क्या झूठ बोल रहे हैं सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस? | दुनिया | DW | 25.10.2018
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दुनिया

क्या झूठ बोल रहे हैं सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस?

क्राउन प्रिंस ने यह तो मान लिया है कि पत्रकार जमाल खशोगी की मौत सऊदी कंसुलेट में हुई लेकिन इससे इनकार किया कि उन्हें इस बारे में पता था. सऊदी अरब की शासन व्यवस्था में क्या यह मुमकिन है या क्राउन प्रिंस झूठ बोल रहे हैं?

वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार जमाल खशोगी की मौत के बारे में क्राउन प्रिंस के बयान पर यकीन करना बहुत से लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है. सऊदी अरब में विदेशी निवेशकों के एक बड़े सम्मेलन में क्राउन प्रिंस ने कहा, "यह अपराध सभी सऊदी लोगों के लिए सचमुच दर्दनाक है और मुझे लगता है कि यह दुनिया के हर इंसान के लिए दर्दनाक है." इसके साथ ही उन्होंने अरबी में यह भी कहा, "यह एक जघन्य अपराध है जिसे कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता."

इस बयान के साथ ही क्राउन प्रिंस ने इस घटना के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को सजा दिलाने और इसकी जांच में तुर्की के साथ मिल कर काम करने का भरोसा दिलाया है. इससे पहले भी जब सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने मामले की पुष्टि की थी, तो उनके बयान में भी यह जताने की कोशिश की गई कि क्राउन प्रिंस को बगैर जानकारी दिए निचले दर्जे के कुछ अधिकारियों ने इस काम को अंजाम दिया.

"झूठ बोल रहे हैं क्राउन प्रिंस"

क्राउन प्रिंस के बयान को खारिज करने वालों में सबसे पहले अमेरिका सामने आया. इसके बाद तुर्की की तरफ से जिस तरह से एक के बाद एक सबूत दिए जा रहे हैं, उनसे भी इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है. मध्यपूर्व के जानकार फज्जुर रहमान का तो साफ कहना है, "जो कुछ क्राउन प्रिंस कह रहे हैं वह बेबुनियाद है, अर्थहीन है, वह साफ साफ झूठ बोल रहे हैं."

विश्व मामलों की भारतीय परिषद यानी आईसीडब्ल्यूए में सीनियर फेलो फज्जुर रहमान ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "जैसा सऊदी शासन तंत्र है और उसमें खशोगी को जिस तरह से विद्रोही और सत्ताविरोधी के रूप में प्रचारित किया गया है, उसमें यह मुमकिन ही नहीं कि बिना क्राउन प्रिंस की मर्जी के इतना बड़ा काम कर दिया जाए. तुर्की से और कुछ मीडिया संस्थानों से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उनसे यह साफ हो जाता है कि इसकी काफी तैयारी की गई थी."

रहमान ने यह भी कहा, "15 लोगों का विमान से आना, बातचीत होना, खशोगी से यह कहना कि आप कल आइएगा तब आपके कागजात जमा होंगे. रिपोर्ट तो यह भी है कि कंसुलेट में आने से ठीक पहले उनसे बातचीत की गई और कहा गया कि आप आ जाएंगे तो अच्छा रहेगा. इन सारी बातों को संदर्भ में जोड़ कर देखें, तो इस बात की कोई गुंजाइश नहीं बचती की क्राउन प्रिंस को इस बारे में नहीं पता था."

रहमान ने इसके साथ यह भी कहा कि सऊदी अरब के शासन तंत्र की जो व्यवस्था है, उसमें किसी ऐसे शख्स को, जो सऊदी नागरिक और अमेरिकावासी हो, उसे किसी तीसरे देश में राजनयिक नियमों का उल्लंघन कर निशाना बनाया जाए और उसकी खबर सऊदी क्राउन प्रिंस को ना हो, यह मुमकिन ही नहीं.

जमाल खशोगी और सऊदी अरब के बीच जुड़े तारों को समझने के लिए पिछले दो सालों पर नजर डालें, तो कई और बातें सामने आती हैं. इन दो सालों में सऊदी अरब में जो भारी बदलाव हुए हैं, उनमें एक कड़ी जमाल खशोगी से भी जा कर मिलती है. जमाल खशोगी के सऊदी अरब के शाही घराने से रिश्ते इन दो सालों में ही बदले हैं. इसके पहले वह शाही घराने के बेहद नजदीक थे.

सऊदी अरब के दो राजदूतों के वो मीडिया सलाहकार रह चुके हैं. सऊदी अरब के शासन में मोहम्मद बिन सलमान के ऊपर आने के बाद जमाल खशोगी जिस तरह शाही परिवार से दूर हो गए उससे यह तस्वीर थोड़ी और साफ होती है.

खशोगी की हत्या की खबरों में बार बार यह भी कहा जा रहा है कि वह सऊदी सरकार के खिलाफ लिख रहे थे. क्या सचमुच वो इस शासनतंत्र के खिलाफ थे जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी?

सऊदी अरब के खिलाफ क्या लिखा खशोगी ने?

वॉशिंगटन पोस्ट के लिए लिखे उनके लेखों पर नजर डालें तो ऐसा नहीं लगता कि खशोगी लोकतंत्र के कोई प्रबल समर्थक या फिर सऊदी सरकार के विरोधी थे. इसके अलावा सिर्फ लेख लिखने के लिए अधिकारियों के स्तर पर इतने हाईप्रोफाइल तरीके से राजनयिक जोखिम उठा कर किसी की जान लेने की बात भी हजम करना मुश्किल है.

दो साल में खशोगी के लेखों को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने कभी भी यह नहीं कहा कि सऊदी शासन को उखाड़ फेंका जाए, जैसा कि आम तौर पर विद्रोही मांग करते हैं. ना ही उन्होंने राजशाही को खराब बताया. खशोगी ने तो यहां तक लिखा और इंटरव्यू में कहा है कि लोकतंत्र दुनिया का हल नहीं है. खशोगी ने चीन की मिसाल दे कर एक इंटरव्यू में यह भी कहा है, "चीन बिना लोकतंत्र के ही बहुत फलफूल रहा है." तो फिर क्राउन प्रिंस को उनकी किन बातों से दिक्कत हुई होगी?

फज्जुर रहमान कहते हैं, "खशोगी ने सिर्फ इस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि जब से नए क्राउन प्रिंस आए हैं, राजनीतिक जवाबदेही खत्म होती जा रही है. वो यह कहते थे कि जो सारे सुधार हैं, उनके लिए जब तक राजनीतिक तंत्र नहीं बनेगा, लोग राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं होंगे, इन पर अमल होना मुश्किल है. तब तक जो कुछ कहा जा रहा है, वह सिर्फ खोखली नारेबाजी है. वो यह भी चाहते थे कि क्राउन प्रिंस के फैसलों पर भी कोई सवाल उठाने वाला होना चाहिए, लेकिन इस शासन को या फिर सलमान को हटाने की बात उन्होंने नहीं की."  

सऊदी शासन में क्राउन प्रिंस के उभार के बाद जिस तरह से वहां बदलाव हुए हैं, उसे लेकर लोगों ने बड़ी दिलचस्पी दिखाई है. महिलाओं को अधिकार दिए गए और आम लोगों की निजी स्वतंत्रता को भी नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें हो रही हैं. इसके साथ ही अर्थव्यवस्था को भी मूल रूप से बदलने की कवायद में क्राउन प्रिंस के उत्साह को सराहना मिली.

इन कोशिशों के बीच जो सबसे बड़ी उथल पुथल मची, वह सऊदी अरब के शाही परिवार में थी. खशोगी उससे भी कहीं ना कहीं असंतुष्ट थे और उनका मानना था कि सत्ताधारी परिवार के फैसलों पर भी सवाल उठाने का कोई तंत्र होना चाहिए. जानकार कम उम्र में क्राउन प्रिंस को मिली सत्ता की ताकत को भी खशोगी की हत्या की वजह मानते हैं. फज्जुर रहमान ने साफ साफ कहा, "30 साल की उम्र में सत्ता मिलने के बाद क्राउन प्रिंस को उम्मीद है कि अगले 50 साल तक वो चाहें तो राज कर सकते हैं. तो ऐसे में जो कोई भी उनकी राह में रोड़ा बन सकता है, उसे वो पहले ही जड़ से मिटा देना चाहते हैं."

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