कैसे मिटेगा भारत का डिजिटल विभाजन | दुनिया | DW | 05.05.2017
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दुनिया

कैसे मिटेगा भारत का डिजिटल विभाजन

स्टीम इंजन, एसेंबली लाइन और ऑटोमैटिक मशीनों के बाद इंडस्ट्री 4.0 का जमाना आ रहा है. उद्योग और काम का स्वरूप बदल रहा है और इसका असर महिलाओं पर भी हो रहा है. कितनी तैयार हैं भारत की महिलाएं इस बदलाव के लिए.

मोबाइल के जरिये सुरक्षा से लेकर पेमेंट तक के काम हो रहे हैं लेकिन भारत में जरूरत बन चुके मोबाइल सुविधा पर पुरुषों का एकाधिकार है. देश की आधे से अधिक महिलाओं के पास मोबाइल नहीं है. इंटरनेट या मोबाइल का उपयोग करने के मामले में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. देश में मोबाइल धारकों की संख्या एक अरब को पार कर गयी है, लेकिन मोबाइल क्रांति में महिलाएं पुरुषों से काफी पीछे हैं. इंटरनेट प्रयोग करने के मामले में तो स्थिति और भी खराब है.

डिजिटल दुनिया में महिलाएं

नोटबंदी के बाद सरकार डिजिटल प्रणाली से भुगतान को बढ़ावा देने में लगी हुई है और लोगों को डिजिटल वर्ल्ड से जोड़ने के तमाम प्रयास किये जा रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ी समस्या महिलाओं को आ रही है जो इस ताम झाम से अब तक दूर ही थीं. डिजिटल साक्षरता को दिए जा रहे प्रोत्साहन के बावजूद महिलाओं की एक बड़ी आबादी साक्षर नहीं हो पायी है.

ग्लोबल मोबाइल फोन इंडस्ट्री मॉनीटर जीएसएम एसोशिएशन के मुताबिक भारत में 2015 में लगभग साढ़े 11 करोड़ महिलाओं के पास खुद का मोबाइल फोन था. रिपोर्ट के अनुसार करीब 81% महिलाओं ने कभी फोन पर इंटरनेट का उपयोग नहीं किया है. जीएसएमए की रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल फोन की सर्वव्यापकता और कम कीमत के बावजूद मोबाइल फोन के स्वामित्व और मोबाइल सेवा उपभोक्ता के रूप में महिलाएं पीछे छूट गई हैं.

आज के दौर में सोशल साइट्स पर उपस्थिति का अपना क्रेज है. खासतौर पर युवाओं में सोशल मीडिया का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है, हालांकि इस प्लेटफार्म पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत ही कम है. इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया IAMAI के अनुसार इंटरनेट उपयोग करने वालों में महिलाओं की भागीदारी 35 प्रतिशत के आसपास ही है.

जीएसएम एसोशिएशन ने 2016 की अपनी रिपोर्ट में 38 प्रतिशत महिला भागीदारी का आंकड़ा दिया था. फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर सक्रिय महिलाओं की संख्या भी पुरुषों के मुकाबले काफी कम है. वी आर सोशल की रिपोर्ट ‘डिजिटल इन अपक 2016' के अनुसार भारत में फेसबुक उपयोग करने के मामले में महिलाएं, पुरुषों से काफी पीछे हैं. कुल फेसबुक यूजर्स में 76 प्रतिशत पुरुष हैं जबकि महिलाओं की संख्या केवल 24 फीसदी ही है.

लोगों की मानसिकता

महिलाओं के इंटरनेट या मोबाइल से जुड़ने में कई बाधाएं हैं. पारिवारिक दबाव और जानकारी या स्वयं महिलाओं की रूचि ना होना इसकी बड़ी वजह रही है. IMRB  द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार ऑनलाइन आने में महिलाओं के सामने तीन महत्वपूर्ण बाधाएं हैं- पहुंच, ज्ञान और जागरूकता. ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के पास घर का कामकाज इतना ज्यादा होता है कि इंटरनेट के लिए समय ही नहीं बचता. दूसरा, उनके पास खुद का मोबाइल भी नहीं होता है.

अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई में शोधार्थी अम्बरीश राय कहते हैं कि महिलाओं को इंटरनेट से दूर रखने में समाज की भी भूमिका है. उनका कहना है कि मोबाइल के प्रयोग से बिगड़ने का खतरा जान बहुत से माता पिता अपनी बेटियों को मोबाइल नहीं देते.

शहरी महिलाएं डिजिटल वर्ल्ड से बेखबर नहीं हैं. वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में तकनीक से जुड़ी हैं. लेकिन ग्रामीण इलाकों में ऐसी स्थिति नहीं है. यही वजह है कि सरकार ने ग्रामीण महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का चेहरा खासतौर पर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में तकनीक का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को बनाया है. देश के 55,000 गांवों में मोबाइल संपर्क की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए 20,000 करोड़ के यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (यूएसओएफ) का गठन किया गया है.

सरकारी प्रयास

डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा जब तक इसमें आधी आबादी शामिल ही नहीं होती. इस बड़े लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार, मोबाइल फोन स्वामित्व और उपयोग में लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए प्रयास कर रही है. समाज की मानसिकता बदलने के प्रयास किये जा रहे हैं. महिलाओं को सशक्त बनाने और नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के मकसद से मध्य प्रदेश सरकार "मुख्यमंत्री कन्यादान योजना" के तहत शादी करने वाली प्रत्येक नव विवाहिता को स्मार्ट फोन खरीदने के लिए 3,000 रुपये अलग से देने की योजना बना रही है.

राजनेताओं से लेकर धार्मिक गुरु तक सभी जब तब लड़कियों को मोबाइल देने के खिलाफ बयान देते रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद मोबाइल-इंटरनेट अब एक जरूरत बनती जा रही है और बहुत समय तक इससे दूर नहीं रहा जा सकता है. समाजशास्त्री डॉ. साहेब लाल कहते हैं, "पुरुष प्रधान समाज की वजह से महिलाएं डिजिटल वर्ल्ड का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं, लेकिन सरकारी प्रयासों और वक्त की जरूरत का असर जल्द ही उन्हें डिजिटल साक्षर बना देगा." बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का अनुमान है कि 2020 तक भारत में कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 40 फीसदी महिलाएं होंगी.

(कहां हैं औरतें बराबर)

 

 

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