया में चौथे नंबर पर है.

Indien Monsun & Landrutsch in Kerala (Getty Images/AFP)

वायनाड में 2019 में आई बाढ़

कहां गया सुहाना मौसम

मीनंगाडी में करीब 34,000 लोग रहते हैं. इस प्रोजेक्ट की शुरुआत के समय इनमें से ज्यादातर को पता नहीं था कि ग्लोबल वॉर्मिंग का क्या मतलब है. लोगों को यह जरूर पता था कि मौसम में बदलाव हो रहा है. बीना विजयन बताती हैं, "जलवायु परिवर्तन से हम सब प्रभावित हैं. वायनाड में मौसमी चक्र वैसा नहीं रह गया है, जैसा वह पहले था. वायनाड एक प्राकृतिक एयरकंडीशनर जैसा था, लेकिन अब इलेक्ट्रिक एयर कंडीशनर के बिना नींद नहीं आती है." परिवहन, हाउसहोल्ड और उद्योगों का उत्सर्जन मीनंगाडी के आस पास के जंगल पर भी भारी पड़ रहा है. जंगल जैवविविधता से समृद्ध है. इसका पता तब चला जब, शहर के कॉर्बन फुटप्रिंट की जांच के लिए एक विस्तृत शोध किया गया. शोध में पता चला कि हर साल 15 हजार टन कॉर्बन डायोक्साइड को जमीन में भेजने की जरूरत है. तभी शहर नेट जीरो या कॉर्बन न्यूट्रल स्टेटस हासिल कर पाएगा. स्वयंसेवियों और कर्मचारियों ने इलाके में वृक्षारोपण अभियान शुरू किया.

अनुमान के मुताबिक 2020 तक इस इलाके का तापमान दो से साढ़े चार डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. मीनंगाडी में तापमान में इस इजाफे का असर धान की पैदावार पर पड़ेगा. इलाइची और कॉफी जैसी फसलें गर्मी के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं, उन पर इसका भयानक असर होगा.

प्लास्टिक से तौबा

शोध में यह भी पता चला कि शहर में कुछ और बेहतरी लाई जा सकती है, मसलन कूड़े का प्रबंधन. आज हरितकर्मा सेना या ग्रीन आर्मी के कर्मचारी इस बात को पक्का करते हैं कि घर का कचरा घर में अलग अलग किया जाए. वे घर घर जाकर प्लास्टिक और रिसाइकल किए जाने वाले अन्य कचरे को जमा करते हैं. फिर इस कचरे को कॉर्बन न्यूट्रल प्रोग्राम के तहत बनाए गए रिसोर्स रिकवरी सेंटर पहुंचाया जाता है. यहां आगे की प्रोसेसिंग होती है और कचरे को अलग अलग श्रेणियों के हिसाब से छांटा जाता है.

इस फैसिलिटी और यहां के 32 कर्मचारियों के लिए यहां की मैनेजर सन्नी जिम्मेदार हैं. और जिस दिशा में चीजें आगे बढ़ रही हैं, उससे वे बेहद खुश हैं. वे बताती हैं, "किराने की खरीदारी के लिए लोग अब अपने झोले ले जाने लगे हैं. दुकानों में बिकने वाला प्लास्टिक खरीदना उन्होंने बंद कर दिया है. इसके चलते घरेलू इस्तेमाल में प्लास्टिक की खपत बहुत ज्यादा गिरी है. खुद मेरे घर में ऐसा हुआ है. इससे पहले दुकानदार अंधाधुंध तरीके से पॉलिथीन का इस्तेमाल करते थे लेकिन अब वह दौर गुजर चुका है. मीनंगाडी के ज्यादातर लोगों ने अपना जीने का तरीका काफी बदला है."

Indien Überschwemmungen in Kerala (Reuters/Sivaram V)

केरल में जलवायु चक्र बदल सा गया है

स्कूल में फूटतीं समझ की कोपलें

कॉर्बन न्यूट्रल आंदोलन शुरू होने से भी पहले स्थानीय स्कूल के हेड मास्टर अनिलकुमार ने अपने छात्रों के साथ सीओटू के उत्सर्जन को कम करने पर काम शुरू किया. वे कहते हैं, "यहां पढ़ने वाले 90 फीसदी छात्र स्थानीय आदिवासी समुदाय से नाता रखते हैं. ज्यादातर निम्न आर्थिक वर्ग से ताल्लुक जरूर रखते हैं लेकिन पर्यावरण को लेकर वे सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं. उन्हें रोपाई, पेड़ों और झाड़ियों की हिफाजत करने के लिए किसी तालीम की जरूरत नहीं है. उन्हें इसकी पर्याप्त जानकारी अपने घरों और गांवों में मिलती है."

टीचर के साथ मिलकर बच्चों ने स्कूल में बांस उगाया है. यह भी कार्बन स्टोर करने का एक तरीका है. इस इलाके में बांस प्रति हेक्टेयर 400 टन के बराबर सीओटू सोख सकता है. कार्बन न्यूट्रल प्रोग्राम के तहत मिले फंड से अनिलकुमार और उनके छात्रों ने बांस के बागान को बायोडायवर्सिटी पार्क में बदल दिया. उन्होंने बांस की कई प्रजातियां के साथ औषधीय गुणों वाले पौधे भी लगाए. नगरपालिका प्रमुख बीना विजयन कहती हैं, "ये सारे कार्यक्रम अगर सही तरीके से अमल में लाए गए तभी हम अपना महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल कर पाएंगे. मुझे उम्मीद है कि जितनी संख्या में हमने नए पेड़ लगाए हैं, वे अतिरिक्त कार्बन को दबाने के लिए काफी होंगे."पूरी तरह कॉर्बन मुक्त होना, यह ऐसा लक्ष्य है शायद कभी पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता, लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए पूरे समुदाय को साथ लाना, अपने आप में एक सफलता है. मीनंगाडी, शायद भारत के कई शहरों के लिए मॉडल का काम करे.

रिपोर्ट: सिजो जोस, रनिश पंडित/ओएसजे

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(बदलेगा मौसम तो ऐसा होगा मंजर..)

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