कोलोन शहर ने घोषित की ′क्लाइमेट इमरजेंसी′, क्या हैं इसके मायने | दुनिया | DW | 11.07.2019
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दुनिया

कोलोन शहर ने घोषित की 'क्लाइमेट इमरजेंसी', क्या हैं इसके मायने

दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले पहले बड़े शहर के रूप में जर्मनी का कोलोन भी क्लाइमेट इमरजेंसी मूवमेंट में शामिल हो गया है. अब तक दुनिया के 700 से भी ज्यादा शहर घोषित कर चुके हैं क्लाइमेट इमरजेंसी.

फ्राइडेज फॉर फ्यूचर समूह के दबाव को मानते हुए जर्मन शहर कोलोन शहर ने भी आखिरकार क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित कर ही दी. समूह के प्रदर्शनों में एक प्लेकार्ड पर नारा लिखा दिखा कि "हम अब किसी के रोके नहीं रुकेंगे. एक दूसरी दुनिया संभव है." जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने के लिए दबाव बना रहा अभियान फ्राइडेज फॉर फ्यूचर अब #वीकफॉरफ्यूचर अभियान चला रहा है. इसके अंतर्गत पूरे एक हफ्ते तक कोलोन में प्रदर्शन जारी हैं. इनका मकसद कोलोन की संसद से क्लाइमेट इमरजेंसी बिल पास कराना है. प्रदर्शनकर्ता शुक्रवार तक दिन-रात कई शिफ्टों में सक्रिय रह कर लगातार कोलोन के पुराने बाजार इलाके में अपनी मौजूदगी सुनिश्चित कर रहे हैं.

16 साल के एक छात्र ने बताया, "मैं अभी-अभी स्कूल से आया हूं." यह छात्र भी नारा लगाना शुरु करता है कि "जलवायु को बचाना कोई अपराध नहीं." वह उन लगभग 50 प्रदर्शनकर्ताओं में शामिल है जो अभियान के दूसरे दिन कोलोन के धरनास्थल पर मौजूद थे. आयोजक बताते हैं कि लगभग इसी तादाद में लोग वहां रात में भी लोग अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं. आखिरी दिन शुक्रवार को सैकड़ों लोगों के शिरकत करने की उम्मीद है.

Deutschland Köln Week for Future Demonstration (DW/J. Stein)

कोलोन संसद में हुआ क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित करने का फैसला.

कोलोन संसद ने मंगलवार को ही सर्वसम्मत से क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित करने के पक्ष में वोटिंग कर दी. सुबह से लेकर देर शाम तक इस मुद्दे पर चली बहस के बाद संसद में मौजूद 85 में से 72 सभासदों ने इसके पक्ष में अपना मत दिया. प्रदर्शनकर्ताओं ने संसद तक मार्च कर इस बात का दबाव बनाया कि कोलोन भी लंदन, पेरिस और जर्मनी के ही डुसेलडॉर्फ जैसे शहरों की तरह जलवायु परिवर्तन पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे आपातकालीन स्थिति को माने. इसकी प्रेरणा स्वीडन की 16 वर्षीया युवा पर्यावरणकार्यकर्ता ग्रेटा थुनबेर्ग है जो 2018 से विश्व को जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने की अपील कर रही है.

कोलोन में प्रदर्शनों का आयोजन करने वालों में शामिल 22 वर्षीया लियोनी बताती हैं, "हम अपनी हड़ताल को अगले चरण में ले जाने के लिए मजबूर हो गए हैं." उसने बताया कि कैसे छह महीने से इसी मुद्दे को लेकर हर शुक्रवार आवाज उठाते रहने के बावजूद कुछ भी नहीं बदला. लियोनी साफ कहती हैं कि इन अभियानों के कारण राजनेता ये समझ जाएंगे कि उन्हें इस बारे में कुछ कदम उठाने हैं और अभी उठाने हैं. नेताओं की ओर से छात्रों से अपील की जा रही है कि वे हड़ताल करना छोड़ कर स्कूल जाएं क्योंकि अब भी स्कूल खुले हुए हैं. कोलोन जर्मनी के राज्य नॉर्थराइन वेस्टफेलिया का हिस्सा है, उसकी सरकार की ओर से सोमवार को ही छात्रों को चेतावनी दे दी गई थी कि या तो वे स्कूल वापस जाएं वरना स्कूल से नागा करने के कारण150 यूरो तक का जुर्माना भरने के लिए तैयार रहें.

कोलोन में प्रदर्शन कर रहे लोगों में युवा छात्रों के अलावा लुइजे येगर जैसी बुजुर्ग महिलाएं भी हैं. "ग्रैनीज फॉर फ्यूचर" अभियान का हिस्सा बनीं येगर की तख्तियों पर लिखा था: "हम इस बात से बहुत गुस्सा हैं कि आप हमारे पोते-पोतियों की बात नहीं सुनते." वे बताती हैं, "अब केवल इतना करने से काम नहीं चलने वाला कि हम अपने लिए एक पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाएं. ऐसा तो हम 70के दशक से ही करते आए हैं. कुछ चीजों को अब संसद के स्तर पर बदलने का वक्त आ चुका है."

जोशुआ श्टाइन/आरपी

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