कोरोना के कारण मौत की दर सब देश में अलग क्यों | विज्ञान | DW | 28.03.2020
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विज्ञान

कोरोना के कारण मौत की दर सब देश में अलग क्यों

हममें से कई लोग कोरोना वायरस से हर दिन संक्रमण और मौत की दर पर नजर रख रहे हैं. आपलोगों ने देखा होगा कि हर देश में मौत की दर अलग है. इसके कुछ कारणों को हमने समझने की कोशिश की है.

जर्मनी में कोरोना वायरस से कारण संक्रमित लोगों की मौत की दर तुलनात्मक रूप से कम है. यह दर इटली के मुकाबले तो बहुत कम है जहां बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है. फिलहाल आंकड़े बता रहे हैं कि जर्मनी में संक्रमित लोगों के मौत की दर 0.4 है और इटली में इससे करीब 20 गुना ज्यादा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस फर्क के पीछे बहुत सारे कारण हैं. इनमें पहला कारण है पॉपुलेशन पिरामिड या देश की आबादी में लिंग और उम्र का विभाजन. इसके बाद हर देश की मेडिकल या स्वास्थ्य सेवा की क्षमता भी अलग है. इसके बाद सबसे आखिर लेकिन अहम कारण है कोरोना वायरस से संक्रमित कितने लोगों की जांच हुई. आखिरी कारण इस वजह से ज्यादा अहम है क्योंकि इसी के आधार पर आंकड़ों की सत्यता प्रमाणित होती है.

कुछ देशों में मारे गए लोगों की अतिरिक्त जांच की गई और आंकड़ों पर उनसे मिली जानकारियों का भी असर हो सकता है.

किन लोगों का परीक्षण हुआ?

अर्थशास्त्री आंद्रेयास बाकहाउस ने ट्वीट कर बताया है कि इटली में कोरोना वायरस से पीड़ितों की औसत आयु 62 साल है जबकि जर्मनी में 45 साल(इस रिपोर्ट को लिखते समय). इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि इटली के जिन युवाओं में हल्के फुल्के लक्षण दिखने के बाद कोरोना का परीक्षण किया गया उनकी संख्या जर्मनी के मुकाबले कम है.

Infografik Coronavirus: Deaths per one million population EN

जाहिर है कि जब परीक्षण कम हुआ तो संक्रमित लोगों की सूची से वो लोग पहले ही बाहर हो गए जिनका परीक्षण नहीं हुआ. ऐसे में मौत की दर पर भी इसका असर पड़ा क्योंकि केवल गंभीर रूप से संक्रमित लोगों को ही पीड़ितों में शामिल किया गया. इटली के राष्ट्रीय अखबार कोरियेर डेला सेरा का कहना है कि देश में ऐसे मामलों की संख्या बहुत ज्यादा हो सकती है जिनके बारे में रिपोर्ट नहीं दी गई. इसमें वो लोग भी शामिल है जो संक्रमित हुए और वो भी जिनकी संक्रमण के बाद मौत हुई.

दक्षिण कोरिया में स्थिति बिल्कुल उल्टी है. यहां प्रशासन ने दूसरे देशों की तुलना में बहुत ज्यादा लोगों का परीक्षण किया है. दक्षिण कोरिया में कोरोना के कारण मौत की दर भी बेहद कम है.

पॉपुलेशन पिरामिड

आबादी की औसत आयु भी इसमें भूमिका निभा सकती है. बुजुर्ग लोगों में उनकी पहले से मौजूद बीमारियों के कारण कोरोना वायरस की चपेट में आने का खतरा ज्यादा है. ऐसी स्थिति में वायरस के लिए उनके इम्यून सिस्टम से लड़ना निश्चित रूप से ज्यादा आसान है. आमतौर पर युवा ज्यादा स्वस्थ रहते हैं और जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है हमारा इम्यून सिस्टम भी कमजोर पड़ता जाता है और हमारे लिए संक्रामक रोगों की चपेट में आना आसान होता जाता है.

हालांकि सिर्फ इतने भर से ही जर्मनी और इटली के फर्क को नहीं समझा जा सकता. इसकी वजह यह है कि दोनों देशों का पॉपुलेशन पिरामिड लगभग एक जैसा है. 2018 में जर्मनी की मध्यम आयु (सबसे बुजुर्ग और सबसे युवा आबादी की औसत उम्र) 46 साल जबकि इटली की 46.3 साल थी. इस कारण का ज्यादा असर उप सहारा अफ्रीका के देशों में ज्यादा नजर आएगा जहां मध्यम आयु कम है. चाड में मध्यम आयु 16 साल है, यहां यह कारण ज्यादा बड़ी भूमिका निभाएगा.

वीडियो देखें 03:49

सांस का सेहत से संबंध

महामारी का समय

मौत की दर में फर्क को महामारी के समय से भी समझा जा सकता है. जिन देशों में इस महामारी का ज्यादा असर दिखा जैसे कि इटली और स्पेन में, वहां यह जर्मनी से पहले पहुंचा था. वायरस के संक्रमण की शुरूआत से लेकर गंभीर मरीजों की मौत की स्थिति तक पहुंचने में समय लगता है. जिन मामलों की पुष्टि हो चुकी है उनमें मौत की दर महामारी के आखिरी समय में तेज हो सकती है.

कई वैज्ञानिकों का कहना है कि जर्मनी में अभी महामारी अपने गंभीर चरण में नहीं पहुंची है. ऐसी स्थिति आने के बाद हम मौत की दर को बढ़ते देख सकते हैं.

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति

सबसे अहम सवाल यह है कि देश की स्वास्थ्य सेवाएं कोरोना वायरस जैसी किसी महामारी का सामना करने के लिए कितनी तैयार हैं. इसके साथ ही यह भी कि क्या वो संक्रमण की गति को रोकने में सक्षम हैं. गति रोकने का मतलब है कि कि क्या संक्रमण और मृत्यु दर को पूरी आबादी में रोग के फैलने के बाद भी स्थिर रखा जा सकता है.

यह संभव है, उदाहरण के लिए कोरोना वायरस के गंभीर मरीजों को सांस देने वाली या वेंटीलेटर मशीनों के सहारे मरने से रोका जा सकता है. ऐसे में जरूरी यह है कि पर्याप्त संख्या में ऐसे अस्पताल, बेड और मशीनें मौजूद हों. अगर बहुत कम इंटेंसिव केयर बेड और वेंटीलेटर होंगे तो जिन मरीजों को इनकी सुविधा नहीं मिलेगी उनके मरने का खतरा ज्यादा होगा.

सिर्फ इसी मामले में जर्मनी और इटली के बीच बड़ा फर्क है. इटली में 6 करोड़ की आबादी है. महामारी जब शुरू हुई तो वहां इंटेंसिव केयर के 5000 बेड मौजूद थे. जर्मनी में 8 करोड़ की आबादी है और यहां 28,000 इंटेंसिव केयर बेड हैं. कहा यह भी जा रहा है कि जर्मनी बहुत जल्द अपने इंटेंसिव केयर बेड की संख्या दोगुनी कर लेगा.

इंटेंसिव केयर बेड

दुनिया भर में इंटेंसिव केयर बेड की मौजूदगी की कहानी अलग है. जर्मनी में प्रति 1 लाख लोगों पर 29 बेड हैं जबकि अमेरिका में 34. इसी तरह इटली में केवल 12 और स्पेन में प्रति एक लाख लोगों पर केवल 10 इंटेंसिव केयर बेड हैं. यहां यह ध्यान देना भी जरूरी है कि दक्षिण कोरिया ने बड़े पैमाने पर टेस्ट और मरीजों को अलग थलग रखने की व्यवस्था के जरिए कोविड 19 को फैलने से रोका है. दक्षिण कोरिया में 1 लाख लोगों पर इंटेंसिव केयर के महज 10.6 बेड ही मौजूद हैं.

दक्षिण कोरिया ने लोगों को क्वारंटीन करने के लिए सख्त नियम बनाए और शुरूआत से ही संक्रमण की गति को एक समान बनाए रखा. इस देश में महज 10 हजार लोग संक्रमित हुए हैं. इटली में यहां से 8 गुना, जर्मनी में 5 गुना और स्पेन में छह गुना और अमेरिका में 10 गुना ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं. जब तक यह महामारी चल रही है तब तक अलग अलग देशों में इसके संक्रमण और मौत की दरों के बारे में अंतर दिखता रहेगा. एक बार जब सबकुछ थम जाएगा तब शायद ज्यादा भरोसेमंद आंकड़े सामने आ सकेंगे. 

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