कैसे अमेरिका का वीजा बैन भारतीय परिवारों को अलग-थलग कर रहा है | भारत | DW | 16.07.2020

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भारत

कैसे अमेरिका का वीजा बैन भारतीय परिवारों को अलग-थलग कर रहा है

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा अधिकतर अप्रवासी लोगों के वीजा को फ्रीज कर देने की वजह से सैकड़ों परिवारों का भविष्य अनिश्चितताओं से घिर गया है. 174 भारतीय नागरिकों ने आदेश के खिलाफ अमेरिका में मुकदमा कर दिया है.

बेंगलुरु में परवेज शेख का 18 महीने का बेटा हर रोज रात को अपनी मां को पुकारते हुए रोते रोते जाग जाता है. उसकी मां अमेरिका में हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा अधिकतर अप्रवासी लोगों के वीजा को फ्रीज कर देने की वजह से परवेज और उनका बेटा अमेरिका जा नहीं पा रहे हैं. यह उन सैकड़ों परिवारों में से एक की कहानी है जिनका भविष्य ट्रंप प्रशासन के आदेश की वजह से अनिश्चितताओं से घिर गया है.

33-वर्षीय परवेज एक मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और उनकी पत्नी हार्डवेयर इंजीनियर हैं. दोनों पिछले सात सालों से अमेरिका में रह रहे थे. मार्च में परवेज अपने दो बच्चों के साथ अपने रिश्तेदारों से मिलने बेंगलुरु आए थे. उसके बाद कोरोना वायरस महामारी फैलने की वजह से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद हो गईं और वे यहीं फंस गए. लेकिन उन्होंने इस बात की कभी कल्पना नहीं की थी उन्हें पूरी तरह से अमेरिका वापस लौटने से ही रोक दिया जाएगा.

ट्रंप प्रशासन ने पिछले महीने एच-1बी और एल श्रेणी के रोजगार वीजा के लिए नए आवेदनों पर साल के अंत तक प्रतिबंध लगा दिया. प्रशासन ने उन पर भी प्रतिबंध लगा दिया जिनके पास वीजा है लेकिन वे अमेरिका से बाहर हैं और उन्हें वीजा बढ़वाना है. ऐसा करने से वे अमेरिका में अपने करीबी लोगों और अपनी जिंदगी से प्रभावी रूप से कट गए हैं.

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भारत में पैदा हुए माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला से लेकर गूगल के सीईओ सुंदर पिच्चई तक, सिलिकॉन वैली लंबे समय से अपनी बढ़ोतरी के लिए विदेशी प्रतिभा पर निर्भर रही है.

"क्या किसी ने हमारा घर चुरा लिया है?"

परवेज शेख ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "मेरे बच्चे मुझसे पूछते हैं कि क्या किसी ने हमारा घर चुरा लिया है? कभी कभी वे अपना पसंदीदा खिलौना या अपनी पसंदीदा किताब ढूंढना शुरू कर देते हैं. और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता. हमारे बच्चे पैदा ही अमेरिका में हुए थे और वे अमेरिका के अलावा दूसरा कोई घर नहीं जानते." उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा लग रहा है कि सदमे की वजह से उनके बच्चों के विकास पर असर पड़ा है, जिससे परिवार का तनाव बढ़ गया है.

कोरोना वायरस की वजह से अमेरिका के दूतावास लंबे समय से बंद हैं और इस वजह से शेख जैसे कई अप्रवासियों को अपने वीजा बढ़वा कर पासपोर्ट पर मुहर लगवाने के लिए आवश्यक अपॉइंटमेंट को टाल देने पर मजबूर होना पड़ा है. इस से एक लंबा बैकलॉग भी बन गया है. ट्रंप के निर्णय ने उनकी जिंदगियों को उलट-पलट कर रख दिया है. इसमें विशेष रूप से भारतीय प्रभावित हुए हैं क्योंकि एच-1बी आवेदकों में 75 प्रतिशत भारतीय ही हैं. 

इसी वजह से अब 174 भारतीय नागरिकों के एक समूह ने ट्रंप प्रशासन के इस आदेश के खिलाफ अमेरिका के कोलंबिया की जिला अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है. जज ने बुधवार 15 जुलाई को अमेरिकी सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया. मुकदमा करने वालों ने अदालत से मांग की है कि वे ट्रंप प्रशासन के आदेश को गैर कानूनी करार करार दे और प्रशासन को वीजा के सभी लंबित आवेदनों को भी मंजूरी देने के निर्देश दे.

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आलोचकों का कहना है कि ट्रंप मानते हैं कि ये नीतियां उनके मतदाताओं को पसंद आएंगी, लेकिन असलियत यह है कि इनसे उन्हीं लोगों का नुकसान होगा जिनकी मदद करने का ट्रंप दावा कर रहे हैं.

"इस से अमेरिका का नुकसान होगा"

ट्रंप ने आप्रवासन को अपने फिर से चुने जाने के अभियान का केंद्रीय मुद्दा बना दिया है और इस आदेश को देश की आर्थिक समस्याओं का इलाज बताया है. लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि इस कदम से आर्थिक बहाली नहीं होगी.

मार्च से भारत में फंसे 35-वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर हरप्रीत सिंह पूछते हैं, "एच-1बी वीजा या हमारे जैसे मुट्ठी भर लोगों को निशाना बनाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को क्या फायदा पहुंचेगा, जब हम कमा डॉलर में रहे हैं और खर्च रुपयों में कर रहे हैं?" हरप्रीत ने एएफपी को बताया, "मेरी कंपनी विचार कर रही है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो कई कर्मचारियों को भारतीय पेरोल में डाल दिया जाएगा." इसका मतलब है की कुछ बहुराष्ट्रीय नौकरियां स्थानीय लोगों को देने की जगह समुद्र-पार स्थानांतरित कर दी जाएंगी.

अमेरिका की बड़ी तकनीकी कंपनियों ने चेतावनी दी है कि उच्च कौशल वाले कर्मचारियों को नौकरी पर रखने पर प्रतिबंधों की वजह से अर्थव्यवस्था का नुकसान होगा. भारत में पैदा हुए माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला से लेकर गूगल के सीईओ सुंदर पिच्चई तक, सिलिकॉन वैली लंबे समय से अपनी बढ़ोतरी के लिए विदेशी प्रतिभा पर निर्भर रही है.

कार्नेगी एंडॉवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस संस्था के दक्षिण एशिया कार्यक्रम के निदेशक मिलन वैष्णव ने बताया कि यह कदम "खुद को दिए गए घाव जैसा है." उन्होंने कहा, "व्हाइट हाउस मानता है कि ये नीतियां उसके मतदाताओं को पसंद आएंगी, असलियत यह है कि इसका अर्थव्यवस्था पर बहुत ही गहरा नकारात्मक असर पड़ेगा और उस से उन्हीं लोगों का नुकसान होगा जिनकी मदद करने का ट्रंप दावा कर रहे हैं." उन्होंने यह भी कहा कि इस से प्रतिभा का पलायन भी शुरू हो सकता है क्योंकि आप्रवासी दूसरी जगहों पर मौके तलाशने लगेंगे.

सीके/आईबी (एएफपी)

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