कोर्ट से सामाजिक न्याय की आस | ब्लॉग | DW | 07.12.2014
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ब्लॉग

कोर्ट से सामाजिक न्याय की आस

सुप्रीम कोर्ट ने कल्याणकारी राज्य के संवैधानिक सपने को साकार करने में सरकार के साथ अपनी पहल भी सुनिश्चित की है. अदालत ने अपनी एक सामाजिक न्याय बेंच गठित कर दो दशक पुराने इतिहास को आगे बढ़ाया है.

भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने यह फैसला दो दशक के न्यायिक अनुभव के आधार पर लिया है. दरअसल इसके पीछे सर्वोच्च अदालत द्वारा ग्रीन बेंच के रुप में गठित पहली विशेष पीठ का सकारात्मक परिणाम मुख्य कारण रहा. अगर इसकी पूष्ठभूमि में जाएं तो पता चलेगा कि 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के दौरान अंधाधुंध औद्योगिक विकास के कारण पैदा हुए पर्यावरण संकट को देखते हुए अदालत ने यह पहल की थी. उसका परिणाम आज सामने है और ग्रीन बेंच आज नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के नाम से पृथक न्यायिक इकाई के रूप में कार्यरत है.

जस्टिस दत्तू ने इस पीठ के गठन के पीछे ग्रीन बेंच की उपलब्धियों को प्रमुख आधार बताया. हालांकि इसके गठन की बात काफी पहले से चल रही थी मगर न्यायपालिका में एक खास वर्ग इस पहल को जनहित याचिका का दूसरा रूप मानते हुए इसके अलग से गठन का हिमायती नहीं था. बेशक यह सही है कि यह बेंच जनहित याचिका का उसी तरह व्यापक रुप है जैसे ग्रीन बेंच आज पृथक इकाई रुप में ग्रीन ट्रिब्यूनल बन गया है. जहां तक सामाजिक न्याय बेंच की जरूरत का मसला है, तो जनहित याचिका के जरिए जनसामान्य के हितों की रक्षा हो रही थी. मगर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के बोझ का असर अब जनहित याचिकाओं के निपटारे पर पड़ने लगा था. ऐसे में 12 दिसंबर से सामाजिक न्याय पीठ के काम शुरू करने के बाद ही इसके असर पर बहस की जा सकती है.

Oberstes Gericht Delhi Indien

सामाजिक न्याय बेंच का महत्व संदेह से परे है

यह हकीकत है कि सामाजिक न्याय से जुड़ी सरकारी योजनाएं अपनी मंजिल से कोसों दूर हैं. ऐसे में चिकित्सा, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित सामाजिक कल्याण से जुड़े लगभग सभी क्षेत्रों में सरकार की योजनाओं पर अदालत अब सीधी नजर रख सकेगी. खास कर चिकित्सा और स्वास्थ्य के मामले में अमीर या गरीब कोई भी अपने हक के लिए सामाजिक न्याय पीठ का दरवाजा खटखटा सकेगा. जस्टिस दत्तू के मुताबिक संविधान की प्रस्तावना की मूल भावना शायद अब साकार हो सकेगी.

दरअसल संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक कल्याण पर विशेष जोर देते हुए मूल अधिकारों के माध्यम से इसे सुनिश्चित करने की बात कही गई है. आजादी के सात दशक बाद भी अगर सरकारों को अन्नश्री योजना चलाना पड़े तो समझा जा सकता है कि कल्याणकारी राज्य की संकल्पना अभी अपने मुकाम से कितनी दूर है. इस लिहाज से सामाजिक न्याय बेंच का महत्व संदेह से परे है खास कर तब जबकि देश में हर छोटा बड़ा काम अदालती आदेशों की मार से ही आगे बढ़ता हो. इसमें जनहित याचिका के दायरे में आने वाले हर मामले के अलावा कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के मामले भी आएंगे. दरअसल भ्रष्टाचार का सर्वाधिक बोलबाला राशन, खाद्यान्न और आंगनबाड़ी जैसी योजनाओं में होता है इसलिए इनसे जुड़े मामले अब लंबे समय तक लंबित नहीं रह पाएंगे. इनके त्वरित निस्तारण से जनता को सीधी राहत मिलना तय है.

कानून अपने मकसद से तब पराजित हो जाता है जब न्याय समय से न मिले. खास कर भारत जैसे कल्याणकारी राज्य के सपने को साकार करने का मकसद रखने वाली व्यवस्था में न्यायिक विलंब आज सबसे बड़ी समस्या बन गई है. ऐसे में कम से कम जनहित के मामलों में जनसामान्य को समय से न्याय सुनिश्चित कराने के लिए सामाजिक न्याय पीठ का गठन मील का पत्थर साबित हो सकता है.

ब्लॉगः निर्मल यादव

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