कोरोना संकट के बीच सुंदरबन में जर्मनी ने दी मदद | भारत | DW | 29.04.2020
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भारत

कोरोना संकट के बीच सुंदरबन में जर्मनी ने दी मदद

भारत का सुंदरबन कोरोना संक्रमण से तो बचा हुआ है लेकिन लॉकडाउन के चलते यहां रहने वाले मुश्किलों से गुजर रहे हैं. यहां छोटे छोटे द्वीप हैं जो एक दूसरे से कट कर गुजारा नहीं कर सकते.

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24-परगना जिले में बांग्लादेश की सीमा से लगा सुंदरबन रायल बंगाल टाइगर और अपनी जैविक विविधता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. दुनिया का सबसे बडा मैंग्रोव जंगल भी यहीं है. इन विविधताओं की वजह से इसका नाम यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में भी शामिल है. अब देश भर में फैलते कोरोना संक्रमण के दौरान अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से यह इलाका तो सुरक्षित है. लेकिन मछली पकड़ने और शहद जमा करने के लिए जंगल में प्रवेश पर लगी रोक ने इलाके के लोगों को दो जून की रोटी के लिए मोहताज कर दिया है. इलाके के दो द्वीपों - घोड़ामार व मौसूनी ने तो खुद को मुख्य भूमि से काट लिया है. इलाके के लगभग 15 हजार परिवारों को भोजन मुहैया कराने के लिए कोलकाता स्थित जर्मन कौंसुलेट ने एक गैर-सरकारी संगठन मुक्ति के जरिए लगभग 28 लाख रुपये की मदद देने का फैसला किया है.

सुंदरबन की भौगोलिक स्थित एक ओर जहां कोरोना संक्रमण के इस दौरा में स्थानीय लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है, वहीं इसकी वजह से जारी लॉकडाउन और पाबंदियां उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं हैं. कुल 4,262 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले सुंदरबन इलाके में कुल 102 द्वीप हैं. उनमें से 54 द्वीपों पर आबादी है. मछली मारना, जंगल से शहद एकत्र कर बाजारों में बेचना और खेती करना ही लोगों की आजीविका के प्रमुख साधन हैं. लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान वन विभाग ने जंगल में लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है.

इसके अलावा अब इलाके में पहले के मुकाबले ज्यादा बाघ जंगल से बाहर निकलने लगे हैं. ऐसे में खतरा दो-तरफा है. लॉकडाउन के दौरान चोरी-छिपे जंगल में जाने वाले दो लोग बाघों का निवाला बन चुके हैं. सुंदरबन इलाके में होने वाली सब्जियां लॉकडाउन से पहले तक रोजाना लोकल ट्रेनों के जरिए कोलकाता के बाजारों में पहुंचती थीं. अब आलम यह है कि सब्जियां तो भरपूर हो रही हैं. लेकिन लॉकडाउन के चलते यह बाहर नहीं जा रही हैं. नतीजतन लोग खुदरा बाजारों में लागत से बहुत कम में इसे बेचने पर मजबूर हैं. खपत और मांग कम होने की वजह से ज्यादातर सब्जियां घरों में सड़ रही हैं.

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पाथर प्रतिमा की गीता नस्कर कहती हैं, "घर में रखी सब्जियां सड़ रही हैं. आखिर हम उनको थोक बाजारो में कैसे ले जाएं? यहां तो नाव के सहारे पहले मुख्य भूमि तक जाना होता है. लेकिन कोरोना के डर से नाव की सेवाएं भी बंद हैं. हमारे पास खाने के नाम पर थोड़ा-बहुत सामान है. लेकिन नकदी एकदम खत्म हो गई है.” एक अन्य किसान रघुनाथ बैरागी कहते हैं, "मेरे घर में दो सौ किलो भिंडी सड़ रही है. थोक बाजार बंद हैं और साथ ही हमारी कमाई भी.”

हर साल अप्रैल से जून के बीच सुंदरबन टाइगर रिजर्व के भीतर जाकर शहद एकत्र करने के लिए वन विभाग सैकड़ों लोगों को परमिट जारी करता था. इनके अलावा सैकड़ों लोग बिना परमिट के भी जाते थे. लेकिन बीते 17 मार्च से ही परमिट बंद कर देने और जंगल में गश्त बढ़ाने की वजह से लोग भीतर नहीं जा पा रहे हैं. सुंदरबन टाइगर रिजर्व के निदेशक सुधीर दास कहते हैं, "लॉकडाउन के दौरान सारी गतिविधियां ठप हो जाने की वजह से इलाके में लगभग रोजाना बाघ नजर आने लगे हैं. पहले बहुत मुश्किल से बाघ नजर आते थे.”

देश के तमाम हिस्सों में कोरोना का संक्रमण लगातार फैलने के बावजूद सुंदरबन इलाका अब तक इससे अछूता है. विशेषज्ञों का कहना है कि भौगोलिक स्थिति यानी मुख्य भूमि से कटे होने की वजह से ही अब तक संक्रमण इन द्वीपों तक नहीं पहुंचा है. लेकिन यही भौगोलिक स्थिति अब स्थानीय लोगों के लिए अभिशाप भी साबित हो रही है. इलाके में मुख्य भूमि पर स्थित काकद्वीप में कोरोना संक्रमण का पता चलने के बाद दो द्वीपों - घोड़ामार व मौसूनी के लोगों ने जिले के बाकी हिस्सों से खुद को काट लिया है. जलवायु परिवर्तन की वजह से बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ने की वजह धीरे-धीरे पानी में समाने वाला घोड़ामारा द्वीप देश-दुनिया में अक्सर सुर्खियां बटोरता रहा है. घोड़ामारा के पंचायत प्रधान संजीव सागर बताते हैं, "हमने जान बचाने के लिए मुख्य भूमि तक नौका सेवाएं बंद कर दी हैं.”

घोड़ामारा से कुछ दूर स्थित मौसूनी द्वीप पर तो आलम यह है कि पार्वती मंडल नामक एक महिला ने जब बीते सप्ताह काकद्वीप में एक अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया था, तो उसके बाद स्थानीय लोगों ने उसकी वापसी पर पाबंदी लगा दी है. इन द्वीपों पर धान और सब्जियों की खेती होती है. लेकिन बाकी जरूरी सामानों और दवाओं के लिए लोगों को मुख्य भूमि तक जाना पड़ता है. संजीव कहते हैं, "हमें दिक्कत तो हो रही है. लेकिन फिलहाल कोरोना संक्रमण को रोकना ही हमारा मुख्य लक्ष्य है.”

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इलाके के लोगों को होने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए कोलकाता स्थिति जर्मन कौंसुलेट ने एक गैर-सरकारी संगठन मुक्ति के जरिए लोगों के भोजन के लिए 28 लाख रुपये की सहायता देने का फैसला किया है. जर्मन डिप्टी कौंसुल जनरल युर्गेन थोमास श्रोड कहते हैं, "फिलहाल संकट के मौजूदा दौर में सबसे संवेदनशील इलाके के लोगों तक भोजन जैसी मौलिक सहायता पहुंचाना जरूरी है. हमारे विदेश मंत्रालय ने इसके लिए 30 लाख रुपये मंजूर किए हैं. इससे हम सुंदरबन इलाके के हजारों लोगों तक खाना पहुंचा सकते हैं. हमने गैर-सरकारी संगठन मुक्ति को सामान खरीदने के लिए कह दिया है.” वह बताते हैं कि तमाम औपचारिकताएं पूरी हो गई हैं और यह पैसा जल्दी ही मुक्ति को मिल जाएगा.

वैसे, जर्मन कौंसुलेट ने इस महीने की शुरुआत में भी भूखे लोगों को भोजन और स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराने के लिए कोलकाता के दो संगठनों के साथ हाथ मिलाया था. सुदंरबन इलाके में लगभग सात हजार परिवारों के हितों की रक्षा की दिशा में काम करने वाले संगठन मुक्ति के संस्थापक शंकर हालदार कहते हैं, "जर्मनी से मिलने वाली रकम किसी दैवीय सहायता से कम नहीं है. हम इससे कम से कम ढाई हजार परिवारों को पंद्रह दिनों के लिए राशन की सप्लाई कर सकते हैं.”

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