कोर्ट की निगरानी में जांच की अहमियत | ब्लॉग | DW | 20.08.2019
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ब्लॉग

कोर्ट की निगरानी में जांच की अहमियत

क्या कोर्ट की निगरानी में चलने वाले मामलों के बेहतर नतीजे निकलते हैं? जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के मुताबिक अदालत में जज के लिए उस वक्त फैसला सुनाना किसी यातना से कम नहीं जब उसके सामने साक्ष्य होते ही नहीं या बहुत कमजोर.

पहलू खां मामले का उल्लेख किए बगैर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि साक्ष्यों के अभाव में जज के सामने अभियुक्तों को बरी करने के सिवाय क्या रास्ता बचता है. उन्होंने अदालती समस्याओं का जिक्र करते हुए अभिव्यक्ति की आजादी के दुरुपयोग और असहिष्णुता पर भी चिंता जताई. मुंबई में "इमेजिनिंग फ्रीडम थ्रू आर्ट” के तहत अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा कि अलग सोच, अलग खानपान, अलग वेशभूषा और अलग यकीन रखने वालों पर नफरत और हिंसा का जहर उड़ेला जाता है.

पहलू खां हत्याकांड पर किरकिरी के बीच राजस्थान सरकार ने विशेष जांच दल का गठन कर मामले की दोबारा जांच कराने को कहा है. ऐसी ही स्थितियों से निपटने के लिए जस्टिस चंद्रचूड़ की राय में अदालतों की निगरानी का महत्त्व है. इस बारे में उन्होंने कठुआ कांड का उदाहरण दिया. वैसे उन्नाव कांड में सीधी निगरानी तो नहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद जांच में तत्परता आई दिखती है.

सितंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस ए कबीर और जस्टिस सी जोसेफ की बेंच ने कहा था कि अगर रसूख वाले लोग इंसाफ की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते पाए जाते हैं तो ऐसी सूरत में उच्च अदालतें आपराधिक मामलों में जांच कार्य की प्रगति की निगरानी कर सकती हैं. बेंच ने ये फैसला उस दलील को खारिज करते हुए सुनाया था जिसमें अभियोजन पक्ष की ओर से कहा गया था कि जांच को मॉनीटर करने की अदालतों के पास कोई शक्ति नहीं हैं क्योंकि ऐसा करने का अर्थ जांच एजेसिंयों की भूमिका में हस्तक्षेप करने जैसा होगा.

Indien Foto von Viehhändler Pehlu Khan (Reuters/C. McNaughton)

साक्ष्यों के अभाव में पहलू खान की हत्या के आरोपियों को बरी कर दिया गया.

गुजरात हाईकोर्ट के निगरानी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत शीर्ष अदालतों को ये अधिकार है कि शिकायत मिलने पर, नागरिकों के अधिकारों की भलीभांति हिफाजत के संवैधानिक दायित्व को ध्यान में रखते हुए, वे अधिकारियों को अपनी ड्यूटी के सही और वैधानिक अनुपालन के लिए कह सकती हैं या अपनी निगरानी में जांच करने को कह सकती हैं.

 हालांकि आदर्श स्थिति तो ये होनी चाहिए कि कम से कम जांच कार्य में अदालतों का दखल न्यूनतम हों और किसी भी मामले की जांच पुलिस हो या सीबीआई या कोई अन्य जांच एजेंसी पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से करती रहे. लेकिन कई मामलों में जांच एजेसियों पर राजनीतिक दबाव देखा गया है. पुलिस पर गाहेबगाहे जांच में ढिलाई करने या सबूत न जुटाने या उन्हें नष्ट करने के आरोप भी लगते ही रहे हैं. ऐसे में जाहिर है अदालतों पर दबाव बढ़ता है और उन्हें आपराधिक मामलों की जांच प्रक्रिया की निगरानी के भी आदेश देने पड़ते हैं. पहलू खां हत्याकांड की जांच में अगर कथित ढिलाई या कमी अदालत में साबित की जाती या अदालत को आश्वस्त किया जाता तो शायद पहलू खां के परिजनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की स्तब्धता कुछ कम हो पाती.

अदालतों के सामने एक और विकट प्रश्न है लंबित मामलों का. देश की अदालतों का बोझ किसी से छिपा नहीं है. जजों की संख्या में कमी भी एक बड़ी समस्या है. मामलों के ढेर लगे रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट के जजों पर कितना वर्कलोड है इसका अंदाजा जस्टिस चंद्रचूड़ के ही एक जिक्र से हो जाता है जिसका हवाला उन्होंने मुंबई व्याख्यान के दौरान सवाल जवाब के सत्र में दिया. इस बारे में प्रकाशित खबर के मुताबिक सोमवार से शुक्रवार के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज कमोबेश 150 मामले देखते हैं. मंगलवार, बुधवार और बृहस्पतिवार को हर रोज 30 मामले जुड़ जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट का एक जज हर सप्ताह औसतन 250 मामले देखता है. इसके अलावा आदेशों का निरीक्षण, संपादन और डिक्टेशन भी है.

नेशनल ज्युडिशियल डाटा ग्रिड के मुताबिक देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिनमें से दो करोड़ 20 लाख से ज्यादा तो आपराधिक मामले ही हैं. देश के हाईकोर्टों में 43 लाख से ज्यादा मामले और सुप्रीम कोर्ट में करीब 58 हजार मामले लंबित बताए जाते हैं. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल दिसंबर तक हाईकोर्ट के जजों के लिए स्वीकृत पदों की संख्या 1079 रखी गई थी लेकिन अभी भी 37 प्रतिशत पद खाली बताए जाते हैं. निचली अदालतों में भी न्यायिक अधिकारियों के 22833 पद स्वीकृत हैं लेकिन भरे गए हैं सिर्फ 15115.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पिछले दिनों बताया था कि देश भर में एक हजार मामले ऐसे हैं जो 50 साल से लंबित हैं और दो लाख से अधिक मामले 25 साल से लटके हुए हैं. अदालतों में अटके मामले निपटेंगे तो जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की भारी संख्या में कटौती आएगी और निर्दोषों को समय रहते न्याय मिल पाने की उम्मीद बनेगी. और अदालतें भी मॉब लिंचिंग, हिंसा, हत्या या बलात्कार जैसे जघन्य और संवेदनशील आपराधिक मामलों में अपने विवेक से ये तय करें कि जांच कार्य उनकी निगरानी में होना चाहिए या नहीं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस दिशा में एक प्रासंगिक और सार्थक बहस तो छेड़ ही दी है.

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