कोलकाता में भी बेहाल हैं प्रवासी मजदूर | भारत | DW | 28.03.2020
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भारत

कोलकाता में भी बेहाल हैं प्रवासी मजदूर

देश के दूसरे महानगरों की तरह कोलकाता में भी लाखों प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के चलते फंस गए हैं. इनमें से कोई मोटिया मजदूर के तौर पर माल ढुलाई का काम करता था तो कोई रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालता था.

“इस महीने की शुरुआत में जो थोड़े-बहुत पैसे थे उसे गांव भेज दिया. अब हमारे पास एक सप्ताह से ना तो कोई काम है और ना ही कमाई. खाने के भी लाले पड़े हैं. हम अपने गांव भी नहीं जा सकते,” अपनी हालत बयान करते बिहार से 20 साल पहले कोलकाता आए रामाशीष के चेहरे पर निराशा साफ झलकती है.

केंद्र सरकार ने हालांकि राज्य सरकारों से प्रवासी मजदूरों के सामूहिक पलायन पर अंकुश लगाने और ऐसे लोगों की मदद करने को कहा है, लेकिन पेट की आग के आगे भला सरकारी निर्देशों की परवाह कौन करता है. देश के दूसरे शहरों की तरह कोलकाता के सैकड़ों मजदूर भी पैदल या साइकिल से ही बिहार और झारखंड स्थित अपने गांवों के लिए रवाना हो गए हैं. लेकिन अब भी लाखों लोग यहां फंसे लॉकडाउन के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं.

बड़ी तादाद

कोलकाता में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडीशा जैसे पड़ोसी राज्यों के मजदूर बड़ी तादाद में रहते और काम करते हैं. इनमें से कोई एशिया में खाद्यान्नों की सबसे बड़ी मंडी बड़ा बाजार में सिर पर या रिक्शा वैन से सामान ढोने का काम करता है  तो कोई हाथ रिक्शा खींचता है.

कोरोना वायरस के आतंक के बाद लॉकडाउन की वजह से उन सबकी कमाई ठप्प हो गई है. अब यह लोग पैसे-पैसे को मोहताज हो गए हैं. आलम यह है कि इन लोगों को परिवार समेत किसी स्वयंसेवी संस्था या सरकार की ओर से बांटे जाने वाले खाने के पैकेट के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ रही है. वह भी रोज नहीं मिल पाता.

Indien Kalkutta Coronavirus Rikscha (Prabhakar Mani Tiwari)

जरूरतमंदों को राहत सामग्री पहुंचाती बंगाल पुलिस.

बिहार के बेगूसराय जिले से यहां आकर मोटिया मजदूर के तौर पर काम करने वाले मुन्ना बताते हैं, "पहले मैं रोजाना पांच से छह सौ रुपए तक कमा लेता था, लेकिन बीते दो सप्ताह से एक ढेला भी कमाई नहीं हुई है.” कोलकाता के बड़ाबाजार इलाके में हाथ रिक्शा खींचने वाले मंगनी महतो बताते हैं, "दो सप्ताह से कमाई लगभग ठप्प है. लेकिन पेट तो मानता नहीं है. अब तो जमा पूंजी भी लगभग खत्म हो गई है. पता नहीं आगे क्या होगा.” वह कहते हैं कि सरकार ने जल्दी ही कुछ नहीं किया तो ज्यादातर मजदूर भुखमरी के शिकार हो जाएंगे.

ऐसे प्रवासी मजदूर समूहों में एक साथ रहते हैं. यह लोग हर महीने अपने किसी न किसी साथी के हाथ अपने गांव पैसे भेज देते हैं ताकि वहां परिवार की रोजी-रोटी चलती रहे. अब कमाई बंद होने से यहां इनके सामने खाने-पीने का संकट है तो गांव में रहने वाले परिजनों के सामने भी भूख की समस्या गंभीर होती जा रही है.

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, कोलकाता में बाहरी राज्यों के प्रवासी मजदूरों की तादाद 3.90 लाख थी. अब यह तादाद पांच लाख से ऊपर होने का अनुमान है. इनमें से लगभग 50 फीसदी बिहार के हैं और 28 फीसदी उत्तर प्रदेश, झारखंड औऱ ओडीशा जैसे पड़ोसी राज्यों के.

पोस्टा मर्चेंट्स एसोसिएशन के सचिव विश्वनाथ अग्रवाल बताते हैं, "बाजार सीमित समय के लिए खुला है. लेकिन लॉकडाउन के चलते पुलिस के डर से वह लोग अपने घरों से बाहर ही नहीं निकल रहे हैं.”

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "बिहार और उत्तर प्रदेश से प्रवासी मजदूरों के कोलकाता आने का जो सिलसिला 19वीं सदी के मध्य में शुरू हुआ था वह अब भी जस का तस है.” अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार इसकी वजह बताते हैं. वह कहते हैं, "यहां कमाई ज्यादा है और यह शहर दूसरे महानगरों के मुकाबले काफी सस्ता है. ऐसे में मजदूर अधिक से अधिक पैसे बचा कर गांव भेज सकते हैं. इसी आकर्षण की वजह से प्रवासी मजदूरों के लिए सदियों से कोलकाता एक पसंदीदा ठिकाना रहा है.”

कोरोना की वजह से फैले आतंक और लंबे लॉकडाउन के चलते अब ऐसे लाखों लोग आशा और निराशा के भंवर में फंसे हैं. उनको पता नहीं है कि आखिर ऐसी हालत कब तक बनी रहेगी और हालात में सुधार होने तक उनकी सांसें साथ देंगी या नहीं?

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