क्या त्वरित न्याय से बलात्कार के मामले कम हो जाएंगे? | भारत | DW | 02.12.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

भारत

क्या त्वरित न्याय से बलात्कार के मामले कम हो जाएंगे?

बलात्कार के बढ़ते हुए मामलों के बीच, संसद में उठी आरोपियों को पीट पीट कर मार देने की मांग. पर क्या इससे बलात्कार के मामले कम हो जाएंगे?

एक के बाद एक बलात्कार के कई नए मामलों के उजागर होने के साथ ही भारत में एक बार फिर बलात्कारियों को तुरंत कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग उठने लगी है. हैदराबाद में एक 27 वर्षीया महिला डॉक्टर के बलात्कार और हत्या के मामले पर राज्य सभा में हुई चर्चा के दौरान सांसद जया बच्चन ने कहा कि बलात्कारियों को सबके सामने पीट पीट कर जान से मार देना चाहिए. इसके पहले केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के भी कुछ इसी तर्ज पर व्यक्त किये हुए विचार सामने आये थे. 

जाने माने अभिनेता अनुपम खेर ने भी ट्विटर पर लिखा था कि बलात्कारियों को चौराहे पर गोली मार देनी चाहिए.

ये पहली बार नहीं है जब बलात्कार को लेकर इस तरह के जज्बाती बयान दिए गए हैं. बढ़ते हुए बलात्कार भारत के लिए एक बहुत बड़ी समस्या हैं और इन पर लगाम ना लगने से अक्सर एक सामूहिक आक्रोश जन्म ले लेता है. 2012 में भी दिल्ली में एक सामूहिक बलात्कार के बाद कई दिनों तक आम जनता द्वारा प्रदर्शन किये गए थे, जिसके बाद बलात्कार की रोकथाम के लिए एक कड़ा कानून बनाया गया. लेकिन इससे ना तो बलात्कारियों को सजा मिलने की दर में बढ़ोत्तरी हुई है और ना बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है.

ऐसे में कितना सार्थक होगा त्वरित न्याय की मांग करना और ये कह देना कि बलात्कारियों को तुरंत सजा मिलनी चाहिए? इस पर लेखिका और पत्रकार वर्तिका नंदा का मानना है कि आक्रोश स्वाभाविक है और इसे होना भी चाहिए, लेकिन इसकी वजह से हम समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच पाते. वह कहती हैं, "जुर्म करने के कुछ लक्षण होते हैं, जो कई बार प्रत्यक्ष और कई बार अप्रत्यक्ष रूप से नजर आते हैं. लोगों को समझ आ सकता है कि कोई व्यक्ति जुर्म कर सकता है लेकिन वो उसे अनदेखा कर देते हैं." नंदा यह भी कहती हैं कि हमारी न्यायिक व्यवस्था का धीमा होना भी इन हालात के लिए जिम्मेदार है. 

पर क्या इस वजह से गोली मार देने और चौराहे पर लटका देने जैसी मांगें रखना जायज है? महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी इन्हें गैर जिम्मेदाराना बयान मानती हैं. वह कहती हैं, "इस समय देश में बलात्कार के 97,000 मामले लंबित हैं. अगर उनमें से आधे मामलों में भी दोष सिद्ध हो गया तो आप इतने सारे दोषियों को फांसी चढ़ा देंगे या गोली मार देंगे?" वह कहती हैं कि न्यायिक प्रक्रिया तेज काम करे, फास्ट-ट्रैक का मतलब फास्ट-ट्रैक ही रहे और निर्भया के केस की तरह हर केस का हश्र न हो जिसमें सात साल बीत गए पर अभी तक दोषियों को सजा नहीं हुई.

साफ है कि इस विषय को लेकर लोगों का मत विभाजित है. लेकिन जया बच्चन के बयान की काफी आलोचना हुई है. पत्रकार गार्गी रावत ने ट्विटर पर लिखा कि हम कंगारू अदालत और भीड़ तंत्र को बढ़ावा नहीं दे सकते.

वेबसाइट न्यूजलांड्री हिंदी के सम्पादक अतुल चौरसिया ने ट्वीट किया कि पुलिस व्यवस्था में सुधार हो, लोगों में कानून का भय हो, लोगों को न्याय मिलने का भरोसा हो, इन चीजों की मांग करने के  बजाय भीड़ को न्याय का अधिकार दे दिए जाने की हिमायत करना प्रशासन तंत्र की असफलता को छुपा लेने का प्रयास है.

पत्रकार निधि राजदान ने ट्वीट किया, "लिंच-मॉब बन जाना सभ्य समाज का काम नहीं है."

पत्रकार निखिल वागले ने ट्वीट किया, "गंभीर मामलों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जज्बाती हो कर कुछ भी कह जाना सही तरीका नहीं है."

सीके/आरपी

_______________________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

संबंधित सामग्री

विज्ञापन