कैसे मिले भारत की हर निर्भया को न्याय | दुनिया | DW | 16.12.2014
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दुनिया

कैसे मिले भारत की हर निर्भया को न्याय

दो साल पहले हिंसा और बेरहमी की सीमाएं पार कर देने वाले दिल्ली के निर्भया कांड का मुद्दा भारत ही नहीं दुनिया भर में छाया रहा. मगर अब तक निर्भया के गुनहगारों को भी उनके किए की सख्त सजा नहीं दी जा सकी है.

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली की सड़कें चलती बस में निर्भया के साथ हुई क्रूरता की गवाह बनीं. चलती बस में गैंगरेप की शिकार हुई 23 साल की उस लड़की ने कुछ दिनों बाद दम तोड़ दिया. आज इस घटना की दूसरी वर्षगांठ पर भारत में जगह जगह कई कार्यक्रम हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी सरगर्मियां हैं...

एक ओर तो निर्भया कांड और ऐसे कई अपराधों को अंजाम देने वालों को अभी भी सजा मिलना बाकी है. दूसरी ओर, कुछ लोग आम जनता को जागरुक कर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में काम कर रहे हैं. जागरुकता बढ़ाने की ऐसी ही एक कोशिश कर रहा है दिल्ली के 10 लोगों का समूह. 23 से 30 साल की उम्र के ये युवा गुरिल्ला थिएटर की तर्ज पर दिल्ली की बसों में घुसकर एक 5 से 10 मिनट लंबा नाटक करते हैं.

5 दिसंबर 2014 को दिल्ली में ही हुए एक और बलात्कार कांड की भी खूब चर्चा हुई. मगर निर्भया कांड के मुकाबले इस बार प्रतिक्रियाएं काफी दबी हुई रहीं. आरोपी टैक्सी चालक की कंपनी ऊबर जरूर फंसती नजर आई और उसके कामकाज पर कई शहरों में रोक लगा दी गई.

ऊबर कांड के आरोपी ड्राइवर को 24 दिसंबर तक पुलिस की हिरासत में रखा जाएगा. लेकिन तुलना फिर निर्भया कांड से हुई और सवाल उठे कि क्या टैक्सी सेवा पर बैन लगाने से कोई फर्क पड़ेगा.

नवंबर में हुई सुनवाई में उच्च न्यायालय ने निर्भया कांड की "फाइलें एमएचए और पुलिस के बीच आनेजाने" की लंबी प्रक्रिया पर असंतोष जताया और इस मामले को और गंभीरता से लेने का आदेश दिया.

निर्भया कांड के बाद वादा किया गया कि ऐसी घटना फिर ना हो इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे. इसके लिए निर्भया फंड के गठन, महिला सुरक्षा के लिए निगरानी बढ़ाने, निर्भया कांड के आरोपियों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने और जेंडर सेंसिटाइजेशन बढ़ाने के तमाम प्रयास करने के वादे हुए.

दो साल बाद भी अभी तक निर्भया फंड की 2,000 करोड़ की राशि का कोई इस्तेमाल नहीं किया जा सका है. निर्भया के दो दोषियों को फांसी की सजा देने पर 15 मार्च 2014 से स्टे लगा है. बाकी दो आरोपियों को सजा देने पर भी 14 जुलाई 2014 को आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्टे है.

आए दिन सामने आते बलात्कार और दूसरे क्रूर अपराधों के मामलों में कोई कमी नहीं आई है. प्रशासन देश के भीतर महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल दे पाने में अक्षम रहा है. ऊपर से महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महिलाएं भी अक्सर अपने गैर जिम्मेदाराना बयानों से देश की कई निर्भयाओं को न्याय मिलने की उम्मीद को झुठलाती सी लगती हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का वह बयान याद करें जब उन्होंने रेप के लिए महिलाओं और पुरुषों के बीच बढ़े मेलजोल को ही जिम्मेदार ठहरा दिया था.

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