क्या जलवायु परिवर्तन को रोक सकता है इंसान | विज्ञान | DW | 19.11.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

विज्ञान

क्या जलवायु परिवर्तन को रोक सकता है इंसान

सैलानियों का पसंदीदा शहर वेनिस पानी में डूबा है और दिल्ली धुएं में. कहीं बाढ़ की मुसीबत है तो कहीं तूफान और कहीं सूखा कहर ढा रहे हैं. इन सबकी सबसे बड़ी वजह है ग्लोबल वॉर्मिंग. क्या इसे रोका जा सकता है?

 

जर्मनी में कोयले और पेट्रोल की जगह सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है. जर्मनी ने पिछले सालों में जीवाश्म उर्जा पर निर्भरता कम करने और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने का फैसला किया है और इसके लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं. इस पूरी प्रक्रिया को एनर्गिवेंडे नाम दिया गया है यानी ऊर्जा के उत्पादन और इस्तेमाल में बदलाव. जर्मनी के परमाणु और कोयला बिजली घरों को बंद किया जा रहा है. यह मुहिम बीते कई सालों से चल रही है और इस दौर के अनुभवों को जर्मनी भारत सहित दूसरे देशों के साथ साझा कर रहा है. इस पूरी कवायद का एक ही मकसद है य ऐसी वजहों को खत्म या कम करना जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहे हैं. धरती की गर्मी को बढ़ने से रोका जा सका तो जलवायु परिवर्तन भी रुक सकेगा. 

दुनिया भर के लोगों का अनुभव बटोरती और उन्हें आपस में बांटती जर्मनी की प्रदर्शनी एनर्गिवेंडे अब भारत पहुंची है. इस बार उसे बंगलुरू के नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज में 18 से 23 नवंबर तक दिखाया जा रहा है. एनर्गिवेंडे का सीधा मतलब होता है ऊर्जा परिवर्तन. इसी के तौर तरीकों और दुनिया भर में किए जा रहे उपायों के बारे में यह प्रदर्शनी जानकारी देती है. जर्मनी 2050 तक जीवाश्म ईंधन और परमाणु उर्जा पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है. इसके बाद यहां हर काम के लिए अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल होगा. 

Deutschland Kraftwerk Neurath in Köln (picture-alliance/Construction Photography/plus49)

जर्मनी में एक कोयले वाले बिजली संयंत्र से निकलता धुआं

पिछले साल जर्मनी में 35.2 फीसदी ऊर्जा अक्षय माध्यमों से उत्पन हुई थी. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा पवन ऊर्जा का था. उत्तरी जर्मनी में तेज हवा चलने के कारण वहां बहुत सारी पवन चक्कियां लगाई गई हैं. दक्षिण और पश्चिम जर्मनी में इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है. इस साल मार्च के महीने में देश की पवनचक्कियों से 16 टेट्रावाट प्रति घंटे की बिजली मिली. ये पूरे देश की जरूरत का एक तिहाई था. यह जर्मनी जैसे विकसित राष्ट्र के लिए एक नया रिकॉर्ड भी था.

अक्षय ऊर्जा के उत्पादन के मामले में उत्तर और दक्षिण के इलाकों में अंतर है. यही कारण है कि उत्तर में हमेशा अधिक बिजली उपलब्ध रहती है जबकि दक्षिण में इसका अभाव रहता है. सरकार का प्रयास है कि पवन चक्कियों से पैदा होने वाली बिजली को भी इलेक्ट्रिसिटी हाइवे के जरिए उत्तर से दक्षिण में ले जाया जाए. यह प्रोजेक्ट सिर्फ महंगा ही नहीं, बल्कि तकनीकी चुनौतियों से भरा भी है. इतना ही नहीं जिन रास्तों से होकर यह हाइवे गुजरेगा वहां रहने वाले लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं.

Infografik Windkraft Zubau 2018 weltweit EN

कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे बेहतर उपाय भी मौजूद हैं. पवन ऊर्जा या सौर ऊर्जा का एक जगह बड़े पैमाने पर उत्पादन की जगह स्थानीय समाधान तलाशे जा सकते हैं. इससे लंबे समय में ज्यादा फायदा होगा. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट में ऊर्जा की अर्थव्यवस्था और तकनीक पर काम कर रहीं डॉ. तान्या क्नाईस्के ऐसे ही एक उपाय की खोज में 'स्मार्ट नेबरहुड्स' पर रिसर्च कर रहीं हैं.

डॉ क्नाईस्के ऐसे इलाके चाहती हैं जिनमें आस-पास ही अक्षय ऊर्जा बनाई जाए और उसको एक लोकल ग्रिड में जमा किया जाए. इस ग्रिड की बिजली को सभी पड़ोसी इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर अग्रवाल जी के घर पर सब छुट्टी पर हैं, तो उनके पड़ोसी मेहता जी उनसे बिजली ले कर ढेर सारे कपड़े वॉशिंग मशीन में धो सकते है. हर घर स्मार्ट सॉफ्टवेयर से जुड़ा होगा और आपको इस तरह की जानकारी देता रहेगा.

डॉ. तान्या क्नाईस्के का कहना है कि ऐसी परियोजनाओं से ये इलाके 80 फीसदी तक आत्मनिर्भर बन सकते हैं. उसके बाद लोगों को भी अपने व्यवहार में कुछ बदलाव लाना होगा. वे बताती हैं, "मैं और मेरा परिवार अब कम घूमने-फिरने जाते हैं ताकि हवाई जहाज का ज्यादा प्रयोग ना हो. मैं बिजली भी ग्रीनपीस के प्रोवाइडर से लेती हूं क्योंकि वे लोग पर्यावरण के लिए बहुत कुछ करते हैं."

Infografik CO2 pro Person pro 1000 km EN

किस यात्रा में कितना कार्बन उत्सर्जन

आसमान में उड़ते हवाई जहाज भी कार्बन उत्सर्जन को बहुत ज्यादा बढ़ाते हैं. डाटा एजेंसी स्टाटिस्टा के मुताबिक 2018 में 3.81 करोड़ हवाई जहाज दुनिया भर में उड़े. दस साल पहले के मुकाबले यह संख्या दोगुनी है. अगर आप दिल्ली से बंगलुरू के बीच 3400 किलोमीटर लंबी यात्रा हवाई जहाज से करें तो एक बार आने जाने में  0.631 टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में मिल जाता है.

जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हर इंसान के पास सालभर में सिर्फ 0.600 टन कार्बन का बजट है. तो आपकी बाकी उड़ानें पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाएंगी आप खुद ही सोच सकते हैं. जाहिर है कि इसमें से जहां मुमकिन हो कटौती करनी चाहिए.

उपाय जो भी हो, उनके बारे में लोगों को बताना और अलग-अलग देशों को इस बहस में शामिल करना बहुत ही महत्वपूर्ण है. दुनिया की सैर करती हुई इस प्रदर्शनी का यह ही मकसद है. डॉ. तान्या क्नाईस्के के शब्दों में, "एनर्गिवेंडे सिर्फ ऊर्जा के बारे में ही नहीं है – यह जीने का तरीका है."

वेनिस की ऐतिहासिक इमारतों और दिल्ली में रहने वालों की सेहत का क्या होगा पता नहीं लेकिन समय रहते अगर उपाय किए जाएं तो ऐसी मुसीबतें टाली जा सकती हैं.

__________________________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

इससे जुड़े ऑडियो, वीडियो

संबंधित सामग्री

विज्ञापन