कैसा हुआ है अमेरिकी शटडाउन का दुनिया पर असर | दुनिया | DW | 09.01.2019
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दुनिया

कैसा हुआ है अमेरिकी शटडाउन का दुनिया पर असर

अमेरिका का आंशिक शटडाउन अपने उन्नीसवें दिन में प्रवेश कर चुका है और फिलहाल इसके खत्म होने के आसार भी नहीं नजर आ रहे हैं.

अमेरिका के शटडाउन का असर अब अमेरिकी आम जनजीवन पर तो नजर आने ही लगा है, यहां की अंदरूनी राजनीति की इस उठापटक से दुनिया के दूसरे देश भी प्रभावित हो रहे हैं.

मंगलवार की शाम राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्र के नाम प्राइम-टाइम संबोधन में एक बार फिर से अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर दीवार की जरूरत पर जोर दिया और उसे देश की सुरक्षा के लिए अहम करार दिया.

ट्रंप ने इस दीवार के लिए कांग्रेस से पांच अरब डॉलर से भी ज्यादा की रकम जारी करने की मांग की है और उनका कहना है कि उसके बगैर वो किसी बजट बिल पर दस्तखत नहीं करेंगे और इस शटडाउन को महीनों तक जारी रखने से भी पीछे नहीं हटेंगे.

डेमोक्रैट्स सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने के लिए अत्याधुनिक टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल पर पैसा खर्च करने को तैयार हैं लेकिन उनका कहना है कि पड़ोसी देश के साथ एक दीवार को वो अमेरिकी भावना और उसूलों के खिलाफ मानते हैं.

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश में सरकारी कामकाज का इस तरह से ठप्प हो जाना दूसरे देशों को एक अजूबा सा लग सकता है, लेकिन यहां पहली बार ऐसा नहीं हुआ है. 1976 से अब तक 22 बार इस तरह के शटडाउन हो चुके हैं और पिछले साल यानि ट्रंप प्रशासन के दौरान ही तीन बार शटडाउन हुए हैं.

तो आखिर क्यों होते हैं ये शटडाउन?

इसका सरल जवाब है कि जिन विभागों के पास पैसा खत्म हो जाता है यानि कांग्रेस जिन्हें चलाने के लिए बजट नहीं पास कर पाती, उनके कर्मचारियों को घर बैठना पड़ता है.

कांग्रेस के दोनों सदनों यानि प्रतिनिधि सभा और सेनेट को हर साल संघीय विभागों को चलाने के लिए 12 बिल, जिन्हें एप्रोप्रिएशन बिल कहते हैं, पास करने होते हैं और यदि कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाती तो उन्हें उसके लिए एक निश्चित अवधि के अंदर एक अंतरिम बजट पास करना होता है.

अमेरिकी राजनीति में दोनों ही पार्टियां इस बजट प्रक्रिया के दौरान अपने-अपने एजेंडा के लिए राशि मुहैया करवाने की कोशिश करती हैं और उन पर यदि बिल्कुल ही सहमति नहीं बन पाए तो शटडाउन की नौबत आती है.

इस बार कांग्रेस पांच ऐसे बिल पास कर चुकी है जिससे सरकार के लगभग 75 प्रतिशत विभागों का इस वित्तीय वर्ष का बजट मंजूर हो चुका है लेकिन ऐसे सात बिल हैं जो दूसरे विभागों को चलाने के लिए अहम हैं.

इन विभागों के लिए पिछले 21 दिसंबर तक कम से कम एक अंतरिम बजट पास हो जाना चाहिए था लेकिन उसपर भी मंजूरी नहीं हुई और 22 दिसंबर को शुरू हुआ ये शटडाउन अब अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है.

कांग्रेस में डेमोक्रैट्स और रिपबलिकंस के बीच इस बार इस बजट पर सहमति नहीं बनने की सबसे बड़ी वजह है ट्रंप की दीवार के लिए पैसा. ट्रंप ने आप्रवासन को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था और अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर दीवार का निर्माण उसी का हिस्सा है.

ये अलग बात है कि अपने चुनाव अभियान के दौरान वो कहते थे कि इस दीवार का पैसा वो मेक्सिको से लेंगे लेकिन अब वो अमेरिकी करदाताओं से उसका पैसा मांग रहे हैं.

इसके अलावा विशेषज्ञ ये कह चुके हैं कि दीवार के जरिए अवैध आप्रवासन नहीं रूक सकता और वैसे भी दक्षिणी सीमा से अमेरिका के अंदर प्रवेश करनेवालों की संख्या में काफी कमी आई है. यहां अवैध तरीके से रहनेवालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो वीजा खत्म हो जाने के बाद भी वापस नहीं लौटते और उसपर लगाम कसने के लिए आप्रवासन नियमों में सुधार की जरूरत है जिसपर कांग्रेस में बरसों से सहमति नहीं बन पाई है.

ट्रंप अपनी इस मांग को मनवाने के लिए अड़े हुए हैं और राष्ट्रपति के अधिकारों के तहत राष्ट्रीय आपातस्थिति लगाने तक की बात कर चुके हैं.

भारत पर कैसा असर

ये शटडाउन अगर लंबा चलता है तो इसका असर व्यापार, निर्यात, शेयर बाजार, वीजा, पासपोर्ट, वैज्ञानिक आंकड़ों और शोध पर नजर आने लगेगा और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा.

खासतौर से हवाईअड्डों और बंदरगाहों पर सामनों की जांच में रूकावट आने से भारतीय निर्यात पर असर पड़ेगा. भारत एच1बी वीजा का इस्तेमाल करनेवाला सबसे बड़ा देश है और उसमें आई रूकावट से वहां की कंपनियों पर असर पड़ेगा.

वाशिंगटन पोस्ट अखबार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार यूएस जियोलॉजिकल सर्वे इंडोनेशिया में आई सुनामी पर कोई आंकड़ा नहीं पेश कर पाया है क्योंकि शटडाउन की वजह से उसके 8,000 से भी ज्यादा कर्मचारियों में से सिर्फ 75 काम कर पा रहे हैं.

अमरीकी विदेश विभाग ने जिन ट्विटर हैंडल को आपदा-प्रभावित इलाकों में अहम जानकारी देने के लिए रखा था, वो बंद पड़े हैं. अमेरिका की ओर से दुनिया के कई हिस्सों में दी जानेवाली मानवीय सहायता पर भी इसका असर नजर आ रहा है.

कुल मिलाकर देखा जाए दो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में किसी तरह का झटका पूरी दुनिया को झकझोरेगा इसमें शायद ही किसी को संदेह हो.

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