क्या घर वापस लौट पाएंगे अफगान शरणार्थी? | दुनिया | DW | 17.02.2020
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दुनिया

क्या घर वापस लौट पाएंगे अफगान शरणार्थी?

अमेरिका और तालिबान के बीच शांति संधि के आसार बढ़ने से पाकिस्तान में रह रहे अफगान शरणार्थियों में अपने घर लौटने की उम्मीद जगी है.

हुकुम खान ठीक से नहीं बता सकते कि उनकी उम्र कितनी है लेकिन उनकी दाढ़ी लंबी और सफेद है. और 40 साल पहले जब वे अफगानिस्तान में चल रहे युद्ध से भाग कर पाकिस्तान आए थे, तब उनके बच्चे छोटे थे. खान उन्हें गधों की पीठ पर लाद कर पहाड़ों से होते हुए उत्तरपश्चिमी पाकिस्तान में ले आए थे. 

उस समय जंग पूर्ववर्ती सोवियत संघ के खिलाफ थी और खान उन पचास लाख से भी ज्यादा अफगानियों में से थे, जिन्हें मजबूरन पाकिस्तान में शरणार्थी बनना पड़ा था. अफगानिस्तान में इतनी बमबारी चल रही थी कि अभियान को 'स्कॉर्च्ड अर्थ' के नाम से जाना जाता था.

चार दशक के युद्ध और संघर्ष के बाद 15 लाख से भी ज्यादा अफगान आज भी पाकिस्तान में शरणार्थियों की तरह रहते हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें उनकी अपनी ही सरकार ने त्याग दिया है, मेजबान देश में भी उनकी उपस्थिति अवांछनीय है और संयुक्त राष्ट्र ने भी उन्हें नजरअंदाज कर दिया है.

अब, कई सालों में पहली बार, उन्हें घर लौट जाने की एक धुंधली से उम्मीद दिखाई दी है. अमेरिका और तालिबान के बीच एक शांति संधि के आसार बढ़े हैं और दोनों पक्षों में अस्थायी तौर पर "हिंसा में कमी" पर सहमति हुई है. 

अगर यह शांति बनी रही तो दोनों पक्षों के बीच अगला कदम हो सकता है अफगानिस्तान के मौजूदा युद्ध का अंत, जो कि अब अपने 19वें साल में है. इस संधि से अमेरिकी सैनिक अपने घर वापस लौट जाएंगे और एक दूसरे से लड़ रहे अफगानियों के बीच शांति कायम करने पर बातचीत शुरू हो जाएगी. 

एक संभावित शांति संधि की पृष्ठभूमि में, पाकिस्तान 17 फरवरी को अफगानियों के बतौर शरणार्थी बिताए 40 सालों को मान देने के लिए एक सम्मलेन की मेजबानी कर रहा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंटोनियो गुटेरेश भी हिस्सा ले रहे हैं. राजधानी इस्लामाबाद में हो रहे इस सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के लिए उच्चायुक्त फिलिप्पो ग्रांदी भी हिस्सा लेंगे और अफगानियों को वापस उनके घर पहुंचाने में मदद करना उन्हीं का काम होगा. 

कई शरणार्थियों ने पहले भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के मदद और उम्मीद भरे वादों के झांसे में आ कर वापस जाने की कोशिश की है. पर वापस जा कर उन्हें पता चला कि उनके लिए ना खाना है और ना छत. कई अफगानियों को यह भी पता चला कि वे गांव जिन्हें वे दशकों पहले छोड़ कर चले गए थे, अब वहां उनकी वापसी कोई नहीं चाहता. 

भ्रम दूर हुआ तो वे पाकिस्तान और ईरान लौट गए. हजारों और अफगानियों ने तस्करों को पैसे दिए और यूरोप भाग जाने का जोखिम उठाया. वहां से कइयों को फिर हवाई जहाजों में बिठा कर अफगानिस्तान वापस भेज दिया गया. ग्रांदी ने एक साक्षात्कार में यूरोप से शरणार्थियों के जबरन वापस भेजे जाने को "शर्मनाक" बताया.  उन्होंने कहा, "मैं पूरी उम्मीद करता हूं कि ईरान और पाकिस्तान, जिन्होंने इतने खुले दिल से मेजबानी की, अपनी सीमाएं बंद करने वाले अमीर देशों की मिसाल ना लें, ना सिर्फ अफगानियों के लिए बल्कि और शरणार्थियों के लिए भी." 

अमेरिका-तालिबान शांति संधि से यह उम्मीद तो जगती है कि शरणार्थी आखिरकार अपने घर लौट जाएंगे, फिर भी ग्रांदी का कहना है, "मुझे लगता है इस बार वे लोग जो अब भी अपने देश से बाहर हैं बहुत सावधानी से फैसला लेंगे. उन्हें इस बात की गारंटी चाहिए होगी कि यह उपाय टिकाऊ होगा."

एक और चुनौती होगी उस बड़ी रकम को जमा करना जिसकी ना सिर्फ विदेश में रह रहे शरणार्थियों को वापस लौटने में मदद करने के लिए जरूरत होगी, बल्कि उन लाखों अफगानियों को भी लौटने में मदद करने के लिए होगी जो अपने देश के अंदर ही विस्थापित हैं.

शरणार्थी हुकुम खान के बच्चे अब बड़े हो गए हैं और उनके खुद के भी बच्चे हैं. अपने देश में फैली हुई गरीबी के लिए वे देश के भ्रष्ट नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं. उनके पीछे है धूप में पकी मिट्टी और तिनकों के घर वाला कैंप. बीते 40 सालों से यही कैंप उनका घर है.  पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रान्त की राजधानी पेशावर से ठीक बाहर मौजूद ये कैंप अफगानिस्तान की सीमा से सिर्फ 30 किलोमीटर दूर है. स्थानीय लोग इसे इसके इर्द गिर्द पनप आईं कबाब की कई दुकाओं की वजह से कबाबयान कैंप कहते हैं. लेकिन उनमें से ज्यादातर दुकानें बहुत पहले बंद हो चुकी हैं. 

खान फटे हुए कपड़े पहने दर्जनों बच्चों से घिरे हुए हैं. फरवरी की सर्द सुबह होने के बावजूद किसी के पैर में मोजा नहीं है. उनके हाथ और पैर मिटटी से सने हुए थे. वे कहते हैं कि उनके पास गुटेरेश और ग्रांदी के लिए एक सन्देश है, "हम ज्यादा नहीं मांगते. पहले हमें शांति चाहिए. जब शांति कायम हो जाए, फिर हमें जमीन दी जाए जिस पर हम सबसे पहले अपने घर बना सकें. फिर हमें खाना चाहिए और उसके बाद स्कूल, दुकाने और मस्जिदें बनाने में मदद चाहिए."

शाह वली, जो एक और बुजुर्ग शरणार्थी हैं, लगभग 40 साल पहले अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांत नांगरहार के सुर्खरूद में अपना घर छोड़ आये थे. उन्होंने वापस लौटने की भी कोशिश की, पर वापस गए तो कुछ भी नहीं बचा था. जो युद्ध में बच गया था उसे पड़ोसियों और चोरों ने ले लिया. लेकिन शांति की धुंधली सी रोशनी से भी उन्हें उम्मीद है. वो कहते हैं, "हमें शांति दे दो और फिर हम वापस लौट जाएंगे. कौन अपनी मातृभूमि के पास लौट जाना नहीं चाहता?"

सीके/आईबी (एपी) 

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