कौन हैं इस्राएल के किंगमेकर कहलाए जा रहे लीबरमान | दुनिया | DW | 18.09.2019
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दुनिया

कौन हैं इस्राएल के किंगमेकर कहलाए जा रहे लीबरमान

आज बेन्यामिन नेतन्याहू के खिलाफ खड़े दिख रहे अनुभवी इस्राएली नेता अविग्दोर लीबरमान कभी उनके करीबी सहयोगी रह चुके हैं. चुनावी नतीजे अस्पष्ट रहने के बाद नया प्रधानमंत्री वही बनेगा जिसका लीबरमान साथ देंगे.

पांच महीने में दूसरी बार इस्राएल में चुनाव कराने में लीबरमान की अहम भूमिका रही. इस बार के नतीजे भी किसी एक पक्ष के समर्थन में नहीं आए हैं. लिकुद पार्टी के मुखिया नेतन्याहू और ब्लू एंड वाइट के बेनी गांज में से कोई भी बहुमत नहीं पा सका है. ऐसे में 120 सीटों वाली संसद में लीबरमान के समर्थन के बिना किसी की भी सरकार बनना मुश्किल है. इस तरह देखा जाए तो इन चुनावों में बिना खड़े हुए ही जो विजेता बना है वह खुद लीबरमान ही हैं.

नेतन्याहू की कैबिनेट में रक्षा मंत्री रह चुके लीबरमान ने अप्रैल के चुनावी नतीजों के बाद उनके नए गठबंधन का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. उन्होंने बेन्यामिन पर अति-रुढ़िवादी यहूदी पार्टियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और उनसे दूरी बना ली. उनकी एक सीट के कारण ही नेतन्याहू संसद में अपना बहुमत साबित नहीं कर सके. इसके बाद भी नेतन्याहू ने किसी और को अपनी जगह खड़ा कर सरकार बनाने के बजाए संसद को भंग कर दिया और दोबारा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी. इसका बदला देने के लिए नेतन्याहू ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान लीबरमान पर जम कर निशाना साधा.

अब हालात पलट सकते हैं. एक्जिट पोल की मानें तो लीबरमान की यिस्राएल बाइतेनू पार्टी संसद में 8 से 10 सीटें जीत सकती है. उन्होंने अपना चुनाव प्रचार अभियान देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बचाए रखने के नाम पर चलाया और एक सेकुलर गठबंधन सरकार बनाने का वादा किया था. उन्होंने "इस्राएल को फिर से सामान्य बनाने" का नारा दिया है. नतीजे आने के बाद लीबरमान ने पार्टी मुख्यालय पर कहा, "हमारे सामने केवल एक विकल्प है: एक विस्तृत, उदार, राष्ट्रीय सरकार बनाने का, जिसमें यिस्राएल बाइतेनू, लिकुद और ब्लू एंड वाइट सब हों."

69 साल के दक्षिणपंथी विचारधारा वाले नेतन्याहू के लिए इन चुनावों में बहुत कुछ दांव पर लगा है. अप्रैल में हुए चुनाव में भी उनकी पार्टी को पूर्व सेना प्रमुख बेनी गांज के नेतृत्व वाली मध्यमार्गी ब्लू एंड वाइट गठबंधन से कड़ी चुनौती मिली थी. इस्राएल में कुल 64 लाख पंजीकृत मतदाता हैं. पिछले 13 साल से देश के प्रधानमंत्री पद पर बने हुए नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में आने पर संसद में ऐसा प्रस्ताव पास करवा सकते हैं जिससे उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में सजा ना दी जा सके. अपने मतदाताओं को रिझाने के लिए उन्होंने जॉर्डन घाटी को अलग करने का विवादित वादा भी किया था. ऑक्युपाइड वेस्ट बैंक का करीब एक तिहाई हिस्सा जॉर्डन घाटी में पड़ता है. विरोधियों का आरोप है कि नेतन्याहू इस्राएल की सेकुलर आबादी पर यहूदी धार्मिक कानून थोपना चाहते हैं. 

अब सारी निगाहें राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन पर हैं कि वे किसे एक स्थाई सरकार बनाने का न्यौता देते हैं. वे सभी पार्टियों से परामर्श कर रहे हैं. आने वाले दिनों में सबके सुझावों पर विचार करने के बाद राष्ट्रपति फैसला लेंगे. आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी के नेता को न्यौता मिलता है लेकिन यह कोई नियम नहीं है. किसी भी स्थिति में सरकार बनने के लिए लीबरमान का साथ होना जरूरी दिख रहा है. 

आरपी/एनआर (एपी)

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