कौन हैं बेघरों और बीमारों को सहारा देने वाले | दुनिया | DW | 09.07.2019
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दुनिया

कौन हैं बेघरों और बीमारों को सहारा देने वाले

अमेरिका में बेघर रहने वाले लोगों की बढ़ती तादाद के बीच ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें इलाज, मनोवैज्ञानिक मदद या किसी और तरह जीवन में दूसरे मौके की दरकार है. कौन करता है ऐसे लोगों की मदद, देखिए.

हेनरी जोंस एक दशक से अधिक समय से अमेरिका के वाशिंगटन डीसी की गलियों में रह रहे हैं. ऐसा तब से है जब उनके स्वास्थ्य में गिरावट आनी शुरू हुई थी. बीमारी, शराब की लत और चलने में असमर्थ होने पर उन्होंने अमेरिका की राजधानी में एक आपातकालीन कक्ष (इमरजेंसी रूम) ले जाने की मांग की लेकिन वहां काम करने वालों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया. जोंस कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनकी हालत गंभीर नहीं थी. देश के सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क का हिस्सा होते हुए भी वे उसकी सुविधा उठाने से चूक गए थे.

एक कार्यकर्ता ने उन्हें बताया कि वह एक आश्रय गृह में जा सकते हैं, जहां उन्हें कम से कम कुछ रातों के लिए एक बिस्तर मिल सकता है. इसके अलावा उनके सामने बेघरों को स्वास्थ्य सेवा और आराम करने की जगह मुहैया करवाने वाली किसी और संस्था में जाने का विकल्प था. जोंस ने दूसरे विकल्प का चुनाव किया.

वे क्राइस्ट हाउस गए जहां उनका इलाज हुआ, सोने के लिए बिस्तर मिला और शराब छुड़वाने में मदद भी की गई. आगे चलकर इसी संस्था की मदद से उन्हें एक स्थायी घर मिला और नौकरी भी. जोंस अब क्राइस्ट हाउस में ही काम करते हैं. वे कहते हैं, "जब सड़क पर रहने के कारण लोग आपको हेय दृष्टि से देखते हैं और ऐसा सोचते हैं कि आपका आगे का सारा जीवन भी इसी हाल में कटने वाला है." जोंस बताते हैं कि क्राइस्ट हाउस इस मामले में किसी और जगह से बिल्कुल अलग है. यहां लोगों को फिर से अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की जाती है.

सन 1985 में स्थापित क्राइस्ट हाउस अमेरिका के उन पहले स्थानों में से एक था जो एक ऐसी सेवा देता है जो आपातकालीन कक्ष और आश्रयगृह के बीच की कमी को दूर करता है. इसकी तर्ज पर देश के कई और शहरों में भी ऐसे केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं जो स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ साथ छत भी उपलब्ध करवा रही है.

नेशनल हेल्थकेयर फॉर द होमलेस काउंसिल, एनएचसीएचसी अम्ब्रेला ग्रुप की जूलिया डॉबिन्स कहती हैं, "यह एक ग्रे क्षेत्र है. यदि आप रखे जाते हैं, तो आपको एक अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी और आपको कहीं नहीं जाने के निर्देश दिए जाएंगे. लेकिन बेघरों के पास कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं होता है. और इस वजह से ही देखभाल में समस्या होती है." इसी संस्था ने 2016 में इस मुद्दे पर मानक प्रकाशित किए थे.

पूरे अमेरिका में बेघरों के लिए आश्रय मौजूद हैं लेकिन ये आमतौर पर दिन के समय बंद होते हैं. डॉबिन्स कहती हैं, "हम इस देश में बेघर होने का अपराधीकरण करते हैं, इसलिए लोग कहीं भी टिक कर नहीं रह पाते. उन्हें बार बार अपनी जगह बदलनी पड़ती है.

ये राहत केंद्र बेघर और बीमार लोगों को ना केवल इलाज और आराम का मौका देते हैं बल्कि अपने भविष्य के बारे में सोचने का अवसर भी प्रदान करते हैं.  वे देखते हैं कि ऐसे लोगों को किस तरह की मदद की जरूरत है या उन्हें किन दूसरी सेवाओं से जोड़ा जा सकता है.

क्राइस्ट हाउस का कहना है कि ऐसी 24 घंटे वाली चिकित्सा देखभाल, आवास और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाना एक काफी बड़ा काम है. इस संस्था के सह-संस्थापक और चिकित्सा निदेशक जेनेल गोएचेस पिछले साल केंद्र में आए एक मरीज के बारे में बताती हैं. वह मरीज इस केंद्र में आने से पहले एक स्थानीय अस्पताल के पास पार्क में बेंच पर रह रहा था और अपने कैंसर का इलाज करवाने के लिए वहीं से आता जाता था. क्राइस्ट हाउस ने इस आदमी को उसके इलाज के दौरान रहने के लिए जगह दी और अस्पताल आने-जाने में उसकी मदद की.

एनएचसीएचसी के अनुसार, 2012 से चिकित्सा राहत कार्यक्रमों में लगभग एक तिहाई की वृद्धि हुई है. ऐसे अभियानों की तादाद 60 से बढ़कर 80 तक पहुंच चुकी है. फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम व्यापक रूप से अलग होते हैं. लेकिन शोधकर्ताओं के बीच इस बात पर आम सहमति बढ़ रही है कि ऐसे कार्यक्रमों से अस्पतालों और सार्वजनिक खर्चे में काफी बड़ी बचत हो सकती है. फिलहाल इन राहत कार्यक्रमों के सामने फंडिंग की कमी सबसे बड़ी समस्या बन कर खड़ी है. केंद्र सरकार से ऐसे कार्यक्रमों को अब भी पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है.

आरआर/आरपी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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