क्या तुर्की ग्रीस की राह पर है? | दुनिया | DW | 16.10.2018
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दुनिया

क्या तुर्की ग्रीस की राह पर है?

पिछले कई वर्षों तक ऊंचाईयों को छूने वाली तुर्की की अर्थव्यवस्था अब हांफ रही है. बहस शुरू हो चुकी है कि क्या तुर्की उसी आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है जहां 10 साल पहले उसका पड़ोसी ग्रीस खड़ा था?

2018 में तुर्की की मुद्रा लीरा की कीमतों में करीब 40 फीसदी की गिरावट देखी गई. सालाना महंगाई दर 100 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है. लोग रोजमर्रा की जरूरतों के बढ़ते दामों को लेकर परेशान हैं.

विदेशी कर्ज का बोझ

तुर्की के आर्थिक संकट को समझने के लिए एक दशक पहले जाना होगा. 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिका समेत दुनिया के तमाम विकसित देशों ने विकास के लिए ब्याज दरें घटाईं ताकि उद्योगों को आसानी से सस्ता कर्ज मिल सके. तुर्की को कई यूरोपीय व अमेरिकी बैंकों से सस्ता कर्ज मिला, जिसके बाद वहां के रियल एस्टेट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा मिला. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक चूंकि तुर्की विदेशी मुद्रा के कर्ज पर अधिक निर्भर था, इसलिए यही उसके मौजूदा आर्थिक संकट की एक वजह है. पश्चिमी एशिया के विशेषज्ञ और जेएनयू में प्रोफेसर आफताब कमाल पाशा ने डॉयचे वेले से कहा, ''तुर्की की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का दबदबा है और कुल कर्ज में 70 फीसदी से अधिक हिस्सा डॉलर में लिया गया कर्ज है.''

बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट के आंकड़ें बताते हैं कि स्पेन के बैंक ने तुर्की को 83 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज दिया है, जबकि फ्रांस का 38.4 अरब डॉलर, इटली के बैंकों का 17 अरब डॉलर और जापान के बैंकों का 14 अरब डॉलर तुर्की की अर्थव्यवस्था में लगा है.

इस बीच अमेरिका के कड़े रुख ने आग में घी का काम किया है. जुलाई 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तुर्की से आनेवाले स्टील और अल्युमिनियम पर आयात शुल्क दोगुना कर दिया. अब तक ईरान के तेल और गैस की पाइपलाइनों की बदौलत तुर्की को फायदा मिलता रहा था, लेकिन ईरान पर ट्रंप सरकार की सख्ती के बाद तुर्की को भी खामियाजा भुगतना पड़ा. इस तरह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वजह से बढ़त हासिल कर रहे तुर्की पर अमेरिकी नीतियों की दोहरी मार पड़ी है. प्रो. पाशा कहते हैं कि आज की तारीख में तुर्की की अल्युमिनियम की फैक्टरियों के बंद होने का खतरा है. मजदूरों में रोजगार छिनने का डर है.

सारी शक्तियां एर्दोवान के पास

बारह साल प्रधानमंत्री रहे रेचेप तैयप एर्दोवान 2014 में राष्ट्रपति बने और 2018 में चुनाव जीतकर फिर पांच साल के लिए राष्ट्रपति बन गए. अब तुर्की में प्रधानमंत्री पद खत्म कर दिया गया है. राष्ट्रपति ही अब सरकार का प्रमुख होगा. तुर्की में नए सिस्टम के तहत राष्ट्रपति को ही बजट का मसौदा तैयार करना है. यानि राष्ट्रपति एर्दोवान पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो गए हैं.

रूढ़िवादी एर्दोवान की नीतियां आर्थिक मामलों में भी दिखती हैं. तुर्की ने मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने की ठानी है. प्रो. पाशा के मुताबिक आज तुर्की का करीब आधा से ज्यादा व्यापार पूर्वी देशों में हो रहा है. पिछले एक दशक में एशियाई देशों की ओर रुझान बढ़ा है.

एर्दोवान की इस्लामी और रूढ़िवादी एकेपी पार्टी के 2002 में सत्ता में आने के बाद से तुर्की बहुत बदल गया है. कभी धर्मनिरपेक्षता की मिसाल देने वाला तुर्की इन सालों में और ज्यादा धार्मिक हो गया है. जिस तुर्की में कभी बुरके और नकाब पहनने पर रोक थी वहां हिजाब की बहस के साथ सड़कों पर ज्यादा महिलायें सिर ढंके दिखने लगीं हैं. एकेपी के सत्ता में आने से पहले तुर्की की राजनीति में सेना का वर्चस्व था. देश की धर्मनिरपेक्षता की गारंटी की जिम्मेदारी उसकी थी. लेकिन एर्दोवान के शासन में सेना लगातार कमजोर होती गई. एर्दोवान के सत्ता में आने के शुरुआती दिनों में आर्थिक हालात तो बेहतर हुए, लेकिन नया धनी वर्ग भी पैदा हुआ जो रूढ़िवादी था.

यूरोपीय संघ से दूर होता तुर्की

1990 के दशक में जब रेचेप तैयप एर्दोवान इस्तांबुल के मेयर थे तो उन्होंने कहा था, "लोकतंत्र सड़क पर चलने वाली एक कार है. जब आपकी मंजिल आ जाती है तो आप उसमें से उतर जाते हैं." दो दशक बीत जाने के बाद आज तुर्की लोकतांत्रिक संरचना से लगातार दूर होता गया है. दरअसल तुर्की ने 2023 तक यूरोपीय संघ का सदस्य बनने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अपनी संरचनाओं को ईयू के अनुरूप ढालने के बदले वह लगातार यूरोपीय देशों से लड़ रहा है. 2016 में तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद तुर्की में हजारों सैनिक और सरकारी अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया है और सैकड़ों को जेल में डाल दिया गया है.

प्रो. पाशा मानते हैं कि ग्रीस और तुर्की के आर्थिक संकट की तुलना में यूरोपीय संघ की भूमिका अहम है. चूंकि ग्रीस यूरोपीय संघ का सदस्य है, इसलिए उसे नियम से बंधकर रहना है. आने वाले दिनों में भी ग्रीस को संघ से सहायता मिलती रहेगी. वह कहते हैं, ''तुर्की यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, इसलिए जर्मनी, स्पेन, फ्रांस समेत अऩ्य सरकारों को एर्दोवान सरकार पर निर्भर रहना पड़ेगा.'' 

आंकड़ों पर गौर करें तो 2000-2008 के बीच ग्रीस के कर्ज में साल-दर-साल 18.8 फीसदी की वृद्धि देखी गई.. वहीं 2010-2018 के बीच तुर्की का कर्ज हर साल 22.5 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा. दोनों देशों में तुलना होना स्वभाविक है क्योंकि ग्रीस की तरह ही तुर्की के आर्थिक संकट का असर अन्य देशों में फैल सकता है. हालांकि कई विश्लेषक यह भी मानते हैं कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में अंतर है. तुर्की की अर्थव्यवस्था ग्रीस से चार गुना बड़ी है और इसकी आबादी भी ग्रीस के मुकाबले सात गुना है. ऐसे में तुलना करना फिलहाल जल्दबाजी होगी.

भारत पर असर

भारत और तुर्की के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.26 अरब डॉलर का है और व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है. विशेषज्ञ मानते हैं कि लीरा के अवमूल्यन और रुपये की कीमत में गिरावट का एक दूसरे से कुछ लेना देना नहीं हैं. लेकिन चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था अमेरिका और चीन के बीच चल रहे कारोबारी युद्ध की चपेट में आ चुकी है, ऐसे में भारतीय निवेशकों में घबराहट और अनिश्चितता पैदा हो रही है. प्रो. पाशा कहते हैं, ''भारत के मामलों में कश्मीर को लेकर तैयप हस्क्षेप करते रहे हैं और यह भारत को नागवार गुजरा है. भारत से न्यूक्लियर तकनीक मिलने की उम्मीद तुर्की को थी, जिससे वह अपने थोरियम के भंडार को मैनेज कर सके, लेकिन भारत ने इससे मना कर दिया है.''  

पड़ोस के देशों के साथ अमेरिका से झगड़ते एर्दोवान का एक भाषण दिलचस्प है. अमेरिकी प्रतिबंधों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था, ''अगर अमेरिका के पास डॉलर है तो हमारे पास लोग हैं, हमारे पास अपने अधिकार हैं और हमारे पास अल्लाह हैं.'' सवाल है क्या एर्दोवान के लोकलुभावन भाषण तुर्की को आर्थिक संकट से बचा पाएंगे?

 

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