क्या अब भारतीय समाज में मिल गई है शराब पीने वालों को मान्यता | दुनिया | DW | 19.02.2019
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दुनिया

क्या अब भारतीय समाज में मिल गई है शराब पीने वालों को मान्यता

एक समय था जब भारत में जो लोग निजी तौर पर शराब पीते भी थे, वे खुल कर इसकी बात नहीं करते थे. लेकिन धीरे धीरे देश में शराब पीने वालों की तादाद बढ़ती ही गई और उससे जुड़ी वर्जनाएं भी कम होती दिख रही हैं.

भारत में शराब की खपत और इसका सेवन करने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है. पीने वालों में मगिलाओं की संख्या भी बढ़ी है और कई तो इसकी लती बन चुकी हैं. फिलहाल देश में लगभग 16 करोड़ लोग शराब का सेवन करते हैं. केंद्रीय सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक साझा सर्वेक्षण में इसका पता चला है. छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश व गोवा में शराब पीने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है.

मोटे अनुमान के मुताबिक, शराब के अत्यधिक सेवन की वजह से होने वाली बीमारियों और सड़क हादसों की वजह से देश में हर साल लगभग तीन लाख लोगों की मौत हो जाती है. बीते साल सितंबर में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट में भी इस पर गहरी चिंता जताई गई थी.

क्या कहता है ताजा सर्वेक्षण

केंद्रीय सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने साझा तौर पर 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में व्यापक सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट जारी की है. इस दौरान 186 जिलों के दो लाख से ज्यादा घरों का दौरा कर लगभग 4.74 लाख लोगों से बातचीत की गई.

इस सर्वेक्षण के दौरान पहली बार शराब का सेवन करने वाली महिलाओं के आंकड़े भी जुटाए गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरुषों में शराब या अल्कोहल का सेवन करने वालों की तादाद महिलाओं (1.6 फीसदी) के मुकाबले बहुत ज्यादा (27.3 फीसदी) है. लेकिन लगभग तमाम राज्यों में महिलाएं अब शराब पीने लगी हैं. शराब पीने वाली महिलाओं में से 6.4 फीसदी इसकी लती हो गई हैं.

सर्वे में कहा गया है कि छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और पंजाब में पुरुषों की कुल आबादी में से आधे से ज्यादा लोग नियमित रूप से शराब का सेवन करते हैं. आंकड़ों के लिहाज 4.20 करोड़ पियक्कड़ों के साथ उत्तर प्रदेश इस मामले में पहले स्थान पर है. पश्चिम बंगाल व मध्यप्रदेश में शराब का सेवन करने वालों की तादाद क्रमशः 1.40 और 1.20 करोड़ है. रिपोर्ट के मुताबिक, शराब पीने वालों में से 5.70 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनको स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याओं के लिए इलाज की जरूरत है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट

बीते साल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत में शराब के बढ़ते सेवन पर चिंता जताते हुए कहा था कि इससे यहां सालाना 2.60 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है. यह मौतें स्वास्थ्य संबंधी जटिल बीमारियों और शराब पीकर सड़कों पर निकलने की स्थिति में होने वाले हादसों में होती हैं. हर साल सड़क हादसों में होने वाली मौतों में से लगभग एक लाख का शराब से परोक्ष संबंध होता है.

संगठन ने देश में किशोरों में शराब पीने की बढ़ती लत पर गहरी चिंता जताई थी. पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया की डॉक्टर मोनिका अरोड़ा कहती हैं, "किशोरों में शराब के सेवन की बढ़ती लत पर अंकुश लगाना एक गंभीर चुनौती है.” रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में शराब की खपत तेजी से बढ़ रही है. वर्ष 2005 जहां देश में प्रति व्यक्ति इसकी औसतन खपत 2.4 लीटर थी वहीं वर्ष 2016 में यह दोगुनी बढ़ कर 4.3 लीटर तक पहुंच गई.

मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल अस्पताल के सर्जन डॉक्टर पंकज चतुर्वेदी कहते हैं, "स्वास्थ्य राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है. इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में शराब के सेवन की उम्र में भी अंतर है. कहीं यही 18 साल है तो कहीं 25 साल.” वह कहते हैं कि पूरे देश में इस मामले में समान नीति लागू करने के लिए एक केंद्रीय कानून जरूरी है.

बीते साल ही 23 अगस्त को मेडिकल जर्नल लांसेट में छपी बीमारी का वैश्विक बोझ (ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज) में कहा गया था कि दुनिया भर में 15 से 49 साल की उम्र के लोगों की हर 10 मौतों में से एक अल्कोहल के इस्तेमाल के चलते होती है. उक्त रिपोर्ट वर्ष 1990 से 2016 के बीच दुनिया भर के 195 देशों में अल्कोहल के इस्तेमाल और स्वास्थ्य पर उसके कुप्रभावों के अध्ययन के बाद तैयार की गई थी. उसमें कहा गया था कि रोजाना दो पैग पीने वाले लोगों में से सात फीसदी में बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है जबकि रोजाना पांच पैग पीने वाले 37 फीसदी लोगों को यह खतरा होता है.

विशेषज्ञों की राय में

विशेषज्ञों का कहना है कि शराब के बढ़ते सेवन के स्वास्थ्य के अलावा आर्थिक व सामाजिक पहलू भी हैं. इसे पीने वाले लोगों के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायतें भी बढ़ रही हैं. इसके अलावा ज्यादातर कमाई शराब पर खर्च कर देने की वजह से परिवार का पेट पालने और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाने में भी दिक्कतें आती हैं. डॉक्टर पंकज चतुर्वेदी कहते हैं, "स्वस्थ समाज के लिए गंभीर खतरे के तौर पर उभरती इस लत पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस उपाय जरूरी हैं. इसके तहत अल्कोहल पर टैक्स लगाना और इसके विज्ञापनों पर रोक लगाना शामिल है.”

लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि शराब की बिक्री केंद्र व राज्य सरकारों के लिए दुधारू गाय है. इससे उनको राजस्व के तौर पर मोटी कमाई होती है. यही वजह है कि देश में शराबबंदी वाले कुछ राज्यों को छोड़ दें तो तमाम राज्य सरकारें इसकी बिक्री पर अंकुश लगाने की बजाय इसे बढ़ावा देने में ही जुटी हैं. एक समाजशास्त्री प्रोफेसर असित कुमार मंडल कहते हैं, "जहां शराबबंदी है वहां भी तस्करी के जरिए भारी मात्रा में शराब पहुंचती है. यह पुलिस और संबंधित विभाग के लिए अवैध कमाई का जरिया बनता जा रहा है. मौजूदा हालात में इस समस्या पर काबू पाना मुश्किल ही नजर आता है. कोई भी सरकार इस मोटी कमाई से हाथ नहीं धोना चाहती.” सामाजिक संगठनों का कहना है कि शराब के सेवन की औसत उम्र तय करने संबंधी कानून बनाने के अलावा इसकी वजह से होने वाली बीमारियो पर बड़े पैमाने पर जागरुकता अभियान चलाना भी जरूरी है.

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