क्या नए टेस्ट कोरोना संकट से निबटने में मददगार हो सकते हैं | दुनिया | DW | 29.03.2020
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

क्या नए टेस्ट कोरोना संकट से निबटने में मददगार हो सकते हैं

कोरोना वायरस की जांच जल्दी हो सके तो महामारी को फैलने से रोका जा सकता है. हर रोज रिसर्चर नया टेस्ट बाजार में लाने का दावा कर रहे हैं. जानते हैं कि ये टेस्ट क्या कर सकते हैं और क्या नहीं.

जर्मनी में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, जबकि हर हफ्ते 3,00,000 लोगों का टेस्ट किया जा रहा है. इस बीच बढ़ते मामलों के कारण माना जा रहा है कि हर दिन और ज्यादा टेस्ट किए जाने की जरूरत है. तेज टेस्ट संक्रमण का जल्द पता लगाने और महामारी पर नियंत्रण करने में मददगार हो सकते हैं. जल्दी नतीजा देने टेस्ट अभी भी डॉक्टरों के रोजमर्रा का हिस्सा नहीं बने हैं, लेकिन दुनिया भर में रिसर्चर इस तरह के टेस्ट डेवलप करने पर काम कर रहे हैं.

कोरोना का पता करने वाले इस तरह के कुछ टेस्ट को लाइसेंस मिल चुका है, लेकिन उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन अभी शुरू नहीं हुआ है. हर दिन कोई न कोई रिसर्चर या कोई न कोई कंपनी नया टेस्ट विकसित करने का दावा कर रही है. चूंकि कोरोना की रोकथाम के लिए न तो कोई टीका और न ही इलाज के लिए कोई दवा, इसलिए लॉकडाउन कर लोगों को एक दूसरे से अलग रखकर वायरस के फैसले के चेन को तोड़ने की कोशिश की जा रही है. साथ ही इस समय का इस्तेमाल संक्रमण का पता करने की तेज विधि खोजने में किया जा रहा है.

समय की बचत, सेहत पर ध्यान 

इस तरह की किसी भी जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है जांच के नतीजे का जल्द से जल्द पता चलना. जितनी जल्दी पता चलेगा उतनी ही जल्दी संक्रमित इंसान को अलग थलग किया जा सकेगा. इससे एक ओर तो दूसरे लोगों के संक्रमण के खतरे को टाला जा सकेगा, तो दूसरी ओर संक्रमित व्यक्ति का इलाज भी जल्दी शुरू किया जा सकता है. तेज टेस्ट के बड़े फायदे हैं लेकिन उसके नुकसान भी हैं. वह हर उद्देश्य के अनुकूल नहीं है.

इस समय जो टेस्ट की सामान्य पीसीआर प्रक्रिया है उसमें डॉक्टर मरीजों के गले से सैंपल लेते हैं. फिर इस सैंपल को प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाता है. वहां उसे साफ किया जाता है और उसमें वायरस के डीएनए की खोज की जाती है. इस टेस्ट में तो सिर्फ चार से पांच घंटे का समय लगता है, लेकिन ज्यादा समय उसे प्रयोगशाला तक ट्रांसपोर्ट करने और रिपोर्ट भेजने में लगता है. इस समय इस जांच की मांग इतनी ज्यादा है कि कभी मैटीरियल की कमी, तो कभी क्षमता की कमी और रिपोर्ट तैयार करने में लंबी लाइन के चलते देरी हो रही है. कई बार तो मरीज तक रिपोर्ट पहुंचने में चार से पांच दिन लग जाते हैं.

संक्रमण कम करने की उम्मीद 

इस अवधि में मरीज को क्वारंटीन में रहना होता है. कई बार तो बेवजह. कर्मचारियों के अभाव में क्लीनिकों और डॉक्टरों की प्रैक्टिस में जांच करवाने में देर होती है. तेज टेस्ट की मदद से इस स्थिति से निबटा जा सकता है. बॉन यूनिवर्सिटी में वायरोलॉजी विभाग के हेंडरिक श्ट्रेक कहते हैं, “तेज टेस्ट की मदद से फौरी कदम उठाए जा सकते हैं और संक्रमण की संभावना कम की जा सकती है.“

इस तरह की मशीन बनाने की कोशिश हो रही है जो सामान्य टेस्ट की तरह वायरस के डीएनए का पता करते हैं, लेकिन नतीजे मौजूदा मशीन के मुकाबले तेजी से दे. अमेरिका में इस तरह तेज नतीजा देने वाली सेफाइड कंपनी की एक मशीन को लाइसेंस दिया गया है जो 45 मिनट के अंदर इंफेक्शन का पता बता देती है. संक्रमण विशेषज्ञ हेंडरिक श्ट्रेक कहते हैं कि इस तरह की मशीनें सिर्फ एक सैंपल को टेस्ट करती हैं और बहुत महंगी हैं. “वे रोजमर्रा में इस्तेमाल करने या बड़े ग्रुपों की स्क्रीनिंग करने के काबिल नहीं हैं.“

वायरस के संक्रमण की जांच 

इंफेक्शन का पता करने का एक और रास्ता सिरोलॉजिकल टेस्ट है जो प्रेग्नेंसी टेस्ट की तरह काम करता है. इसमें खून की एक बूंद को रिएजेंट के साथ मिलाकर एक पट्टी पर डाला जाता है. पट्टी पर रंग की मार्किंग दिखाती है कि नतीजा पॉजिटिव या निगेटिव है. इसके विपरीत शरीर में एंटीबॉडी का पता किया जा सकता है. श्ट्रेक का कहना है कि बीमारी के चरम पर ही एंटीबॉडी के बारे में सही सही पता किया जा सकता है. लेकिन इंफेक्शन के शुरुआती दिनों में इसका सबूत नहीं दिया जा सकता.

इस तरह के टेस्ट पुराने इंफेक्शन का निशान खोजने और संक्रमण का विकास खोजने में मदद कर सकते हैं. बीमारी खत्म होने के बाद भी एंटीबॉडी शरीर में रहते हैं. इस तरह के सबूत के लिए हाइडेलबर्ग के जर्मन कैंसर रिसर्च सेंटर के रिसर्चर भी काम कर रहे हैं. महामारी विशेषज्ञ टिम वाटरबोयर कहते हैं, “एंटीबॉडी टेस्ट के साथ हम ऐसे लोगों की शिनाख्त कर सकते हैं जिन्हें इंफेक्शन हुआ था. वे अब काम करने जा सकते हैं, उन्हें सुरक्षा देने की जरूरत नहीं रहती.“

बिना चिंता के कर सकेंगे काम

महत्वपूर्ण बात ये है कि जब तक महामारी का फैलना जारी है, वायरस से रक्षा करने वाले एंटीबॉडी वाले डॉक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी और सुपर मार्केटों के कर्मचारी बिना चिंता के काम पर जा सकते हैं. इस तरह के पहले टेस्ट बाजार में आ गए हैं, मसलन बर्लिन की बायोटेक कंपनी फार्माएक्ट का. जिस तरह से नए टेस्ट बाजार में आ रहे हैं, टिम वाटरबोयर उनकी अच्छी तरह जांच की मांग करते हैं. वे कहते हैं, “जरूरी है कि वे सचमुच काम करें और सचमुच सुरक्षा देने वाले एंटीबॉडी के सबूत दें.“

संक्रमित व्यक्ति का जल्द पता लगाने के लिए रिसर्चर ऐसे टेस्ट पर काम कर रहे हैं जो वायरस या उसके हिस्सों को पहचान सके. इस टेस्ट के विकास पर इस समय जर्मनी के हेल्महोल्त्स सेंटर सहित कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां साथ मिलकर काम कर रही हैं. छह से आठ हफ्ते में वे टेस्ट का एक प्रोटोटाइप लाना चाहते हैं, जिसका उसके बाद परीक्षण किया जा सकेगा. एक माइक्रोचिप की मदद से कुछ मिनटों के अंदर टेस्ट के नतीजे हां या ना में मिल जाएंगे. बाद में टेस्ट के नतीजों को मोबाइल फोन पर भी भेजा जा सकेगा. तेज़ टेस्टों के बाज़ार में आने से कम से कम स्थानीय स्तर पर जांच के बाद कर्फ्यू या लॉकडाउन हटाया जा सकेगा.

एमजे/ओएसजे (डीपीए)

__________________________

हमसे जुड़ें: Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन